मेरा जूता है जापानी… (लघुकथा)

कथा-कहानी लघुकथा

हनीफ मदार 9 2018-11-16

धर्मेन्द्र कृष्ण तिवारी पेशे से भले ही पत्रकार हैं लेकिन उनकी सामाजिक और जनवादी सोच उन्हें बाजारवाद के दौर में प्रचलित पत्रकारिता की परिभाषा से अलग करती है | उनकी यह छोटी सी कहानी उनकी इसी खासियत को दर्शाती है | : संपादक लघुकथा-

मेरा जूता है जापानी…

गांव का कल्लू अब कालीचरण बन गया है। फटा पजामा पहन कर प्राइमरी स्कूल जाने वाला अब ब्रांडेड सूट पहनने लगा है। अपने पिता के हाथ से बनाए जूते उसे रास नहीं आ रहे हैं। क्योंकि अपना कल्लू अब कालीचरण जो हो गया है।
कल्लू कुछ दिन पहले ही एक मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर आसीन हो गया है। बूढ़े बाप की खुशी का ठिकाना नहीं है। बेटे ने उसे दिल्ली आने की टिकट जो भेजी थी। बाप को लगा कि अपने लाड़ले के लिए कुछ तोहफा ले जाऊं। लेकिन, क्या ले जाएं, यह कुछ समझ नहीं आ रहा। घर में खाने के लिए रखे अनाज के अलावा कुछ नहीं था। रात भर उसके मन में सवाल कौंदता रहा कि बेटे को क्या दें कि वह खुश हो जाए। लेकिन, सवाल का जवाब उसे नहीं मिला। अगले दिन वह उनींदी आंखों से जागा तो देखा कि पत्नी उसके सामने खड़ी है। वह बोला, काय री, क्या देख रई, पहले मेंरो मौं नहीं देखों का? पत्नी बोली, ऐसो मौं तुमाऔ कबहूं नहीं देखो , क्या हो गऔ, ऐसे गुमसुम तो कबऊ नहीं रए। वह बोला, मौड़ा कौं का ले जांए, जो समझ नईं आ रऔ? पत्नी बोली, बाय जूता ले जाऔ, । जिंदगी से तो पैनत आ रऔ तुमाए बने जूता। पत्नी की बात सुन कर कल्लू के बाप का मन खुश हो गया। उसे पुराने दिन याद आने लगे कि कैसे वह फैक्टरी से कभी अपर, कभी सोल तो कभी कुछ सामान चुरा कर लाता था और अपने बेटे के लिए शानदार जूते बना कर उसे पहनाता था। उसने अपने जीवन में बस यहीं चोरी करने का अपराध किया था, जिसका दोषी वह खुद को कभी नहीं मानता था। क्योंकि जूते पहनते ही कल्लू का खिला चेहरा देख उसे ऐसा लगता था कि उसने गंगा नहा ली हो।
उसने अपने पास रखे सामान को निकाला और कल्लू के लिए जूता बनाने में जुट गया। देर रात तक मशक्कत करने के बाद उसने कल्लू के लिए आकर्षक जूते तैयार किए। अगले दिन दोनों पति – पत्नी ट्रेन में बैठ कर दिल्ली के लिए चल दिए। पूरे रास्ते बूढ़ा बाप कल्लू के बचपन का वह चेहरा याद करता गया, जो उसे उसके बनाए जूते मिलने पर खिल जाता था। अब उसका बेटा लाट साहब बन गया था। बिना मोजों के जूते पहन कर खेतों में दौड़ने वाला कल्लू अब उसके बनाए जूते पहन कर टाइल्स पर चलेगा। इन्हीं सब खुशियों की लहरों में गोते लगाते कब दिल्ली आ गया उसे पता ही नहीं चला।
स्टेशन पर बेटा लेने आ गया था। टैक्सी में बैठ कर वह उसके फ्लैट में पहुंचा तो अपने बेटे का रुतबा देख कर खुशी से फूला नहीं समाया। बाप ने बिना कुछ बोले भरी हुई आंखों से अपने बेटे को जूते दिए। जूते देख कल्लू जोर-जोर से हंसने लगा। इस बार उसकी हंसी बूढ़े बाप को समझ नहीं आई। वह हंसते – हंसते बोला, बापू ये क्या उठा लाए, अब मैं ये नहीं जापानी कंपनी का जूता पहनता हूं। कल्लू ने फट से अपने पैर से जूता उतारा और अपने बाप के हाथ में दे दिया। बेटे का जूता हाथ में लेकर बाप की आंखें छलछला गईं। इधर कल्लू पटर – पटर बोले जा रहा था कि बापू ये जूता जापानी कंपनी का है, हजारों रुपये का आता है। तेरे जूतों से ज्यादा आराम दायक है। बाप को रोते देख कल्लू चुप हो गया। बोला क्या हुआ बापू, खुश नहीं हुए। बूढ़े बाप ने जूते का सोल उखाड़ दिया। यह देख कल्लू अचंभित हो गया। बोला बापू बुरा लगा क्या, मुझे माफ कर दो। बाप बोला जूता गुस्सा में नईं फाड़े हैं कल्लू, तोय जाय दिखा रहे के पैसन की चमक में तू अपने बाप के प्यारई कौं भूल गऔ। जो जापानी जूता तू पैने हैगो, जो भी हमई ने बनाऔ है, जापे नाम अकेलो उतैको है, लेकिन जा देखों सोल पर निशान हमरोई लगे।
यह देख कल्लू की आंखें भलभला गई और उसे भी बचपन का वह नजारा याद आ गया, जब बाप के बनाए जूते को पहन कर वह खिलखिला जाता था। और आज वहीं जूता किसी और नाम से उसे पसंद तो आ रहा था, लेकिन बाप के हाथ से दिया हुआ नहीं।

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
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जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

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