किस्‍से किताबों के: दूसरी क़िस्त (सूरज प्रकाश)

बहुरंग किस्से ‘सूरज प्रकाश’ के

सूरज प्रकाश 123 2018-11-17

हमरंग पर सूरज प्रकाश द्वारा लिखित विशेष व्यन्ग्यालेख ‘किस्से किताबों के’ की दूसरी क़िस्त –

किस्‍से किताबों के – किस्‍सा तीन

sooraj-prakash

इस बार का किस्‍सा मेरे बेटे अभिजित की जुबानी 
अच्‍छी किताब ने पिटाई से बचाया

मैं तब नाइंथ में था। सेंट्रल स्‍कूल आइआइटी, पवई में पढ़ता था। उन दिनों पापा ऐन फ्रैंक की डायरी का अनुवाद कर रहे थे। जब तक अनुवाद पूरा न हो जाये, मुझे किताब को हाथ को लगाने की अनुमति नहीं थी। आखिर अनुवाद पूरा हुआ और किताब मुझे मिली। मैंने किताब स्‍कूल बैग में डाली और स्‍कूल बस में ही पढ़ना शुरू कर दिया। अब किताब में इतना मन रमा कि छोड़ने को दिल ही न करे। स्‍कूल पहुंच कर भी डेस्‍क के भीतर किताब खोल कर बीच बीच में पढ़ता रहा।
तीसरे पीरियड तक आते आते ये हालत हो गयी कि किताब खोल कर सिर झुका कर लगातार पढ़ने लगा। पता ही नहीं चला कि कब इंगलिश की टीचर मिसेज भसीन आयीं और पढ़ाना शुरू कर दिया। अपन राम तो ऐन फ्रैंक में मस्‍त। मिसेज भसीन ने देखा कि मेरा ध्‍यान क्‍लास में नहीं है। एटैंडेंस में मैंने यस मैम भी नहीं बोला था। उन्‍होंने दो तीन बार मेरा नाम पुकारा लेकिन सुनायी किसे देना था। पूरी क्‍लास में सन्नाटा। मिसेज भसीन मेरे सिर पर आ कर खड़ी हो गयीं और बोली – क्‍या पढ़ रहे हो अभिजित?
मैडम को सिर पर खड़ा देख कर मेरे तो हाथ पैर फूल गये। मैडम बहुत कड़क थी। तय था आज जम के पिटाई होगी। मुंह से मैं.. मैं .. ही निकल पाया। मैडम ने मेरे हाथ से किताब ली और टाइटल देख कर पूछा – कहां से लाये?
– पापा की लाइब्रेरी से, सॉरी मैडम, अब आगे से..।
– जब पढ़ लो तो मुझे देना। मैंने नहीं पढ़ी है। कह कर मैडम ब्‍लैक बोर्ड की तरफ बढ़ गयीं।
आप समझ सकते हैं कि मैंने कितनी राहत की सांस ली होगी। एक अच्छी किताब ने पूरी क्‍लास के सामने मेरी दुर्गत होने से बचा लिया था।

किस्‍से किताबों के –किस्‍सा नम्‍बर चार –

 किस्‍सा एक खराब किताब का

कुछ बरस पहले मुंबई में एक साहित्यिक आयोजन चल रहा था। कई वरिष्ठ रचनाकार बाहर से आये थे। उस वक्‍त निर्मल वर्मा जी वक्‍ता के रूप में अपनी बात कह रहे थे। पिछले दिन के सत्रों की खबर तस्‍वीरों सहित अखबारों में छपी थीं। रमेश चंद्र शाह आदि मंच पर थे।
तभी सफारी सूट पहने एक सज्‍जन भीतर आये। वे मझौले लेवल के कारोबारी आदमी लग रहे थे। मंच की तरफ देखा तक नहीं कि कौन हैं वहां। आस पास का जायजा लिया और बाहर खड़े अपने ड्राइवर को इशारा किया। दो मिनट में ही उनका ड्राइवर किताबों के दो बंडल लिये अंदर आ गया। अब जनाब एक-एक आदमी के पास जा कर उसका नाम पूछ कर किताबें भेंट करने लगे। प्रिय भाई अलां को सप्रेम भेंट और फलां को सप्रेम भेंट। मेरे पास भी आये, नाम पूछा, आंखें मिलाने या अपना नाम बताने की ज़रूरत नहीं समझी और एक सप्रेम भेंट टिका गये। किताब देखी – उनकी पीएचडी की थीसिस थी। कविता में रस और रस में कविता टाइप कुछ नाम था।
शाम को डिनर का प्रोग्राम था इसलिए मैं कपड़े बदल कर जब पांच बजे के करीब घर से वापिस आया तो वही सज्‍जन अपनी थीसिस के अगले बंडल निपटा रहे थे। भला रोज़ रोज़ थोड़े ही मिलते हैं इतने सारे गुण ग्राहक एक साथ। अख़बार में खबर देख कर बीवी ने साफ साफ कह दिया होगा कि जाओ सारी किताबें आज ही निपटा कर आओ। वरना…. ये वरना ही उन्‍हें अपना धंधा छुड़वा कर ये नेक काम करवा रहा होगा।
अभी मैं बैठा ही था कि एक बार फिर मेरे पास आ कर मेरा नाम पूछने लगे। मैंने बताया – सुल्‍तान अहमद। एक और सप्रेम भेंट – सुल्‍तान अहमद के नाम।
दोनों प्रतियां मेरी कार में कई दिन तक रखी रहीं। एक दिन हिन्‍दी भाषी मेकैनिक कार में कब से रखी इस किताब के पन्ने पलट के देख रहा था, तो तुरंत उसे थमा दी। वापिस न लेने की शर्त पर।
अब इस पूरे प्रसंग में उन पीएचडी भाई साहब, मेरा या मेकैनिक का क्‍या कसूर। एक सही किताब एक गलत हाथ से दूसरे गलत हाथ में जाती रही और अपने दुर्भाग्‍य को कोसती रही।

सूरज प्रकाश द्वारा लिखित

सूरज प्रकाश बायोग्राफी !

नाम : सूरज प्रकाश
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

सूरज प्रकाश का जन्म उत्‍तराखंड (तब के उत्तर प्रदेश) के देहरादून में हुआ था। सूरज प्रकाश ने मेरठ विश्‍व विद्यालय से बी॰ए॰ की डिग्री प्राप्त की और बाद में उस्‍मानिया विश्‍वविद्यालय से एम ए किया। तुकबंदी बेशक तेरह बरस की उम्र से ही शुरू कर दी थी लेकिन पहली कहानी लिखने के लिए उन्‍हें पैंतीस बरस की उम्र तक इंतजार करना पड़ा। उन्होंने शुरू में कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं और फिर 1981 में भारतीय रिज़र्व बैंक की सेवा में बंबई आ गए और वहीं से 2012 में महाप्रबंधक के पद से रिटायर हुए। सूरज प्रकाश कहानीकार, उपन्यासकार और सजग अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं। 1989 में वे नौकरी में सज़ा के रूप में अहमदाबाद भेजे गये थे लेकिन उन्‍होंने इस सज़ा को भी अपने पक्ष में मोड़ लिया। तब उन्‍होंने लिखना शुरू ही किया था और उनकी कुल जमा तीन ही कहानियाँ प्रकाशित हुई थीं। अहमदाबाद में बिताए 75 महीनों में उन्‍होंने अपने व्‍यक्‍तित्‍व और लेखन को संवारा और कहानी लेखन में अपनी जगह बनानी शुरू की। खूब पढ़ा और खूब यात्राएं कीं। एक चुनौती के रूप में गुजराती सीखी और पंजाबी भाषी होते हुए भी गुजराती से कई किताबों के अनुवाद किए। इनमें व्‍यंग्य लेखक विनोद भट्ट की कुछ पुस्‍तकों, हसमुख बराड़ी के नाटक ’राई नो दर्पण’ राय और दिनकर जोशी के बेहद प्रसिद्ध उपन्‍यास ’प्रकाशनो पडछायो’ के अनुवाद शामिल हैं। वहीं रहते हुए जॉर्ज आर्वेल के उपन्‍यास ’एनिमल फॉर्म’ का अनुवाद किया। गुजरात हिंदी साहित्‍य अकादमी का पहला सम्‍मान 1993 में सूरज प्रकाश को मिला था। वे इन दिनों मुंबई में रहते हैं। सूरज प्रकाश जी हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी भाषाएं जानते हैं। उनके परिवार में उनकी पत्‍नी मधु अरोड़ा और दो बेटे अभिजित और अभिज्ञान हैं। मधु जी समर्थ लेखिका हैं।


अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

ज्योति कुमारी 274 2019-12-11

हैदराबाद, उन्नाव, बक्सर, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में बेटियों को जिंदा जलाने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि पश्चिम चंपारण के शिकारपुर थाना क्षेत्र के एक गांव में ऐसा ही मामला सामने आया है । निश्चित ही यह भारतीय न्याय व्यवस्था, सामाजिकता और लोकतंत्र के लिए अत्यंत शर्मनाक है। किंतु इसके बरअक्स त्वरित न्याय प्रक्रिया में हैदराबाद का पुलिसिया कृत्य भी ऐसी घटनाओं के ख़िलाफ़ कोई आदर्श नहीं माना जा सकता। बल्कि बिना किसी अपराध के साबित होने से पूर्व ही महज़ आरोपित व्यक्ति या व्यक्तियों की भीड़ द्वारा हत्या कर देना या हैदराबाद में पुलिस का ख़ुद मुंसिफ़ बन जाना यक़ीनी तौर पर माननीय भारतीय न्यायालयों और न्याय प्रक्रिया को मुँह चिढ़ाने जैसा है, जो अपराधी और आपराधिक घटना की जाँच, विश्लेषण और अन्वेषण के रास्ते भी एक झटके से बंद कर देता है, फलस्वरूप न्याय व्यवस्था के प्रति सामाजिक भरोसे की जगह सहमा सा संदेह खड़ा होने लगता है । इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को सामाजिक और क़ानूनी रोशनी में देखने का प्रयास है, कथाकार और माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता ‘ज्योति कुमारी शर्मा’ का यह आलेख॰॰॰॰॰

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

हुश्न तवस्सुम निहाँ 234 2019-12-06

शैफाली का ओहदा क्या बढ़ा उसके कद में खुद ब खुद इजाफा हो गया। प्रेस की ओर से उसे एक स्कूटर भी मिल गई। वेतन भी बढ़ां संपादक संजय वर्मा की नजरें उस पर कुछ ज्यादा मेहरबान रहने लगीं। उसके खाने पीने और प्रेस के कामों का भी काफी ध्याान रखते। जितनी बार काॅफी चाय खुद के लिए मंगवाते उसे भी भिजवाते। खाली समय में उसके केबिन में जा कर गप्पें लड़ाया करते। और ऐसे ही वह नजदीकियों की पराकाष्ठा पार करने का प्रयत्न करने लगे। इस दरम्यान उसका बादल से मिलना जारी रहा। किन्तु बादल, बादल जेसा ही ठण्डा और बेगाना बंजारा सा बना रहा। एक दिन शैफाली संपादक की कुटिल हरकतों से उक्ता कर बड़े आवेश में बादल के पास गई और.................

बंद कमरे की रोशनी  : कहानी (हनीफ़ मदार)

बंद कमरे की रोशनी : कहानी (हनीफ़ मदार)

हनीफ मदार 588 2019-11-21

फ़िरोज़ खान के संस्कृत पढ़ाने को लेकर उठे विवाद के वक़्त में लगभग डेढ़ दशक पहले लिखी इस कहानी को पढ़ते हुए एक ख़ास बात जो स्पष्ट रूप से सामने आती है कि बीते इन वर्षों में भले ही हम आधुनिकता और तकनीकी दृष्टि से बहुत तरक़्क़ी कर गए हैं किंतु यह बिडंबना ही है कि सामाजिक रूप से हमारी मानसिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं  आ पाया । जहाँ इधर फ़िरोज़ खान का संस्कृत पढ़ाना राजनैतिक हित-लाभ का अस्त्र बनता जा रहा है वहीं डेढ़ दशक पहले लिखी कहानी का पात्र मास्टर अल्लादीन का संस्कृत पढ़ाना भी वोट की राजनीति को इस्तेमाल होता है॰॰॰॰॰॰एक समुदाय विशेष के द्वारा किसी भी भाषा पर अपनी बपौती समझ, समाज में साम्प्रदायिक लड़ाई- झगड़े करवाकर लोगों के अन्दर अनचाहा भय पैदाकर समाज की शान्ति भंग करके अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने वाले वर्ग की नंगी दास्ताँ है "हनीफ़ मदार" की यह कहानी - अनिता चौधरी

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.