मेरा जूता है जापानी… (लघुकथा)

कथा-कहानी लघुकथा

हनीफ मदार 37 2018-11-16

धर्मेन्द्र कृष्ण तिवारी पेशे से भले ही पत्रकार हैं लेकिन उनकी सामाजिक और जनवादी सोच उन्हें बाजारवाद के दौर में प्रचलित पत्रकारिता की परिभाषा से अलग करती है | उनकी यह छोटी सी कहानी उनकी इसी खासियत को दर्शाती है | : संपादक लघुकथा-

मेरा जूता है जापानी…

गांव का कल्लू अब कालीचरण बन गया है। फटा पजामा पहन कर प्राइमरी स्कूल जाने वाला अब ब्रांडेड सूट पहनने लगा है। अपने पिता के हाथ से बनाए जूते उसे रास नहीं आ रहे हैं। क्योंकि अपना कल्लू अब कालीचरण जो हो गया है।
कल्लू कुछ दिन पहले ही एक मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर आसीन हो गया है। बूढ़े बाप की खुशी का ठिकाना नहीं है। बेटे ने उसे दिल्ली आने की टिकट जो भेजी थी। बाप को लगा कि अपने लाड़ले के लिए कुछ तोहफा ले जाऊं। लेकिन, क्या ले जाएं, यह कुछ समझ नहीं आ रहा। घर में खाने के लिए रखे अनाज के अलावा कुछ नहीं था। रात भर उसके मन में सवाल कौंदता रहा कि बेटे को क्या दें कि वह खुश हो जाए। लेकिन, सवाल का जवाब उसे नहीं मिला। अगले दिन वह उनींदी आंखों से जागा तो देखा कि पत्नी उसके सामने खड़ी है। वह बोला, काय री, क्या देख रई, पहले मेंरो मौं नहीं देखों का? पत्नी बोली, ऐसो मौं तुमाऔ कबहूं नहीं देखो , क्या हो गऔ, ऐसे गुमसुम तो कबऊ नहीं रए। वह बोला, मौड़ा कौं का ले जांए, जो समझ नईं आ रऔ? पत्नी बोली, बाय जूता ले जाऔ, । जिंदगी से तो पैनत आ रऔ तुमाए बने जूता। पत्नी की बात सुन कर कल्लू के बाप का मन खुश हो गया। उसे पुराने दिन याद आने लगे कि कैसे वह फैक्टरी से कभी अपर, कभी सोल तो कभी कुछ सामान चुरा कर लाता था और अपने बेटे के लिए शानदार जूते बना कर उसे पहनाता था। उसने अपने जीवन में बस यहीं चोरी करने का अपराध किया था, जिसका दोषी वह खुद को कभी नहीं मानता था। क्योंकि जूते पहनते ही कल्लू का खिला चेहरा देख उसे ऐसा लगता था कि उसने गंगा नहा ली हो।
उसने अपने पास रखे सामान को निकाला और कल्लू के लिए जूता बनाने में जुट गया। देर रात तक मशक्कत करने के बाद उसने कल्लू के लिए आकर्षक जूते तैयार किए। अगले दिन दोनों पति – पत्नी ट्रेन में बैठ कर दिल्ली के लिए चल दिए। पूरे रास्ते बूढ़ा बाप कल्लू के बचपन का वह चेहरा याद करता गया, जो उसे उसके बनाए जूते मिलने पर खिल जाता था। अब उसका बेटा लाट साहब बन गया था। बिना मोजों के जूते पहन कर खेतों में दौड़ने वाला कल्लू अब उसके बनाए जूते पहन कर टाइल्स पर चलेगा। इन्हीं सब खुशियों की लहरों में गोते लगाते कब दिल्ली आ गया उसे पता ही नहीं चला।
स्टेशन पर बेटा लेने आ गया था। टैक्सी में बैठ कर वह उसके फ्लैट में पहुंचा तो अपने बेटे का रुतबा देख कर खुशी से फूला नहीं समाया। बाप ने बिना कुछ बोले भरी हुई आंखों से अपने बेटे को जूते दिए। जूते देख कल्लू जोर-जोर से हंसने लगा। इस बार उसकी हंसी बूढ़े बाप को समझ नहीं आई। वह हंसते – हंसते बोला, बापू ये क्या उठा लाए, अब मैं ये नहीं जापानी कंपनी का जूता पहनता हूं। कल्लू ने फट से अपने पैर से जूता उतारा और अपने बाप के हाथ में दे दिया। बेटे का जूता हाथ में लेकर बाप की आंखें छलछला गईं। इधर कल्लू पटर – पटर बोले जा रहा था कि बापू ये जूता जापानी कंपनी का है, हजारों रुपये का आता है। तेरे जूतों से ज्यादा आराम दायक है। बाप को रोते देख कल्लू चुप हो गया। बोला क्या हुआ बापू, खुश नहीं हुए। बूढ़े बाप ने जूते का सोल उखाड़ दिया। यह देख कल्लू अचंभित हो गया। बोला बापू बुरा लगा क्या, मुझे माफ कर दो। बाप बोला जूता गुस्सा में नईं फाड़े हैं कल्लू, तोय जाय दिखा रहे के पैसन की चमक में तू अपने बाप के प्यारई कौं भूल गऔ। जो जापानी जूता तू पैने हैगो, जो भी हमई ने बनाऔ है, जापे नाम अकेलो उतैको है, लेकिन जा देखों सोल पर निशान हमरोई लगे।
यह देख कल्लू की आंखें भलभला गई और उसे भी बचपन का वह नजारा याद आ गया, जब बाप के बनाए जूते को पहन कर वह खिलखिला जाता था। और आज वहीं जूता किसी और नाम से उसे पसंद तो आ रहा था, लेकिन बाप के हाथ से दिया हुआ नहीं।

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

Blogger Post

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 241 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 160 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 244 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 245 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.