विचलन भी है जरूरी: ‘हमरंग’ संपादकीय (हनीफ़ मदार)

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हनीफ मदार 26 2018-11-17

विचलन भी है जरूरी हनीफ मदार कल चाय की एक गुमटी पर दो युवाओं से मुलाक़ात हुई दोनों ही किन्ही मल्टीनेशनल कम्पनियों में कार्यरत हैं | इत्तेफाक से दोनों ही कभी मेरे स्टूडेंट रहे हैं | उन्होंने मुझे पहचान लिया और बातें शुरू गई | रोजगार होने के बावजूद भी वे दोनों मुझे खुश नहीं दिख रहे थे | बात-चीतों में पता चला कि दोनों ही इस महंगे समय और प्राइवेट कम्पनियों की न्यूनतम तनख्वाह में पारिवारिक जीविकोपार्जन की समस्या से ग्रसित थे | इन नौकरियों को पाने की योग्यता लेने के लिए उनमे से एक के पिता को जहाँ एक बीघा खेत बेचना पडा वहीँ दूसरे पर पढ़ाई के लिए लिया गया कर्जा था, जिसे चुका पाने की नाउम्मीदी से निराशा भी थी | मैंने कहा तुमने सरकारी नौकरी क्यों नहीं तलाशी | वे बोले कैसी बात करते सर ? अभी आपने नहीं देखा अकेले उत्तर प्रदेश में ही ३६५ चपरासियों की नौकरी के लिए २३ लाख फार्म पहुंचे | जिसकी आहर्ता पांचवीं पास थी उसके लिए बड़ी संख्या में पी. एच. डी., एम्. बी. ए., और अन्य स्नातकों के फार्म थे |

कल चाय की एक गुमटी पर दो युवाओं से मुलाक़ात हुई दोनों ही किन्ही मल्टीनेशनल कम्पनियों में कार्यरत हैं | इत्तेफाक से दोनों ही कभी मेरे स्टूडेंट रहे हैं | उन्होंने मुझे पहचान लिया और बातें शुरू गई | रोजगार होने के बावजूद भी वे दोनों मुझे खुश नहीं दिख रहे थे | बात-चीतों में पता चला कि दोनों ही इस महंगे समय और प्राइवेट कम्पनियों की न्यूनतम तनख्वाह में पारिवारिक जीविकोपार्जन की समस्या से ग्रसित थे | इन नौकरियों को पाने की योग्यता लेने के लिए उनमे से एक के पिता को जहाँ एक बीघा खेत बेचना पडा वहीँ दूसरे पर पढ़ाई के लिए लिया गया कर्जा था, जिसे चुका पाने की नाउम्मीदी से निराशा भी थी | मैंने कहा तुमने सरकारी नौकरी क्यों नहीं तलाशी | वे बोले कैसी बात करते सर ? अभी आपने नहीं देखा अकेले उत्तर प्रदेश में ही ३६५ चपरासियों की नौकरी के लिए २३ लाख फार्म पहुंचे | जिसकी आहर्ता पांचवीं पास थी उसके लिए बड़ी संख्या में पी. एच. डी., एम्. बी. ए., और अन्य स्नातकों के फार्म थे |

दरअसल यह घटना एक बानगी भर है इससे देश भर में बेरोजगारी का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है | और यह निराशाजनक स्थिति इन दो युवाओं की ही नहीं है लगभग ८० प्रतिशत रोजगार युक्त युवाओं की कमोबेश यही हालात है | मल्टीनेशनल कम्पनियों में १२ से १६ घंटे काम करने के बाद 2 से 3 घंटे बसों और ट्रेनों में धक्के खाने के बाद घर पहुंचे इन युवाओं के सामने बच्चे की मंहंगी फीस, मकान का किराया, दूध वाले, राशन वाले का हिसाब और पत्नी या माँ की बीमारी जैसी आर्थिक परिवारिक समस्याएं दरवाजे पर ही मुंह बाए खड़ी मिलती हैं | तब इनके पास अपना ब्लड प्रेसर बढ़ने और मानसिक कुंठा में पत्नी से झगड़ने के अलावा कोई चारा नहीं होता | यह हालात अल्पायु में ही सुगर और हार्ट डिजीज के मुख्य कारण भी बन रहे हैं | इन युवाओं से बात-चीतों में उनकी सैलरी की चर्चा आते ही उनकी आँखें नम होने लगतीं हैं | इससे यह तो साफ़ तौर पर नज़र आता है कि हम विकास के नाम पर किस तरफ बढ़ रहे हैं |

एक तरफ विशाल भारतीय संस्कृति, परम्परा और राष्ट्रवाद के उत्थान, बचाव और ज़िंदा रखने की चिल्ल-पों है तो दूसरी तरफ मूल भारतीयता की सांस्कृतिक धरोहर हमारे तीज-त्यौहार की गरिमा और खुशियों का हनन करता, इन कम्पनियों का कुचक्र युवा पीढी को और अवसाद ग्रस्त कर रहा है, जब होली, ईद, दशहरा और दिवाली जैसे त्यौहारों पर अवकाश के बावजूद रात के १२ बजे तक कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करते युवा की शारीरिक और मानसिक स्थिति का आंकलन सहज ही लगाया जा सकता है | यहाँ सारे नियम कायदे क़ानून ताक में धरे बिराजते हैं, इनके खिलाफ प्रतिरोध को विकास अवरोधक तक की संज्ञा से नाबाज़ा जाता है |

दुनिया में सबसे ज्यादा युवा शक्ति वाले मुल्क की युवा ताकत आधुनिकता की अंधी दौड़ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तर्ज़ पर वर्तमान कम्पनी कानूनों के जाल में फंसकर कथित बौद्धिकता के साथ पुनः ग़ुलामी में जीने को विवश है | यह एक वर्ग विशेष “युवा वर्ग” की ही एक चुनौती एक समस्या है बाकी अलग-अलग वर्ग समूहों किसान, मजद्दूर, व्यापारी, स्त्रियाँ आदि की भिन्न-भिन्न अपनी समस्याएं हैं चुनौतियां हैं, सपनों के साथ धुंधली सी आशा है और निराशा के बीज भी | यह तमाम सामूहिक समस्याएं मूलतः जिस बिंदु पर जाकर एक होती हैं दरअसल वहीँ राष्ट्रीयता और भारतीय विकास की तस्वीर स्पष्ट होती है |

इसी समय में हमारे साहित्यिक, पत्रकार मित्रों के द्वारा कि ‘इन कविता या कहानियों के लिखने और छपने से क्या बदल जाएगा….. ? क्या सामाजिक और राजनैतिक बदलाव आ जायेंगे…. क्या समय की विभीषिका या मानवीय विकृतियाँ कम हो जायेंगी …?’ जैसे सवाल हैं वहीँ ‘बन्दूक मुक़ाबिल हो तो कलम उठाओ’ जैसे सूत्र वाक्य भी फरेब नहीं हैं | इसके आलावा हमारे सामने साहित्य में जनवादी चिंतनधारा की एक विशाल परिपाटी है जो न केवल हमें हमारे समय को गहराई से समझने की ताकत देती है बल्कि उससे हम ऐतिहासिक संदर्भों के साथ अपने समय से मुठभेड़ करने की एक चेतना भी ग्रहण कर पाते हैं |

बीसवीं सदी की शुरूआत ‘राष्ट्रीय पूँजीवाद के विकास का युग’ में राष्ट्रीयता की भावना के आधार पर चले “स्वदेशी आन्दोलन” के समय खुद प्रेमचंद भी राष्ट्रीय आन्दोलन में मजबूती के लिए विदेशी माल के बहिष्कार और स्वदेशी चीज़ों के अधिक इस्तेमाल के लिए चिंतित थे किन्तु बहुत जल्द उनकी यह समझ भी बनने लगी थी कि स्वदेशी आन्दोलन से मूल लाभ केवल तात्कालिक राष्ट्रीय पूंजीपति को ही हो रहा है और वे उसके खिलाफ हो गये | जबकि भारतीय पूंजीपति वर्ग के महान बौद्धिक राजनैतिक नेता भारतीय समाज की भुखमरी, गरीबी, बेकारी जैसी अनेक समस्याओं पर बात तो कर रहे थे किन्तु वे पूंजीपतियों से तमाम सम्पतियों पर काबिज़ होने के अधिकार को छीनने के हामी नहीं थे |

प्रेमचंद, यशपाल जैसे रचनाशील लोग उस समय में भी अपने अन्दर के साहित्यकार के विचलन को आम जन तक ले जा रहे थे | १९ अक्टूबर १९३२ को प्रेमचंद अपने लेख में स्पष्ट लिख रहे थे कि “इस बेकारी के ज़माने में आदमी को एक-एक पैसे की तंगी है | मजूरी सस्ती हो गई है कच्चा माल भी सस्ता हुआ है लेकिन कपडे के दाम जस के तस हैं | हम पेट काटकर जरूरत का महंगा सामन खरीदते हैं और मालिक शान से सुख भोग रहे हैं |” यह साहित्यिक आलाप सामाजिक आमजन को विचलित कर मुक्ति की मानवीय राह खोजने को विवश करता है |

अब सवाल यह उठता है कि क्या आधुनिक साहित्य की ऐतिहासिक दृष्टि की धार इतनी कुंद हुई है जो इन विभिन्न भारतीय जन समूह अपने भीतर पनपती निराशा की बजाय विचलन को जगह दे सकें….? या कि भारतीय जनवादी चिंतनधारा इतनी सुषुप्त हुई है कि आत्म विश्लेष्ण को ही नकार दिया फलस्वरूप जनवादी प्रतिवद्धता पर बुर्जुआ आत्म स्वरूप प्रभावी होने लगा | स्थितियां जो भी हों लेकिन निराशा की जगह विचलन के लिए हमें साहित्यिक और जनवादी आत्म चिंतन के वर्तमान विश्लेषण की जरूरत है |

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 119 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

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पंकज तिवारी 216 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

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अरविंद जैन 113 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

नोट-

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