‘द वीमेन ऑफ़ क्वेश्चनेबल कैरेक्टर’ “पिंक”: लेख संवाद (अभिषेक प्रकाश)

सिनेमा सिने-चर्चा

अभिषेक 396 2018-11-15

“हमारे यहां तो लडकियों को जोर से हंसने व छींकने पर भी सोचना पड़ता है। शालीनता का अपना एक सामाजिक पैमाना है। लेकिन अच्छी बात है कि स्त्री विमर्श हमारे घरों के दरवाजों पर दस्तक देने लगा है। पहले सुना करता था जब बजुर्ग अपने अगल-बगल की स्त्रियों को ‘सती-सावित्री’ होने का तमगा बांटा करते थे, लेकिन अब ऐसी कम ही स्त्रियां होंगी जो सती-सावित्री होना चाहेंगी। शायद स्त्रियों को यह बात समझ में आने लगी कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है। ‘अभिषेक प्रकाश’ की कलम से “पिंक” के बहाने एक लेख संवाद ……..|

‘द वीमेन ऑफ़ क्वेश्चनेबल कैरेक्टर’ “पिंक” 

अभिषेक प्रकाश

अभिषेक प्रकाश

‘द वीमेन ऑफ़ क्वेशचनेबल कैरेक्टर’ पिंक फिल्म के इस संवाद ने मुझे उस धोबी की याद दिला दी जिसने रामराज्य में सीता के ऊपर प्रश्न उठाया था। और सीता ही क्यूं न जाने कितने ही ‘त्रिया चरित्र’ वाली औरतों की कहानियां हैं जिसे हमारे समाज के मर्यादा पुरूषोत्तम ने पैदा किया है। स्त्री विमर्श के ऊपर बनी यह एक सशक्त फिल्म है। निर्भया कांड से संबंधित एक डाक्यूमेंन्ट्री ‘इंडियाज डॉटर’ जो शायद हमारी क्षीण होती मेमोरी को याद हो तो आपको यह भी याद होगा कि इसका प्रसारण भारत में बैन था। चूंकि इसके माध्यम से भी हमारी सड़ी हुई कुछ ग्रंथियों पर प्रश्न उठाया गया था। पिछले दिनों केरल की एक घटना को केन्द्रित कर एक शार्ट मूवी ‘आई एम शी’ देखने को मिली, जिसमें एक स्त्री का पहले उसके पति द्वारा फिर उसके अपने बेटे द्वारा ही उसका बलात्कार करना दिखाया गया। ऐसी दर्दनाक घटनाएं हमारे ही समय औऱ समाज का हिस्सा हैं। जब रिश्तों की पवित्रता पर बहस बेमानी हो चुकी है। उस समय पिंक जैसी फिल्म ने इस विमर्श को गति देने का अच्छा प्रयास किया है।

एक दृश्य है जिसमें लड़कियां अपने लिंगरीज को बॉलकनी में फैलाती हैं उस समय उनके पिता के उम्र जैसे व्यक्ति का उचक-उचक कर देखना हमारे समाज में व्याप्त यौन कुंठा को ही दर्शाता है। यह अब अपवाद नही है जब कोई लड़की किसी परीक्षा में सर्वोच्च अंक हासिल करती है या कोई बड़े पैकेज वाली नौकरी पाती है। लेकिन उसकी सफलता को उसके चरित्र से जोड़ देने में अभी भी कोई हिचक नही है। लीना यादव की एक फिल्म है ‘पार्चड’ जिसकी एक क्लिप ‘राधिका आप्टे न्यूड सीन’ नाम से लीक हो गई , इस पर एक पत्रकार ने सह अभिनेता से उस क्लिप के बारे में पूछा। इस पर उनका जवाब था कि आप पितृसत्तात्मक समाज की संरचना को समझ सकते हैं कि किसी ने यह नही लिखा कि ‘आदिल हुसैन न्यूड वीडियो वॉयरल’। यह सच है तभी तो बुलंदशहर की उस घटना मे जहां परिवारजनों के सामने उनके घर की स्त्रियों का रेप होता है, और अन्त मे आत्महत्या करने की सोच भी उस परिवार के अन्दर ही पनपती है। ये सोच हमारे समाज और उसके द्वारा पोषित व्यवस्था का ही फिनिश्ड प्रोडक्ट है। ऐसे ही व्यवस्था के नुमाइंदे है इस फिल्म के पुलिस व राजनेता के किरदार।

google से

कुछ समय पहले कंगना रानोत अभिनीत एक फिल्म आई थी ‘क्वीन’ जिसके एक दृश्य में वह कहती है कि हमारे यहां तो लडकियों को जोर से हंसने व छींकने पर भी सोचना पड़ता है। शालीनता का अपना एक सामाजिक पैमाना है। लेकिन अच्छी बात है कि स्त्री विमर्श हमारे घरों के दरवाजों पर दस्तक देने लगा है। पहले सुना करता था जब बजुर्ग अपने अगल-बगल की स्त्रियों को ‘सती-सावित्री’ होने का तमगा बांटा करते थे, लेकिन अब ऐसी कम ही स्त्रियां होंगी जो सती-सावित्री होना चाहेंगी। शायद स्त्रियों को यह बात समझ में आने लगी कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है। ‘आज स्त्रियां जब अपने पारंपरिक सीमाओं से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्रता व समानता की लड़ाई स्वयं ही लड़ने लगीं है, तब वही जड़ समाज उनकी मनोहर कहानियां ढ़ूढने लगा है।

google से

अभी कश्मीर मे सत्रह जवान शहीद हो गए, हमारे लिए और इस राष्ट्र राज्य की संकल्पना को मजबूत करने के लिए उन्होंने अपने प्राण गंवाए। उनके इस त्याग को लोगों की भावनाओं से जोड़ने व अपनी टीआरपी बढाने के लिए मीडिया ने इसको एक उत्पाद के रूप मे पेश किया है, और उसने अपने कैमरे का रूख विधवाओं व बेटियों की ओर कर दिया। समस्याओं का सरलीकरण कर देना अब एक सामान्य सी घटना है। स्त्री के इस विलाप की यह त्रासद गाथा सदियों पुरानी है। जब से उसने अपनी आत्मनिर्भरता को पुरुषों के लिए गिरवी रखा होगा। कोई राजा महान हुआ होगा या विश्वविजेता उसके पीछे न जाने कितनी स्त्रियों की गुलामी व बलात्कार की दर्दनाक कहानियां छुपी होंगी।

google से

इसी सरलीकरण व विभेदीकरण के परिप्रेक्ष्य में इस फिल्म का नाम भी है “पिंक”। रंगों के मनोविज्ञान के लिहाज से यह आशा, अन्कंडीशनल लव, और सम्मान को दर्शाता है। वस्तुतः ऐसा कोई प्रमाण नही है जिससे यह कहा जाए कि स्त्री या पुरूष किसमें यह मनोभाव ज्यादा है। यह तो बाजार है जिसने पिंक को जेंडर से जोड़ा। १९४० के दशक में इसको लड़कियों से जोड़ना शुरु किया गया औऱ १९८० के बाद तो इनके लिए गुलाबी कपड़े, खिलौने इत्यादि की भरमार ही लग गई। जब स्त्रियों के होंठ और गाल को हमारे साहित्य में, फिल्मों मे गुलाबी देखा जाने लगा। आज भी जाने-अनजाने ऐसी कितनी ही प्रवृत्तियां है जो स्त्रियों का शोषण करती हैं औऱ हम उसका पोषण करतें हैं। पिंक अच्छी फिल्म है अगर जेब एडजस्ट कर सके तो आप जीवन में एडजस्ट कर सकते हैं।

अन्त में मुझे ब्रिटिश कवि व उपन्यासकार विलियम गोल्डिंग का यह कथन बेहद सटीक सा लगता है कि –“अपने को पुरूषों के समान समझने वाली औरतें मुझे मूर्ख लगती हैं, वे पुरूषों से कहीं बेहतर हैं। स्त्रियों को हम जो कुछ भी देते हैं उससे कहीं ज्यादा वे हमें वापस करती हैं। हम उसे वीर्य देते हैं वह हमें पिता होने का सुख देतीं हैं। हम उसे ईंट-पत्थर का मकान देते हैं बदले में वह घर देती है। हम अनाज देते हैं वह हमारी भूख मिटाती है। हम उसे अपनी मुस्कुराहट देते हैं वह हमें अपना दिल देती है।”

अभिषेक द्वारा लिखित

अभिषेक बायोग्राफी !

नाम : अभिषेक
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

कविता आज-कल : आलेख “अनुपम त्रिपाठी”

कविता आज-कल : आलेख “अनुपम त्रिपाठी”

अनुपम 459 2020-04-14

इधर कविता की एक ताज़ी दुनिया बन रही है। कुछ समकालीन कवि पूरी तैयारी के साथ आ रहे हैं। 'कविता शब्दों का खेल है'- इस धारणा में बहुत खेला कूदा गया और यह खेल अभी भी जारी है। यह ताज़्ज़ुब करता है कि भाषा कला और साहित्य की ओर से अपनी आँख बंद किए हुए समाज में जहाँ पाठकों की संख्या हाशिये पर जा रही है वहीं लेखकों की संख्या में थोकिया इजाफा हुआ है, खासतौर से कवियों की संख्या में। लिख सब रहे हैं - पढ़ कोई नहीं रहा। पाठकीय क्षेत्र में वस्तु-विनियम का सिद्धांत लगा हुआ है। आप मेरी पढ़ें और मैं आपकी। आत्म चर्चा की ऐसी बीमारी पकड़ी है कि पूछिये मत। इस बिलबिलाई हुई कवियों की भीड़ ने अच्छे कवियों को ढँक लिया है। वैश्विक स्तर पर हिंदी कविता की क्या स्थिति है, इससे हम अनभिज्ञ नहीं हैं। ऐसे में आलोचना की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह इस भीड़ से अच्छे कवियों को बाहर निकालकर समाज के सामने प्रस्तुत करे।

क्वारेंटीन : कहानी “राजेंद्र सिंह बेदी”

क्वारेंटीन : कहानी “राजेंद्र सिंह बेदी”

राजेंद्र सिंह बेदी 573 2020-04-14

उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार राजिंदर सिंह बेदी (1915–1984) की एक कहानी का शीर्षक है ‘क्वारनटीन’ जो अंग्रेजी राज में फैली प्लेग महामारी को केंद्र में रखकर लिखी गयी है. इस कहानी को पढ़ते हुए आज भी डर लगता है. इसकी कोरोना खौफ़ से तुलना करते हुए जहाँ समानताएं दिखती हैं वहीं यह विश्वास भी पैदा होता है कि मनुष्य इस आपदा को भी पराजित कर देगा. 

 ‘एक डॉक्टर की हैसियत से मेरी राय निहायत मुसतनद है और मैं दावे से कहता हूं कि जितनी मौतें शहर में क्वारनटीन से हुईं, उतनी प्लेग से न हुईं. हालांकि क्वारनटीन कोई बीमारी नहीं, बल्कि वह उस बड़े क्षेत्र का नाम है जिसमें हवा में फैली हुई महामारी के दिनों में बीमार लोगों को तंदुरुस्त इंसानों से कानूनन अलहदा करके ला डालते हैं ताकि बीमारी बढ़ने न पाए. अगरचे क्वारनटीन में डॉक्टरों और नर्सों का काफी इंतजाम था, फिर भी मरीजों की बड़ी संख्या में वहां आ जाने से हर मरीज को अलग-अलग खास तवज्जो न दी जा सकती थी. उनके अपने संबंधियों के आसपास न होने से मैं ने बहुत से मरीजों को बे-हौसला होते देखा. कई तो अपने इर्द-गिर्द लोगों को पे दर पे मरते देखकर मरने से पहले ही मर गए. कई बार तो ऐसा हुआ कि कोई मामूली तौर पर बीमार आदमी वहां के वातावरण में ही फैले जरासीम से हलाक हो गया ।’
- इसी कहानी से
इस कहानी का अनुवाद “रज़ीउद्दीन अक़ील” ने किया है जो आभार के साथ यहाँ प्रस्तुत है.

मनुष्य का जीवन आधार क्या है: कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

मनुष्य का जीवन आधार क्या है: कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

लियो टॉलस्टॉय 348 2020-03-28

‘वह निराश होकर घर को लौट पड़ा। राह में सोचने लगा—कितने अचरज की बात है कि मैं सारे दिन काम करता हूं, उस पर भी पेट नहीं भरता। चलते समय स्त्री ने कहा था कि वस्त्र अवश्य लाना। अब क्या करुं, कोई उधार भी तो नहीं देता। किसानों ने कह दिया, अभी हाथ खाली है, फिर ले लेना। तुम्हारा तो हाथ खाली है, पर मेरा काम कैसे चले? तुम्हारे पास घर, पशु, सबकुछ है, मेरे पास तो यह शरीर ही शरीर है। तुम्हारे पास अनाज के कोठे भरे पड़े हैं, मुझे एकएक दाना मोल लेना पड़ता है। ‪सात दिन में‬ तीन रुपये तो केवल रोटी में खर्च हो जाते हैं। क्या करुं, कहां जाऊं?’

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.