भगवान् भरोसे…: व्यंग्य (हनीफ मदार)

व्यंग्य व्यंग्य

हनीफ मदार 18 2018-11-17

किसी भी व्यंग्य रचना की सार्थकता वक्ती तौर पर उसकी प्रासंगिकता में अंतर्निहित होती है | यही कारण है कि हरिशंकर परसाई, शरद जोशी आदि को पढ़ते हुए हम उसमें अपने वर्तमान के सामाजिक, राजनैतिक अक्स देखते हैं | हालांकि तकनीकी रूप से निरंतर बदलते समय में यह अक्स किसी रिक्त स्थान से सहज ही नजर आते हैं जिसकी पूर्ती पाठकीय मानसिक चेतना रचना से गुज़रते हुए स्वयं करती है तब लेखकीय दृष्टि वर्तमान को रेखांकित करती गुदगुदाते हुए चिंतन को विवश करती है | लगभग डेढ़ दशक पूर्व लिखा गया ‘हनीफ मदार’ का प्रस्तुत व्यंग्य छद्म परिवर्तन के साथ वर्तमान में भी पठनीय और प्रासंगिक है…..|

भगवान् भरोसे… 

हनीफ मदार

सुबह-सुबह हरकू और खरकू को जोर-जोर से लड़ते सुना तो अचम्भा हुआ, आज दोनों की एकता भंग कैसे हो गई…? हालांकि इस झगड़े से पूरे मोहल्ले को चैन भी मिला, क्यों न मिलता ! मोहल्ले की सबसे बड़ी कसक ही इनकी एकता थी | हमें सब बर्दाश्त है… तो क्या आपसी एकता भी सहन कर लें ? इसीलिए इससे पहले मोहल्ले भर ने अपनी सी खूब कोशिश भी की इन्हें अलग करने की, मगर कहाँ….? दोनों इतने असामाजिक जीव निकले कि लोगों ने खूब कान भरे लेकिन  दोनों में से किसी पर कोई असर ही नहीं हुआ |

      अब हमें इस बात का आश्चर्य कि आज अचानक कौन सी घुट्टी पीकर ये दोनों इतने सज्जन बन गए कि आपस में लड़ने जैसे सामाजिक काम में सुबह से ही जुटे हैं ? हालांकि आज हमें कुछ जरूरी काम था लेकिन सभ्य समाज का दायित्व-बोध होते ही पहुँच गये दूसरों के मामले में टांग अड़ाने | सोचा सम्पत्ति बंटवारे की जंग होगी, मगर हरकू, खरकू के झगड़े का कारण जानकार तो हम और भी दंग रह गये | झगड़ा था देश में भगवान् की उपस्थिति को सिद्ध करने का |

      हरकू जोर देकर खरकू से कह रहा था…. “देख तू अब भी मान जा, विदेशों की तो मुझे पता नहीं परन्तु हमारे देश में तो भगवान् हर जगह विद्यमान है, और इसे सिद्ध भी किया जा सकता है | और हाँ ! तुझे भी यह मानना पड़ेगा, तभी तेरा मेरा साथ रह पायेगा |” खरकू भी कहाँ कम था बोला “तेरे कहने भर से मान कर यूं तेरे साथ रहना भी कौन चाहता है…. पहले सिद्ध कर के बता न |” अब तक हमारी उत्सुकता भी चरम पर आ गई थी, हमने कहा “भाई हरकू तुझे बताना तो पड़ेगा कि तू भगवान की मौज़ूदगी को सिद्ध कैसे करेगा ?” एक और एक ग्यारह, खरकू को बल मिल गया बोला “हाँ सिद्ध कर…|”

      अब हरकू बताने लगा “आप लोग मुझे एक बात बताओ कि ये खरकू कहाँ नौकरी करता है..?” हमसे पहले खुद खरकू उछल पडा ‘लोकजन निर्माण विभाग’ में… तो…?”

“अब देख ! तेरे विभाग के चपरासी से बाबू तक, बाबू से अधिकारी तक सभी सड़कों की चंता न करके नैट की स्पीड और प्लानों पर चर्चा करते हुए वाट्सएप और फेसबुक में चिपके रहते हैं फिर भी सड़कें गड्ढा मुक्त हो रहीं हैं न…. कौन कर रहा है….? भगवान् | ऐसे ही देख ! जनसुनवाई पोर्टल पर तमाम विभागों की अनेक समस्याएं दर्ज होतीं हैं, जैसे तूने की थी अपने इस तिराहे की पानी भरी हुई ख़राब सड़क की ?”

“हाँ… तो..?”

“तूने इस सड़क या इस तिराहे पर किसी विभागीय कर्मचारी को देखा काम करते या कराते हुए..? नहीं न…|”

“हाँ तो, वहां कुछ काम हुआ ही कहाँ…?” “लेकिन तेरे पास मैसेज आया न समस्या निस्तारण का…?” “हाँ..|” “अब बता, उस समस्या का निस्तारण किसने किया… भगवान् ने | दफ्तरों में फाइलों का ढेर लगा है… कर्मचारी एक-दूसरे को बीवियों को मनाने के नुश्खे बता रहे होते हैं… कभी भी जाओ तो बताते हैं काम चल रहा है… फिर यह काम कौन चला रहा है… भगवान |”

      अब हम कुछ बोलते इससे पहले ही हरकू फिर बोल पड़ा “और सुनो जी… सरकारी स्कूलों में स्कूल की छतें गिराऊ हैं, मास्टर पूरे नहीं, बच्चों को बैठने को जगह नहीं है… फिर भी बच्चे पढ़ रहे हैं, देश पूर्ण साक्षर हो रहा है, कौन पढ़ा रहा है… भगवान् | सरकारी स्कूलों, में पेशाबघर नहीं हैं बाहर स्वच्छ विकास हो रहा है, कौन कर रहा है…. भगवान् |

      खरकू कुछ बोलता कि हरकू ने डांटा “अबे सुन ! अस्पतालों में गंदगी बजबजा रही है, दवाइयां और ऑक्सिजन मिल नहीं रही, डॉ अपने अस्पतालों में व्यस्त हैं फिर भी मरीज़ ठीक हो रहे हैं न. कौन कर रहा है….. भगवान | अरे और तो और रेलों के गार्ड और ड्राइवर या स्टेशन मास्टर सो भी जायं फिर भी गाड़ियाँ चलती रहती हैं…. कौन चलाता है…. भगवान | हाँ यदि कहीं टकरा या पलट जाय तो यह भी भगवान् की ही मर्ज़ी है |”

      खरकू बोला “हो गया पूरा देश…. ?” “देख, वैसे तो बहुत चीज़ें हैं लेकिन असल देश होता है अपनी सरकार और लोकतंत्र से | तो वहां भी देख ले ! लोकतंत्र की ताकत है संसद में विपक्ष… अब बिना विपक्ष के भी लोकतंत्र है न किसके भरोसे…? भगवान भरोसे | अब तक खरकू भी हरकू से सहमत होकर गले मिल गया भगवान की ही मर्ज़ी से 

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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हनीफ मदार 118 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

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