हवाले गणितज्ञों के: एवं अन्य कविताएँ (अभिज्ञात)

कविता कविता

अभिज्ञात 64 2018-11-15

अभिज्ञात, मानवीय रिश्तों के सूक्ष्म धागे के साथ सामाजिक, आर्थिक विषमताओं की समर्थ सार्थक पड़ताल कर रहे हैं अपनी इन दो कविताओं में , हालांकि आपकी कवितायें अन्य कई रंगों और सरोकारों के साथ गुजरती हैं | हमरंग पर आपका स्वागत है |


अगली सदी तक हम

अगली सदी तक हम
स्पन्दन बचा है अभी
कहीं, किन्हीं, लुके छिपे संबंधों में
अन्न बचा है
अनायास भी मिल जाती हैं दावतें
ॠण है कि
बादलों को देखा नहीं तैरते जी भर
बरस चुके कई-कई बार
क्षमा है कि बेटियां
चुरा लेती हैं बाप की जवानी
उनकी राजी-खुशी
जोश है बचा
कि रीढ़ सूर्य के सात-सात घोड़ो की ऊर्जा से
खींच रही है गृहस्थी
कहीं एक कोने में बचे हैं दु:ख
जो तकियों से पहले लग जाते हैं सिरहाने
और नींद की अंधेरी घाटियों में
हांकते रहते हैं स्वप्नों की रेवड़
पृथ्वी पर इन सबके चलते
बची है होने को दुर्घटना
प्रलय को न्योतते हुए
नहीं लजायेंगे अगली सदी तक हम।

हवाले गणितज्ञों के 

तब भी जोड़ो-घटाओ
अगर गणित कमजोर हो
ख़रीद लो सबसे पहले
कलकुलेटर
यह दुनिया
गणितहीन लोगों के लिए नहीं है
गणित का निषेध
आदमी के पक्ष में है
और इस पक्ष में सचमुच होना
आदमी का
सबसे संगीन मुहावरा है
लो, गणित के पक्ष में
गढ़े जा रहे हैं
मुहावरे
यह पृथ्वी की विशाल लेखनवही
गणितज्ञों के हवाले है।

अभिज्ञात द्वारा लिखित

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बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

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