‘द वीमेन ऑफ़ क्वेश्चनेबल कैरेक्टर’ “पिंक”: लेख संवाद (अभिषेक प्रकाश)

सिनेमा सिने-चर्चा

अभिषेक 172 2018-11-15

“हमारे यहां तो लडकियों को जोर से हंसने व छींकने पर भी सोचना पड़ता है। शालीनता का अपना एक सामाजिक पैमाना है। लेकिन अच्छी बात है कि स्त्री विमर्श हमारे घरों के दरवाजों पर दस्तक देने लगा है। पहले सुना करता था जब बजुर्ग अपने अगल-बगल की स्त्रियों को ‘सती-सावित्री’ होने का तमगा बांटा करते थे, लेकिन अब ऐसी कम ही स्त्रियां होंगी जो सती-सावित्री होना चाहेंगी। शायद स्त्रियों को यह बात समझ में आने लगी कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है। ‘अभिषेक प्रकाश’ की कलम से “पिंक” के बहाने एक लेख संवाद ……..|

‘द वीमेन ऑफ़ क्वेश्चनेबल कैरेक्टर’ “पिंक” 

अभिषेक प्रकाश

अभिषेक प्रकाश

‘द वीमेन ऑफ़ क्वेशचनेबल कैरेक्टर’ पिंक फिल्म के इस संवाद ने मुझे उस धोबी की याद दिला दी जिसने रामराज्य में सीता के ऊपर प्रश्न उठाया था। और सीता ही क्यूं न जाने कितने ही ‘त्रिया चरित्र’ वाली औरतों की कहानियां हैं जिसे हमारे समाज के मर्यादा पुरूषोत्तम ने पैदा किया है। स्त्री विमर्श के ऊपर बनी यह एक सशक्त फिल्म है। निर्भया कांड से संबंधित एक डाक्यूमेंन्ट्री ‘इंडियाज डॉटर’ जो शायद हमारी क्षीण होती मेमोरी को याद हो तो आपको यह भी याद होगा कि इसका प्रसारण भारत में बैन था। चूंकि इसके माध्यम से भी हमारी सड़ी हुई कुछ ग्रंथियों पर प्रश्न उठाया गया था। पिछले दिनों केरल की एक घटना को केन्द्रित कर एक शार्ट मूवी ‘आई एम शी’ देखने को मिली, जिसमें एक स्त्री का पहले उसके पति द्वारा फिर उसके अपने बेटे द्वारा ही उसका बलात्कार करना दिखाया गया। ऐसी दर्दनाक घटनाएं हमारे ही समय औऱ समाज का हिस्सा हैं। जब रिश्तों की पवित्रता पर बहस बेमानी हो चुकी है। उस समय पिंक जैसी फिल्म ने इस विमर्श को गति देने का अच्छा प्रयास किया है।

एक दृश्य है जिसमें लड़कियां अपने लिंगरीज को बॉलकनी में फैलाती हैं उस समय उनके पिता के उम्र जैसे व्यक्ति का उचक-उचक कर देखना हमारे समाज में व्याप्त यौन कुंठा को ही दर्शाता है। यह अब अपवाद नही है जब कोई लड़की किसी परीक्षा में सर्वोच्च अंक हासिल करती है या कोई बड़े पैकेज वाली नौकरी पाती है। लेकिन उसकी सफलता को उसके चरित्र से जोड़ देने में अभी भी कोई हिचक नही है। लीना यादव की एक फिल्म है ‘पार्चड’ जिसकी एक क्लिप ‘राधिका आप्टे न्यूड सीन’ नाम से लीक हो गई , इस पर एक पत्रकार ने सह अभिनेता से उस क्लिप के बारे में पूछा। इस पर उनका जवाब था कि आप पितृसत्तात्मक समाज की संरचना को समझ सकते हैं कि किसी ने यह नही लिखा कि ‘आदिल हुसैन न्यूड वीडियो वॉयरल’। यह सच है तभी तो बुलंदशहर की उस घटना मे जहां परिवारजनों के सामने उनके घर की स्त्रियों का रेप होता है, और अन्त मे आत्महत्या करने की सोच भी उस परिवार के अन्दर ही पनपती है। ये सोच हमारे समाज और उसके द्वारा पोषित व्यवस्था का ही फिनिश्ड प्रोडक्ट है। ऐसे ही व्यवस्था के नुमाइंदे है इस फिल्म के पुलिस व राजनेता के किरदार।

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कुछ समय पहले कंगना रानोत अभिनीत एक फिल्म आई थी ‘क्वीन’ जिसके एक दृश्य में वह कहती है कि हमारे यहां तो लडकियों को जोर से हंसने व छींकने पर भी सोचना पड़ता है। शालीनता का अपना एक सामाजिक पैमाना है। लेकिन अच्छी बात है कि स्त्री विमर्श हमारे घरों के दरवाजों पर दस्तक देने लगा है। पहले सुना करता था जब बजुर्ग अपने अगल-बगल की स्त्रियों को ‘सती-सावित्री’ होने का तमगा बांटा करते थे, लेकिन अब ऐसी कम ही स्त्रियां होंगी जो सती-सावित्री होना चाहेंगी। शायद स्त्रियों को यह बात समझ में आने लगी कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है। ‘आज स्त्रियां जब अपने पारंपरिक सीमाओं से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्रता व समानता की लड़ाई स्वयं ही लड़ने लगीं है, तब वही जड़ समाज उनकी मनोहर कहानियां ढ़ूढने लगा है।

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अभी कश्मीर मे सत्रह जवान शहीद हो गए, हमारे लिए और इस राष्ट्र राज्य की संकल्पना को मजबूत करने के लिए उन्होंने अपने प्राण गंवाए। उनके इस त्याग को लोगों की भावनाओं से जोड़ने व अपनी टीआरपी बढाने के लिए मीडिया ने इसको एक उत्पाद के रूप मे पेश किया है, और उसने अपने कैमरे का रूख विधवाओं व बेटियों की ओर कर दिया। समस्याओं का सरलीकरण कर देना अब एक सामान्य सी घटना है। स्त्री के इस विलाप की यह त्रासद गाथा सदियों पुरानी है। जब से उसने अपनी आत्मनिर्भरता को पुरुषों के लिए गिरवी रखा होगा। कोई राजा महान हुआ होगा या विश्वविजेता उसके पीछे न जाने कितनी स्त्रियों की गुलामी व बलात्कार की दर्दनाक कहानियां छुपी होंगी।

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इसी सरलीकरण व विभेदीकरण के परिप्रेक्ष्य में इस फिल्म का नाम भी है “पिंक”। रंगों के मनोविज्ञान के लिहाज से यह आशा, अन्कंडीशनल लव, और सम्मान को दर्शाता है। वस्तुतः ऐसा कोई प्रमाण नही है जिससे यह कहा जाए कि स्त्री या पुरूष किसमें यह मनोभाव ज्यादा है। यह तो बाजार है जिसने पिंक को जेंडर से जोड़ा। १९४० के दशक में इसको लड़कियों से जोड़ना शुरु किया गया औऱ १९८० के बाद तो इनके लिए गुलाबी कपड़े, खिलौने इत्यादि की भरमार ही लग गई। जब स्त्रियों के होंठ और गाल को हमारे साहित्य में, फिल्मों मे गुलाबी देखा जाने लगा। आज भी जाने-अनजाने ऐसी कितनी ही प्रवृत्तियां है जो स्त्रियों का शोषण करती हैं औऱ हम उसका पोषण करतें हैं। पिंक अच्छी फिल्म है अगर जेब एडजस्ट कर सके तो आप जीवन में एडजस्ट कर सकते हैं।

अन्त में मुझे ब्रिटिश कवि व उपन्यासकार विलियम गोल्डिंग का यह कथन बेहद सटीक सा लगता है कि –“अपने को पुरूषों के समान समझने वाली औरतें मुझे मूर्ख लगती हैं, वे पुरूषों से कहीं बेहतर हैं। स्त्रियों को हम जो कुछ भी देते हैं उससे कहीं ज्यादा वे हमें वापस करती हैं। हम उसे वीर्य देते हैं वह हमें पिता होने का सुख देतीं हैं। हम उसे ईंट-पत्थर का मकान देते हैं बदले में वह घर देती है। हम अनाज देते हैं वह हमारी भूख मिटाती है। हम उसे अपनी मुस्कुराहट देते हैं वह हमें अपना दिल देती है।”

अभिषेक द्वारा लिखित

अभिषेक बायोग्राफी !

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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