चुप रहना कविता का धर्मः डॉ0 रामवचन राय

रंगमंच साहित्यक गतिविधिया

अरुण 82 2018-11-17

साहित्यिक गतिविधियों के अंतर्गत पटना से ‘प्रभात सरसिज’ के काव्य संग्रह ‘लोकराग‘ के लोकार्पण पर ‘अरुण नारायण’ की रिपोर्ट ……|

चुप रहना कविता का धर्मः डॉ0 रामवचन राय 

अरुण नारायण

अरुण नारायण

‘प्रभात सरसिज’ के काव्य संग्रह ‘लोकराग‘ के लोकार्पण पर

‘कविता फैलाव की विधा नहीं, कम में कहने की कला है। इसके माध्यम से पूरी एक दुुनिया उजागर हो जाती है। ऐसा संयोग कवि प्रभात की कविताओं में है। षब्दों का चयन और खास किस्म की इनकी भाषा हमें आकर्षित करती है।’
ये बातें वरिष्ठ समालोचक डाॅ. रामवचन राय ने ‘लोकराग’ नाम कविता पुस्तक के विमोचन समारोह में कही। कवि प्रभात सरसिज के इस पहले संकलन की यह लोकार्पण गोष्ठी रुक्मिणी मेमोरियल एजुकेशनल ट्रस्ट द्वारा पटना के महाराज काम्पलेक्स स्थित टेक्नो हेराल्ड सभागार में की गई। कवि प्रभात के 66वेें जन्मदिन पर आयोेजित इस पुस्तक का लोकार्पण खगेंद्र ठाकुर, शिवानंद तिवारी, रामवचन राय, हषीकेश सुलभ ज्योतिंद्र मिश्र ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम का संचालन अनीश अंकुर और धन्यवाद ज्ञापन अरुण नारायण ने किया।
डाॅ.रामवचन राय ने कहा कि प्रभात सरसिज को मैं जानता रहा हूं, सुनता रहा हूं। इनका संग्रह ‘लोकराग कल मिला तो लगा कि इनसे तो बहुत पहले ही मिलना चाहिए था। इनका संग्रह हो सकता है कि भौतिक रूप से कागज पर छपे अब मिले लेकिन इसे पढ़ते हुए स्पष्ट आभास होता है कि यह किसी नए कवि का संग्रह नहीं है। प्रकाषन के प्रति उदासीनता के कारण पाठक जगत इनकी प्रतिभा से वंचित था। अज्ञेय कहते थे कि इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि एक हजार पेड़ कटते हैं तो एक किताब छपती है। उन्होंने कहा कि इतने मितव्ययी, संकोची और षब्दों को कम खरचने वाले व्यक्ति दुर्लभ हैं। आज के कवि तो संख्या गिनाते हैं। कविता की रचना प्रक्रिया पर प्रकाष डालते हुए डाॅ. राय ने कहा कि चुप रहना कविता का धर्म भी होता है। यह एक ऐसी विधा है जिसमें सही वक्त पर उसकी आवाज प्रकट होती है। उन्होंने कहा कि कविता के बारे में कुछ कहने से बचना बड़ी बात है। जो कवि उम्र के इस लंबे पड़ाव पर जाकर प्रकाषन के प्रति सजग, सचेष्ट हुआ हो, ऐसी चुप्पी कविता की ही बात बोलेगी। बात ही राज खोलेगी यह अतिरिक्त संजम प्रभात जी में है। लोग आज हड़बड़ी में हैं ऐसे व्याकुल और आपाधापी वाले समय में प्रभात सरसिज जैसी निष्चिंतता दुर्लभ गुण है। मुझे पछतावा हुआ कि पहले इनसे क्यों नहीं मिला। तिवारी जी ने गहराई में जाकर इसकी पड़ताल की है। स्मृतिगंधा हैं ये कविताएं। ऐसी स्मृति षक्ति कि उस कली की गंध भी स्मृति में आ जाती है। षांति निकेतन के परिवेष में अधिकांष कविताएं लिखी गई हैं। स्मृतियों के प्रति, अतीत, परिवेष और प्रकृति के प्रति ऐसा रुझान स्वाभाविक है। प्रभात षब्दों के चयन मंे मितव्ययीता बरतते हैं।
arunडाॅ.रामवचन राय ने कहा कि कविता फैलाव की विधा नहीं, कम में कहने की कला है। इसके माध्यम से पूरी एक दुुनिया उजागर हो जाती है। ऐसा संयोग कवि प्रभात की कविताओं में है। षब्दों का चयन और खास किस्म की इनकी भाषा हमें आकर्षित करती है।
फ्रांसीसी कवि पाॅल बेलरी की चर्चा करते हुए उन्होंने बतलाया कि उन्होंने कविता की रचना प्रक्रिया पर बहुत काम किया है। मलार्मे की उनकी भेंट आंद्रेविच ने करवाते हुए कहा कि नौजवान है भविष्य में एक बड़ा कवि बनेगा। अरसे बाद दोनों की मुलाकात किसी समारोह में हुई तो पाॅल बेलरी ने उनसे पूछा कि आजकल क्या कर रहे हो? तो उन्होंने कहा कि इतने दिनों में एक कविता लिखी है। वे 23 विष्वविद्यालयों में कविता के अध्यक्ष बनाए गए। कविता की बुनावट पर, उसकी रचना प्रक्रिया पर उन्होंने बहुत कमाल का काम किया है। उन्होंने उस एक संग्रह के जरिए एक नई हलचल खड़ी की, एक नई सौगात समाज को दी। नलिन विलोचन षर्मा इसे वयस्क कविता कहते थे। प्रौढ़ प्रतिभा का प्रौढ़िक प्रकर्ष, उंचाई। काव्य प्रतिभा जहां षीर्ष पर पहंुचती है वह अभ्यास प्रभात सरसिज में है। वह अभ्यास इनमें है इसका मैं स्वागत करता हूं। पिछले दौर की युवा कविता में सामयिकता से टकराहट तो है लेकिन उसमें षाष्वतता नहीं है प्रभात सरसिज की कविताओं में ये दोनों ही चीजें एक साथ मौजूद हैं। मनुष्य के भीतर की घृणा, प्रतिस्पर्धा- इन कवितााओं में है। उन्होंने प्रभात की ‘कवि जगपति’ कविता की चर्चा की। कहा कि सामाजिक क्रांति की प्रगतिषील चेतना इसमें अभिव्यक्त हुई है। यह ऐसी भाषा में कही गई है कि नारा नहीं लगता इन्होंने साफ सुथरी मंजी हुई भाषा रची है।
arunवरिष्ठ आलोचक डाॅ. खगेंद्र ठाकुर ने कह कि प्रभात जी से मेरा परिचय पुराना है उस समय से जब वे प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में 1970 में पटना आए थे। उनकी अपनी काव्य चेतना ऐसी रही है कि उनसे वैचारिक तालमेल बैठा नहीं रहा। उनमंे श्रेष्ठ कवि की संभावना थी जो ‘लोकराग’-नामक इस संकलन में फलित हुई है। उन्होंने कहा कि हिंदी में आमतौर पर जो लेखक आते हैं उनकी चेतना मध्यवर्गीय हुआ करती है जब कभी इससे अलग होती है तो उपर उठती है, कभी दूसरी तरफ भी जाती है। उन्होंने माना कि प्रभात की इन कविताओं में प्रधान रूप से मनुष्यता को व्यक्त करने की कोशिश की गई है। काव्य के साथ व्यक्त करने वाली इनकी भाषा बहुत समर्थ है। उन्होेंने कहा कि प्रभात में लोक चेतना को व्यक्त करने वाली आम फहम भाषा नहीं है।
हषिकेश सुलभ ने कहा कि प्रभात सरसिज की छिटपुट कविताएं सोषल मीडिया पर देखा-पढ़ा है। चंडीदास और उसकी प्रेमिका पर लिखी गई कविता का खासतौर से जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि प्रभात सरसिज में एक अव्वल कवि की तमाम संभावनाएं मौजूद हैं। इनकी कविताएं हिंदी काव्य परंपरा की मुख्यधारा को गहरे रूप से श्पर्श करती हुई विस्तार पाती हैं जिनमें आने वाले कल की चिंताएं आप गहन रूप में पाएंगे।
lokrag-cover-c13शिवानंद तिवारी ने कहा कि आम आदमी के संघर्ष को कविताएं आवाज देती हैं, उन्हें दूर तक फैलाती हैं। उन्होंने कहा कि प्रभात की कविताएं संघर्ष के इस स्वर को विस्तारित करती हैं। उन्होंने कहा कि वे कविताएं पढ़ते रहे हैं उनमें अपने समय को लेकर गहरा चिंतन है। मेरा यह सौभाग्य रहा कि रघुवीर सहाय के पास रहने का मौका मिला और ‘दिनमान’ में उन्होंने मुझे छापा भी। अषोक सेक्सरिया के संपर्क में आने के बाद साहित्य में मेरी रुचि जगी। उन्होंने कहा कि श्रीकाकुलम और भोजपुर जैसी जगहों से मेरा ताल्लुक्य रहा है उन्होंने माना कि कवि के अंदर संवेदना का दायरा जितना बड़ा होगा वह उतनी ही अच्छी कविता कहेगा।
श्रीराम तिवारी ने कहा कि प्रभात सरसिज राग रंग और स्मृतियों के कवि हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय में लोग समाज से, अपनों से, यहां तक की खुद से अलग किए जा रहे हैं यह मनुष्य विरोधी हरकत है। इसी हरकत के प्रतिरोध में ‘लोकराग’ कविता के एजेंडों को पहाड़ों, पेड़ों, चिड़ियों, अपने प्रेम, अपने लोगों के पास पहंुचाने का एक सही समय पर सार्थक उपक्रम है। प्रभात के कवि कर्म का अलगाते हुए उन्होंने कहा कि कविता में मानसिक अपंगता का अंत है-लोकराग। आज तक का ब्योरा है कि हम वास्तविक जीवन नहीं जी रहे हैं जहां साझा और सरोकार हो। शुरू से हमारी दुनिया मानसिक अपंगता की आत्मकेन्द्रित दुनिया रही है। निहित स्वार्थों की ताकत के आगे हम बुद्धिहीन जीते रहे हैं। ताकत वाले नहीं चाहते कि सामान्य लोग बुद्धिमत्ता के पास फटकें। हिंदी की समकालीन कविता की चर्चा करते हुए श्री तिवारी ने कहा कि आज की समकालीन कविता में उक्ति-चमत्कार का बाजारवाद घुसता जा रहा है जो यथार्थ की फोटोग्राफी से भी भिन्न एक तरह का फिजूल अति यथार्थवाद से ग्रसित होता जा रहा है। प्रभात सरसिज ने यहीं अपने को बचाया है।संग्रह की शुरू की आधे तक की कविताओं में नदी के फूटने की त्वरा और चंचलता है जो आगे चलकर पहाड़ सीरीज की छः कविताओं के बाद तरंगमुक्त थिर गद्य होकर समाज के बीच बहती है। यही लोक तक पहुँचने, उसमें पर्यवसित होने का राग और रंग है जिसका माध्यम हैं स्मृतियां-पत्थरों के बीच गुजरने के धार की स्मृतियां। पर ये स्मृतियों तक ही नहीं रुकते। परिवेश के स्थिर पेड़ों पर अपने ही नुचे हुए पंखों से मन के पाखी का घोसला बनाते हैं। इसी की चहचहाहट है इनकी कविताएं।
युवा कवि प्रत्यूषचंद्र मिश्रा ने प्रभात सरसिज को उनके 66वें जन्मदिन की वधाई दी और कहा कि आदमी के जीवन जगत से रिष्ते इन कविताओं में अभिव्यक्त हुए हैं। उन्होंने इस अवसर पर प्रभात की ‘नातेदार षब्द’ शीर्षक कविता का पाठ किया।
कथाकार षेखर ने कहा कि कविता एक सचेतन क्रिया है जो लड़ते हुए आदमी का संघर्ष ही है। इसकी पूरी प्रक्रिया आप ‘लोकराग’में देख सकते हैं। कवि जगपति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आज षंख कलाइयों को सजाने की चीज हो गई है। यह जनता के अनेकों स्वरों को फंूकता है। कवि लोगों की चेतना को भर रहा है रंगों के विस्फोट से। नक्सलबाड़ी आंदोलन की चर्चा करते हुए षेखर ने बतलाया कि प्रभात का भले ही यह पहला संग्रह हो लेकिन प्रभात 1973 में प्रलेस के सचिव हुए और तब से संघर्ष की हर प्रक्रिया में षरीक रहे। उन्होंने कहा कि इस संग्रह का नामकरण ‘लोकराग’ नहीं ‘जनराग’ होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि यह आकस्मिक नहीं है कि प्रभात को लोगों ने मुक्तिबोध ये जोड़ा। प्रेम की जुगाली करने वाले अघाये लोगों की कविता नहीं है यह संघर्ष करने वाले लोगांे की कविता है। प्रभात थोड़े शालीन हैं इसलिए जनकवि नहीं हुए।
प्रभात सरसिज ने कहा कि सन 1971 से 1980 तक उन्होंने डेढ़ सौ कविताएं लिखीं लेकिन उसे संग्रह के रूप में लाने में संकोच होता रहा। इस संग्रह में 1982 से 1987 के अंत की कविताएं हैं। उन्होंने कहा कि ‘लोकराग’ उनकी सबसे कमजोर कविता है लेकिन उसी कविता का उन्होंने पाठ भी किया।
प्रभात के ग्रामीण और बालसखा ज्योतिंद्र मिश्र ने भी प्रभात सरसिज के संबंध में अपने अनुभव साझा किए। इस मौके पर उन्होंने प्रभात पर लिखी एक कविता भी सुनाई।
समारोह में श्रीकांत, कवि विमल कुमार, अरुण षाद्वल, नरेंद्र कुमार, राकेश, कविजी समेत दर्जनों लेखक, संस्कृतिकर्मी समेत प्रभात सरसिज की पत्नी,पुत्र-अभिषेक,धनंजय,एवं पुत्रवधुएं भी उपस्थित थीं।

अरुण द्वारा लिखित

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बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

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