शांतिनिकेतन की यात्रा : संस्मरण (बाबा मायाराम)

बहुरंग संस्मरण

बाबा मायाराम 53 2018-11-17

यहां घूमते घामते मैं सोच रहा था, क्या जरूरत थी टेगौर जैसे संभ्रांत वर्ग के व्यक्ति को जंगल में रहने की और शांतिनिकेतन की स्थापना की। इसका जवाब उनके लिखे लेखों में मिलता है। वे भारत में बाबू बनाने वाली शिक्षा से अलग अच्छा इंसान बनाने की शिक्षा चाहते थे। वे कहते थे, बच्चों का स्वाभाविक विकास हो, न कि उन्हें शुरू ही उन्हें किताबी कीड़ा बना दिया जाए। पुस्तकीय ज्ञान के अलावा कई और रास्ते हैं, ज्ञान की खोज के। वे एक जगह लिखते हैं कि “वास्तव में पुस्तकों द्वारा ज्ञान प्राप्त करना हमारे मन का प्राकृतिक धर्म नहीं है। वस्तु को सामने देख-सुनकर उसे हिला-घुमाकर, अपनी आंखों से देखभाल तथा जांच करके ही आविष्कृत ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।”……….

शांतिनिकेतन की यात्रा

बाबा मायाराम

हाल ही में शांतिनिकेतन जाना हुआ। यह दूसरी बार था जब मैं  शांतिनिकेतन गया था। दो साल पहले भी जाना हुआ था। इसके बाद पिछले साल हम रवीन्द्रनाथ टेगौर के कोलकाता स्थित ठाकुरबाड़ी जोड़ासांको भी गए थे।

इस बार जाने की वजह मेरा बेटा बना, जो वडोदरा में चित्रकला की पढ़ाई कर रहा है। कोलकाता से बोलपुर की दूरी करीब 170 किलोमीटर है। बोलपुर वही जगह है जहां शांतिनिकेतन स्थित है। यह पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में है।

निकेतन का अर्थ होता है घर और शांति, जहां शांति का वातावरण हो, शांति का अहसास हो। आज चारों ओर अशांति, बेचैनी के इस माहौल में हम बार बार सोचते हैं कि जहां शांति हो वहां चला जाए। शांतिनिकेतन से अच्छी जगह क्या हो सकती है। इसी खोज में है शांतिनिकेतन की यात्रा।

सात नवंबर की दोपहर कोलकाता के प्रसिद्ध हावड़ा बृज से शहर का विहंगम दृश्य देखते हुए हावड़ा रेलवे स्टेशन के लिए निकले। रास्ते में सजे धजे मानव समूह, सड़क पर चलता ट्राम (रेल की तरह जो सड़कों पर बिछी पटरियों पर दौड़ता है), पोटलियां लेकर रेंगते स्त्री-पुरूष, दौड़ते भागते लोगों को देखते हुए और भीड़ से बचते बचाते रेलवे स्टेशन पहुंचे और ट्रेन पकड़ी।

शांति निकेतन

ट्रेन की खिड़की से दोनों ओर धान के पके खेत थे। केला, बांस और छोटे-बड़े तालाबों में सिंगाड़े की खेती थी। दोई मिष्टी, झालमुड़ी का आनंद लेते हुए हम कुछ घंटों में बोलपुर पहुंच गए। रात्रि विश्राम हमने हमारे पारिवारिक मित्र व प्राध्यापक के घर किया।

दूसरे दिन 8 नवंबर की सुबह जल्द ही हम शांतिनिकेतन पहुंच गए।  लम्बा-चौड़ा हरे पेड़ों से भरा परिसर मोह रहा था। अमराई की छांव में बच्चे पढ़ रहे हैं। कभी टेगौर ने अपनी कविताएं इन्हीं पेड़ों के नीचे पक्षियों के गान के साथ लिखी हैं। वे अपनी कविताओं में प्राकृतिक हवा और पक्षियों के गान का आभास लेकर आते थे। रवीन्द्र संगीत, जो बंगाल में आज भी काफी लोकप्रिय है, कई लोगों की जिंदगी इसके बिना सूनी हो जाती हैं, भी यही रचा गया था।

खादी का कुर्ता, बगल में टंगा रंगीन झोला और बेतरतीब दाढ़ी वाले लोग यहां घूमते हुए दिखे। आकर्षक पीली गणवेश में विद्यार्थी यहां पेड़ों के नीचे पढ़ रहे हैं। शिक्षक सीमेंट के ऊंचे चबूतरे पर बैठकर पढ़ा रहे हैं। हमने परिसर का एक चक्कर लगाया। साइकिल रिक्शा वाले और गाइड बता रहे थे टेगौर का घर यहां हैं। तारीखों के साथ उनका जीवनवृत्त बता रहे थे।

कंकरीट, बालू और खुरदरी सीमेंट से बनी रामकिंकर बैज की मूर्तियां के सामने हम रुके। मैंने बेटे को फोटो लेने के लिए कहा। उसने कहा नहीं, आज मैं नहीं आप फोटो लो, मैं कुछ स्कैच बनाऊंगा। मैंने कुछ फोटो लिए। रामकिंकर बैज मशहूर मूर्तिकार और चित्रकार थे। मशहूर चित्रकार नंदलाल बोस शांतिनिकेतन के पहले शिक्षकों में से एक रहे हैं।

यहां घूमते घामते मैं सोच रहा था क्या जरूरत थी टेगौर जैसे संभ्रांत वर्ग के व्यक्ति को जंगल में रहने की और शांतिनिकेतन की स्थापना की। इसका जवाब उनके लिखे लेखों में मिलता है। वे भारत में बाबू बनाने वाली शिक्षा से अलग अच्छा इंसान बनाने की शिक्षा चाहते थे।

वे कहते थे बच्चों का स्वाभाविक विकास हो, न कि उन्हें शुरू ही उन्हें किताबी कीड़ा बना दिया जाए। पुस्तकीय ज्ञान के अलावा कई और रास्ते हैं, ज्ञान की खोज के। वे एक जगह लिखते हैं कि “वास्तव में पुस्तकों द्वारा ज्ञान प्राप्त करना हमारे मन का प्राकृतिक धर्म नहीं है। वस्तु को सामने देख-सुनकर उसे हिला-घुमाकर, अपनी आंखों से देखभाल तथा जांच करके ही आविष्कृत ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।”

टेगौर ने शिक्षा को कंकरीट की चारदीवारी से निकालकर प्रकृति, कला और लोक जन से जोड़ा। वहां से सीखने का नजरिया दिया। यहां कई तरह के तीज त्यौहार मनाए जाने की परंपरा डाली। शांतिनिकेतन में बहुत से उत्सव होते रहते हैं। जिसमें से दोल ( झूला) उत्सव, होली और संथाल आदिवासियों के तीज-त्यौहार भी मनाए जाते हैं।

शांति निकेतन

अब हम संग्रहालय आ गए थे। यहां टेगौर जी की हस्तलिखित कविताएं, पत्र और कहानियां फ्रेम की हुई लगी हैं। उनके ऐनक और रोजाना इस्तेमाल किए जाने वाले सामान रखे हैं। उन्होंने कई विधाओं में हाथ आजमाया। कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता और चित्रकला।

उन्होंने अपने उत्तरार्ध में चित्रकला सीखी थी।  60 वर्ष की उम्र के बाद चित्रकारी का काम शुरू किया। अक्षरों की सजावट और अपने लिखे हुए को कभी काटते और उससे जो आकृति बनती, उससे प्रेरणा लेकर चित्रकारी की।

उनकी सोच विश्वव्यापी थी, शायद इसीलिए उन्होंने इसका नाम विश्व भारती रखा। वे कोलकाता छोड़कर शांतिनिकेतन आ गए थे। 1901 में उन्होंने एक आवासीय स्कूल शुरू किया था जिसने बाद में एक विश्वविद्यालय का रूप ले लिया। प्राइमरी शिक्षा से लेकर उच्चतर शोध और अकादमिक कार्य होने लगा।

विश्व भारती में शोध और अध्ययन को प्रमुखता दी गई। संगीत और कला की शिक्षा के लिए कला भवन और संगीत भवन बने। नृत्य की शिक्षा भी दी जाने लगी। श्री निकेतन में ग्रामीण विकास को आधार बनाया गया। और खुद कवि गुरू साहित्य सृजन में लगे रहे।

कवि गुरू, यह नाम टेगौर के लिए महात्मा गांधी ने दिया था। और टेगौर ने गांधी जी के लिए महात्मा का संबोधन दिया था। दोनों कुछ मतभेदों के बावजूद एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। गांधी जी के कहने पर छात्रावासों में स्वयं के काम स्वयं काम करने की परंपरा डाली गई थी।

जब टेगौर शांतिनिकेतन में होते थे तब विद्यार्थियों का उनसे मिलने तांता लगा रहता था। विद्यार्थी उनसे अपनी उत्तरकापियों में उनके हस्ताक्षर करवाते थे। उनसे कविताएं सुनते थे।

यहां पढ़ने वालों में बहुत जाने-माने लोग हैं जिनमें अमत्य सेन, इंदिरा गांधी, सत्यजीत रे, शिवानी और यहां सूची लम्बी है। अब टेगौर नहीं हैं। आजादी मिलने के पहले (1941) में चले गए। लेकिन हमने शिक्षा के बारे में उनके विचारों को तरजीह नहीं दी। अब शांतिनिकेतन वह नहीं है, जो पहले था। पर्यटन की शक्ल ले चुका है। परिसर, पेड़, पत्ते और फूल और जीव-जगत और लोक जीवन वही है, पर देखने वालों की नजर बदल गई है।

अब हम टेगौर के घर के सामने थे। वहां पेड़ के नीचे एक लोक गायक मधुर बाउल गीत गा रहा था। हम रुक गए। मैं सोच रहा था एक अनपढ़ लोक गायक भी विश्वविद्यालय का हिस्सा है। क्या उससे सीखने की तमीज हमें आएगी। कुछ लोग उसकी छवि ले रहे थे। अब हमारे लौटने का समय हो गया था। पर मन वहीं अटक गया।

बाबा मायाराम द्वारा लिखित

बाबा मायाराम बायोग्राफी !

नाम : बाबा मायाराम
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 73 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 107 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 229 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.