मौत के बाद भी आवाज़ ज़िंदा है, ‘गौरी लंकेश’: आलेख (आरिफा एविस)

बहुरंग स्मरण-शेष

आरिफा 29 2018-11-17

इस तरह की हत्याओं का ये पहला मामला नहीं हैं. पहले भी आवाज उठाने वालों को मौत के घाट उतार दिया. दाभोलकर ,पनसारे ,कलबर्गी और गौरी लंकेश में एक ही चीज कॉमन थी वो यह कि उनकी आवाज जनता की आवाज बनी थी. शोषित, उत्पीड़ित, अंधविश्वास और झूठे आडम्बरों के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोल रखा था जो लगातार इन्सान को वैज्ञानिक चेतना से लैस करने का काम कर रहे थे.लेखन के जरिये हो या सामाजिक गतिविधियों के जरिये जिसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे .

मौत के बाद भी आवाज़ ज़िंदा है

बंगलूर की पचपन वर्षीय पत्रकार,सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की उनके घर पर गोली मारकर हत्या कर दी गयी. उनकी एक पहचान थी जिसकी वजह से वो सबसे अलग थी, वो यह कि तर्क और न्याय आधारित बात करना . अपनी इसी खासियत की वजह से गौरी इतनी मशहूर हुई कि विरोधियों के गले की हड्डी बन गयीं.

आरिफा एविस

गौरी लंकेश की मौत वर्तमान व्यवस्था के ताबूत की आखिरी कील है. उनकी मौत जाया नहीं जायेगी.लेकिन आज अगर मैं चुप रही तो कल मेरे लिए भी कोई आवाज उठाने वाला नहीं होगा. गौरी की हुई हत्या इस बात का प्रमाण है कि वो गौरी से डरते थे और डर इस कदर बढ़ा कि उसकी हत्या करके ही चैन की साँस ली होगी. लेकिन वो इस बात को भूल गये कि किसी इंसान को तो मारा जा सकता है लेकिन उसके विचार को नहीं. आज एक गौरी को मारा है कल हजारों लाखों पैदा होंगी जो उनकी आँखों में आँखे डालकर सवाल करेंगी हो रहे अत्याचार और अन्याय के खिलाफ .

इस तरह की हत्याओं का ये पहला मामला नहीं हैं. पहले भी आवाज उठाने वालों को मौत के घाट उतार दिया. दाभोलकर ,पनसारे ,कलबर्गी और गौरी लंकेश में एक ही चीज कॉमन थी वो यह कि उनकी आवाज जनता की आवाज बनी थी. शोषित, उत्पीड़ित, अंधविश्वास और झूठे आडम्बरों के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोल रखा था जो लगातार इन्सान को वैज्ञानिक चेतना से लैस करने का काम कर रहे थे.लेखन के जरिये हो या सामाजिक गतिविधियों के जरिये जिसे उनके विरोधी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे.

इतिहास भी गवाह है कि वैज्ञानिक सोच और तर्क को हमेशा दबाया गया. लेकिन तर्क आज नहीं तो कल सही साबित तो होता ही है.इस तरह की हत्याओं से यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि अगर कोई वैज्ञानिक सोच, तर्क और न्याय की बात करेगा उसका यही हश्र होगा. तो क्या मारे जाने के डर से आवाज उठाना बंद कर दें और सत्ता धारकों की चापलूसी करें. इन हत्याओं पर चुप्पी साथ ली जाए .या विरोध किया जाए ताकि उन्हें भी यह पता चले कि उन्होंने व्यक्ति को मारा उसके विचार को नहीं. आज एक गौरी खत्म हुई है तो क्या हुआ सैकड़ों गौरी भी तो पैदा हो गयीं. जहाँ एक तरफ विरोध दर्ज करना होगा वहीँ दूसरी तरफ समझने की जरूरत है कि आखिर इस तरह की घटनाओं के विरुद्ध क्या करने की जरूरत है. यह तो तय है कि कोई भी सत्ता में क्यों न हो अगर उसने सत्ता के खिलाफ लिखा है उसका अंजाम बहुत बुरा होता है.

लेकिन सिर्फ विरोध करने से कुछ नहीं होगा उनका जो असली मकसद था उसको पूरा करने की ताकत भी रखनी होगी. अगर हम ऐसे ही बंद कमरे से आवाज उठाते रहे तो कुछ नहीं होगा. अपनी सोच को पैना करना होगा उनकी हर एक कारवाही पर गौर करना होगा . वरना आज उनकी बारी थी कल हमारी बारी होगी और हमारी मौत पर भी यही हाल होगा..

इस दौरान जो डर का माहौल पैदा किया जा रहा है वो कम खतरनाक नहीं है.डर की राजनीति खेली जा रही है. इसे ही अंदरूनी आतंकवाद कहा जाये तो गलत नहीं होगा .कोई आपको धर्म के नाम पर मार देगा कोई जाति के नाम पर , अंधविश्वास को बढ़ावा, असली मुद्दों से भटकाने के लिए धर्म, जाति, गाय, मंदिर -मस्जिद, जैसे मुद्दों में उलझा कर रखा जा रहा है ताकि कोई रोटी रोजी की बात ना करे. अपने खिलाफ हो रहे अन्याय की बात ना करे. उनकी ये बात तब तक साबित होती रहेगी, जब तक कि कोई तर्क और वैज्ञानिक सोच को सामने नहीं लाता और ऐसी सोच को रखने वाले को नक्सली, आतंकी, अधर्मी करार कर उसकी मौत को सही साबित किया जाता रहेगा अखबारों , बेतुके बयानों से, सोशल मीडिया पर गाली गलौज करके या फिर जश्न मना कर.. आज भी जो लोग सोशल मीडिया पर उनकी मौत को जायज ठहरा रहे हैं वो इंसानियत का चोला उतार चुके हैं, वो सिर्फ धर्म और जाति की आड़ में ऐसी प्रतिक्रिया कर रहे हैं. उनके लिए यह बात कोई माइने नहीं रखती कि सत्ता की गलत नीतियों के कारण गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और अमीर . जो इस न्याय की बात करेगा उसके साथ क्या किया जाना है हुकुमत अच्छी तरह जानती है. जिसके वजह है कि हुकूमत करना आसान होगी. सत्ता कोई भी क्यों ना हो अपने विरोधियों को नस्तोनाबूद कर देती है. लेकिन वो भूल इतिहास भूल जाती है कि अँधेरे दौर के बाद रौशनी का दौर भी आता है और इस रौशनी को लाने के लिए लोग लगातार प्रयास भी करते है सफल भी होते हैं.

आरिफा द्वारा लिखित

आरिफा बायोग्राफी !

नाम : आरिफा
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 198 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 371 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.