शेक्सपीयर मन के रचनाकार हैं: एक रिपोर्ट, (राजन कुमार सिंह)

रंगमंच साहित्यक गतिविधिया

राजन कुमार सिंह 50 2018-11-16

शेक्सपियर ऐसे नाटककार थे जिन्हें आलोचकों ने भी माना कि वो वाकई में महान थे। अदृश्य को जानने की शक्ति कलाकार को महान बनाती है। वे अपने नाटकों के चरित्र खुद जीते थे। प्रकृति के प्रांगण में उन्होंने सीखा, उनके पास कोई स्कूल की डिग्री नही थी। व्यंग्यात्मक लहजे में उन्होंने कहा कि जब एक लोग बोले और सभी सुने वो शोकसभा है और जब सब बोले और कोई न सुने वह लोकसभा है।

शेक्सपीयर मन के रचनाकार हैं 

जीवन के सुख, दुख सहित हर पक्ष को चित्रित किया शेक्सपीयर ने।
पटना,10 जून महान नाटककार शेक्सपीयर की चौथी पुण्यशताब्दी वर्ष के अवसर पर हिंसा के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी (रंगकर्मियों-कलाकारों का साझा मंच) एवं बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के संयुक्त आयोजन “हमारे समय में शेक्सपीयर” विषय पर परिचर्चा का आयोजन आज सम्पन्न हुआ।

*कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए के.के नारायण ने बताया कि आज चाहे समाज में फिल्मों का जितना भी प्रभाव पड़ा हो लेकिन शेक्सपीयर के नाटक आज हमारे समाज का अभिन्न अंग है। विश्वप्रसिद्ध नाटक ‘हैमलेट’,’ओथेलो’, ‘मैकबेथ’ और ‘जूलियस सीजर’ का जिक्र करते हुए नारायण ने कहा कि ये नाटक समाज और व्यक्ति के आपसी रिश्तों के साथ साथ सत्ता के निरंकुश चरित्र को बताता है। चरित्रों का संचयन उनकी विशेषता थी। आमतौर पर जब कोई विरोध करता है तो उसे वामपंथी मान लिया जाता है और जब समझौतावादी होता है तो दक्षिणपंथी कह दिया जाता है। शेक्सपियर ऐसे नाटककार थे जिन्हें आलोचकों ने भी माना कि वो वाकई में महान थे। अदृश्य को जानने की शक्ति कलाकार को महान बनाती है। वे अपने नाटकों के चरित्र खुद जीते थे। प्रकृति के प्रांगण में उन्होंने सीखा, उनके पास कोई स्कूल की डिग्री नही थी। व्यंग्यात्मक लहजे में उन्होंने कहा कि जब एक लोग बोले और सभी सुने वो शोकसभा है और जब सब बोले और कोई न सुने वह लोकसभा है।*

हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने कहा कि विलियम शेक्सपीयर इंग्लिश कवि, नाटककार और अभिनेता थे जो इंग्लिश भाषा के महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध लेखको में से एक थे। थियेटर नाम यूनानी मूल का शब्द है जिसका अर्थ है देखना। शेक्सपीयर के समय में ही इसे थियेटर नाम दिया गया। अरुण कमल ने कहा कि शेक्सपीयर मेरे प्रिय कवि हैं मैं उनके घर दो बार गया हूँ। उन्होंने कहा महान अभिनेता चार्ली चैपलीन ने कहा था कि ग्रामीण परिवेश से आने वाला यह साहित्यकार शेक्सपीयर हमें शक में डालता है। इनके नाटक में सुख है तो दुख भी है, रुदन है तो हंसी भी है, मतलब जीवन के सभी रूप शेक्सपीयर के नाटक में हैं। शेक्सपीयर के ‘मैकबेथ’ नाटक का जिक्र करते हुए अरुण कमल ने कहा कि इस नाटक को करने वाले कई लोगों ने आत्महत्या की है।आलम यह है कि थियेटर के लोग आज भी इस नाटक को उसी नाम से नहीं करते हैं, और इसे अपशकुन मानते हैं। शेक्सपीयर ने लगभग 20000 अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किया जबकि उस समय अंग्रेजी में लगभग 1,20,000 शब्द थे। उन्होंने 17000 शब्दों को खुद बनाया। उनका नाटक पारसी थियेटर में खूब लोकप्रिय हुआ। अंत में कहा कि जो शेक्सपीयर को पढ़ता है वो उस समय शेक्सपीयर ही हो जाता है।

टी पी एस कॉलेज के अंग्रेजी के प्रो. छोटेलाल खत्री ने कहा कि आज पूरी दुनिया शेक्सपीयर का मंच है। आज शेक्सपीयर इंग्लैंड के साथ-साथ पूरी दुनिया के हैं। जिसमें साहित्यकार, नाटककार से लेकर शोधार्थी तक लगातार काम कर रहे हैं। प्रो. खत्री ने कहा कि शेक्सपीयर को प्रकृति पर मजबूत पकड़ थी, इस कारण वो मनुष्य के जीवन के सभी रूपों को वास्तविकता के साथ अपने नाटक में दिखाते हैं। साथ ही, उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के समय सत्ता द्वारा शेक्सपियर को प्रश्रय देने की बात की लेकिन उनकी रचनाएँ विशुद्ध अभिव्यक्ति है, यही उन्हें महान बनाता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कवि आलोक धन्वा ने कहा कि शेक्सपीयर ने अपने नाटकों से दुनिया के समाज को बदला और एक ऐसा समाज बनाने का प्रयास किया जो शोषण विहीन हो। साम्रज्यवाद तन के स्तर पर उपभोक्ता बनाता है और मन का दमन करता है। शेक्सपीयर मन के रचनाकार हैं।
कार्यक्रम को मनोचिकित्सक विनय कुमार ने भी सम्बोधित किया।

“हमारे समय में शेक्सपीयर” कार्यक्रम का संचालन अनीश अंकुर ने किया। देश में हो रहे किसानों की आत्महत्या गोलीकांड और बिहार की शिक्षा व्यवस्था के निमित निंदा प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया, जिसका पाठ और धन्यवाद ज्ञापन मृत्युंजय शर्मा ने किया।

शेक्सपीयर की 4थी पुण्यशताब्दी वर्ष के अवसर पर हिंसा के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी (रंगकर्मीयों-कलाकारों का साझा मंच) और बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में बिहार गीत के रचयिता कवि सत्यनारायण, वरिष्ठ कवि अनिल विभाकर, माध्यमिक शिक्षक संघ के विजय कुमार सिंह, संस्कृतिकर्मी सुमंत शरण, कवि राजेश कमल, शायर पंकजेश, फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम, सुमन कुमार, सुरेश कुमार हज्जु, रंगकर्मी रमेश कुमार सिंह, रणधीर कुमार, अरुण शादवल, जय प्रकाश, शम्भू कुमार, अक्षय जी, अभिषेक नंदन, रंजीत, अंचित, उत्कर्ष , विनय कुमार,रंजीत, गौतम गुलाल, गजेंद्र शर्मा, कुमार अनुपम, साकेत कुमार, सुमन सौरभ, ज्ञान पंडित, रौशन कुमार, विक्की राजवीर, सीटू तिवारी, सुनील बिहारी, बी.एन विश्वकर्मा, हर्षवर्द्धन शर्मा, सुनील कुमार, इसकफ़ के रवींद्र नाथ राय , सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय जी, सुजीत वर्मा, आभा चौधरी , चर्चित छात्र नेता सुशील कुमार, सहित बड़ी संख्या में रंगकर्मी, शिक्षक और बुद्धिजीवी उपस्थित थे।

प्रस्तुति – राजन कुमार सिंह ( युवा रंगकर्मी व पत्रकार)

राजन कुमार सिंह द्वारा लिखित

राजन कुमार सिंह बायोग्राफी !

नाम : राजन कुमार सिंह
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 67 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 99 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 228 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.