बंद ए सी कमरों में झांकते होरी, धनियाँ…, संपादकीय (हनीफ मदार)

अपनी बात अपनी बात

हनीफ मदार 37 2018-11-17

“ऐसा नहीं कि वर्तमान यथास्थिति का विरोध या प्रतिकार आज नहीं है, बल्कि ज्यादा है | एकदम राजनीतिज्ञों की तरह | कुछ हो न हो, बदले न बदले लेकिन व्यवस्थाई यथास्थिति का विरोध करके व्यक्ति सुर्ख़ियों में तो रहता ही है | शायद यही प्रजातांत्रिक तकनीक है | हमने भी शायद इसी सरल तरीके को अपना लिया है | रचना महत्वपूर्ण हो न हो व्यक्ति को महत्वपूर्ण बनना है तो विरोध करना है | और यह विरोध किसी ‘श्री’ या ‘अकादमी’ के अलंकरण में ही समाप्त हो लेता है | दरअसल लेखक और उसके बाद ‘बुद्धिजीवी’ शब्द ही किसी ‘आम’ से ख़ास या शायद इससे भी बहुत ऊपर हो जाता है | उस दर्जे को विशेष सुविधा, सम्मान की दरकार भी होती है | इतिहास गवाह है कि विशेष सुविधा-सम्मान सत्ता व्यवस्थाओं से ही प्राप्त हुए हैं, नंगे वदन भूखे पेट रात काटते घीसू, माधव या भगत से नहीं | फिर इस तर्क से कैसे मुंह फेरा जा सकता है कि “मुंह खाता है तो आँख झपती है |” इन आयोजनों में प्रेमचंद के चरित्रों की हिस्सेदारी शायद यूं भी उचित नहीं है कि आलीशान सुविधाओं को भोगते हुए उन पर चर्चा करें तो वे दोगला या बिका हुआ न समझ लें | या कहें गरीब का कोई इतिहास भी तो नहीं होता फिर उनके साथ खड़े होकर लाभ क्या है …? क्योंकि हमारी जद्दो-ज़हद खुद को इतिहास में शामिल करने की भी तो है | और इतिहास इन्हीं सत्ताओं ने लिखवाया है , जो तय कर रहीं हैं कि बच्चे किताबों में किसे पढेंगे और किसे नहीं |” (आलेख से)

बंद ए सी कमरों में झांकते होरी, धनियाँ…  

हनीफ मदार

क्या अजीब इत्तेफ़ाक है कि जब होरी, धनियाँ, घीसू, माधव, हल्कू, जैसे अनेक चरित्रों पर एक वर्गीय शोषण, दमन, और अत्याचार की ख़बरें निरंतर आ रहीं हैं ठीक इसी बीच इन चरित्रों की कराहटों को अपने शब्दों से आवाज़ देने वाले शिल्पी मुंशी प्रेमचंद की 136 वीं जयंती है | इसे एक अजीब स्थिति ही कहा जाएगा कि इन चरित्रों की वर्तमान पीढ़ी ने भले ही बहुत ज्यादा न सही किन्तु इनके पुरखों ने खुद को इंसान होने और उसके सामाजिक स्थापत्य के लिए संघर्षीय चेतना, प्रेमचन्द की समृद्ध साहित्यिक विरासत से ही ली हो, उन्हें नहीं मालूम कि आज क्या है ? जबकि देश भर में किसी फैशन की तरह प्रेमचंद जयंती पर अनगिनत और भिन्न भिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं | गोष्ठी फाइव स्टार होटल के लॉन या वेसमेंट के सेमीनार कक्ष में | परिचर्चा फलां प्रेस क्लब में | फिल्म का आयोजन उसके घर | कथा वाचन मेरे घर | इन तमाम कार्यक्रम स्थलों पर घोर, गंभीर और गहन चर्चा इन्हीं पात्रों के जीवन और इनके सामाजिक व् आर्थिक हालातों पर आयद है जो खुद इन आयोजकों के बीच इनकी बराबरी में मौजूद भले ही नहीं हैं | यूं तो इस साहित्य बिरादरी में बहुत लोगों की जयंती आती और चली जातीं हैं | लेकिन प्रेमचंद की जयंती का कुछ ऐसा हो चला है जैसे यह एक ऐसा धार्मिक पर्व हो जिसे न मनाने पर व्यक्ति को धर्म से खारिज मान लिया जा सकता है ठीक इसी तरह प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम न करने या किसी कार्यक्रम में न शामिल होने पर साहित्य बिरादरी से खारिज मान लिए जाने के डर के साथ प्रेमचन्द के असंख्य सिपाहसालार जिनमे मैं भी शामिल हूँ उनके चरित्रों की बदहाली पर गम्भीर चर्चा में जुटे हुए हैं |

मेरे कुछ लेखक मित्रों का यह सोचना कि ऐसे वक़्त में जब ‘निसार मैं तेरी गलियों पै ऐ वतन, कि जहाँ,, चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले…|” “फैज़” की यह लाइन सच होती दिख रही हो | तब एक साथ इतने आयोजनों में अन्याय की बर्बर राजनीति के खिलाफ लेखक, कलाकार और संस्कृतिकर्मियों की एकजुटता खुद में हिम्मत और हौसला पैदा करती है | क्या तब यह सवाल मन को नहीं कचोटने लगता है कि यदि खुद के हौसले और हिम्मत के लिए ही यह सब है तब चर्चा हमारी शंका-आशंका और डर के कारणों पर होनी चाहिए | उन चरित्रों पर क्यों जिन्हें यह तक खबर नहीं है कि उनकी समस्याओं पर भी कोई चर्चा कर रहा है | क्या हम यह मानकर ही खुश हो लें कि, संचार और सोशल मीडिया के समय में अखवारों, फेसबुक, ट्विटर, से उन्हें सब खबर हो जायेगी कि हम लोगों ने होरी, धनियाँ, घीसू, माधव, हल्कू की सामाजिक और राजनैतिक बदहाली पर देश भर में कितना गहन चिंतन किया है | और वे अखवारों में छपी आधी अधूरी विज्ञप्तियों को पढ़ते ही प्रेमचंद की तरह हमें अपना अगुआ मानकर सिर पर उठा लेंगे |

तब लगता है हमारे मन में ही कहीं खोट है प्रेमचन्द को पढ़ते हुए, हम यह नहीं स्वीकार कर पा रहे हैं कि उनके चरित्र इतने निरीह और सुशुप्त भी नहीं हैं कि हम लेखक, कलाकार अपनी उच्च वर्णीय मानसिकताओं के साथ उन पर चर्चा, या लेख लिखते हुए  उनसे दूरी बनाए रख कर उत्कृष्ट और शुद्ध भी बने रहें | और प्रेमचंद के दलित, किसान, मजदूर हमें अपना चहेता भी मानते रहें |

प्रेमचंद खुद इन्ही चरित्रों का हिस्सा बनकर उनकी अभिव्यक्तियों को अपने शब्द देने में जुटे रहे, तो वे इतिहास बनने या बनाने की लालसा से नहीं बल्कि इंसानी बराबरी वाले उत्कृष्ट समाज निर्माण का सपना लेकर बिना यह सोचे कि मैं इतिहास में आगे जाउंगा या पीछे… | प्रेमचंद भले ही खुद इतिहास बन गए किन्तु वर्तमान ऐतिहासिक व्याख्या में तो निश्चित ही प्रेमचंद बहुत पीछे रह गए थे | कहाँ थीं उनके पास लम्बी गाड़ियाँ, आलिशान घर, बड़े राजनैतिक रसूख ….. और इनके लिए उन्होंने कोई प्रयास भी नहीं किया | क्योंकि उनकी पहचान वर्गीय विभेद और संघर्ष से भरे भारतीय समाज की बिडम्बनाओं के साथ सच को सच कहने के साहस से थी जो उनके कहानी, उपन्यास और लेखों से स्पष्ट होता है |

ऐसा नहीं कि वर्तमान यथास्थिति का विरोध या प्रतिकार आज नहीं है, बल्कि ज्यादा है | एकदम राजनीतिज्ञों की तरह | कुछ हो न हो, बदले न बदले लेकिन व्यवस्थाई यथास्थिति का विरोध करके व्यक्ति सुर्ख़ियों में तो रहता ही है | शायद यही प्रजातांत्रिक तकनीक है | हमने भी शायद इसी सरल तरीके को अपना लिया है |  रचना महत्वपूर्ण हो न हो व्यक्ति को महत्वपूर्ण बनना है तो विरोध करना है | और यह विरोध किसी ‘श्री’ या ‘अकादमी’ के अलंकरण में ही समाप्त हो लेता है | दरअसल लेखक और उसके बाद ‘बुद्धिजीवी’ शब्द ही किसी ‘आम’ से ख़ास या शायद इससे भी बहुत ऊपर हो जाता है | उस दर्जे को विशेष सुविधा, सम्मान की दरकार भी होती है | इतिहास गवाह है कि विशेष सुविधा-सम्मान सत्ता व्यवस्थाओं से ही प्राप्त हुए हैं, नंगे वदन भूखे पेट रात काटते घीसू, माधव या भगत से नहीं | फिर इस तर्क से कैसे मुंह फेरा जा सकता है कि “मुंह खाता है तो आँख झपती है |” इन आयोजनों में प्रेमचंद के चरित्रों की हिस्सेदारी शायद यूं भी उचित नहीं है कि आलीशान सुविधाओं को भोगते हुए उन पर चर्चा करें तो वे दोगला या बिका हुआ न समझ लें | या कहें गरीब का कोई इतिहास भी तो नहीं होता फिर उनके साथ खड़े होकर लाभ क्या है …? क्योंकि हमारी जद्दो-ज़हद खुद को इतिहास में शामिल करने की भी तो है | और इतिहास इन्हीं सत्ताओं ने लिखवाया है , जो तय कर रहीं हैं कि बच्चे किताबों में किसे पढेंगे और किसे नहीं |

“यह भ्रान्ति है कि इतिहास न्याय करता है | इतिहास की भगदड़ में जो पीछे ठेल दिए जाते हैं वे कभी भी आगे नहीं आ पाते | इतिहास उन्हें भुला देता है |” समरसैट मॉम के इस कथन से प्रभावित लेखक, बुद्धिजीवी, कलाकार जो स्पष्ट नहीं हैं इसे लिखे जाने से तिलमिला भी सकते हैं | खासकर तब जब न केवल प्रेमचंद बल्कि भगतसिंह, मुक्तिबोध, निराला या नागार्जुन जैसे रचनाकारों या नामों को, यथास्थितिवादी फासिस्टी ताकतें, कथित राष्ट्रवादी मुलम्मा चढ़ाकर, आम-जन की भावनात्मकता के साथ अपने हित में इस्तेमाल करने में जुटीं हैं | वह विचलन वर्तमान से आँखें मूंदे किसी कथित दंभ का परिचायक ही हो सकता है | हालांकि निश्चित ही उनके पास तर्क हैं उन आवाजों के जो असंतोष और विद्रोह की मशाल के रूप में प्रेमचंद के उन्हीं चरित्रों के बीच से देश के किसी भी कोने से उठ खड़ी हो रहीं हैं | एक जगह उठती आवाज़ को गिरा दिया जाता है | वहाँ कुचले जाने पर वह चिंगारी कहीं और दहकने लगती है | उन आवाजों के रूप में प्रेमचंद की रचनाओं के चरित्रों का हर बार टूट-टूटकर पुनः उठ खड़े होने का यह अटूट सिलसिला निरंतर जारी है | उसे क्या कहेंगे… भले ही बंद ए सी कमरों में बैठकर उन आवाजों को मूर्ख या आवेशी कहकर हंस लें कि इतिहास इन्हें याद नहीं रखेगा | जबकि वे खुद इतिहास हैं या कहें उनके बिना इतिहास नहीं हो सकता …. फिर उसी को सीढी बनाकर हम खुद को इतिहास होने का रास्ता तय कर रहे हैं |

यहाँ प्रेमचंद को याद न करने या उनके जन्मदिन पर देश भर में आयोजित होने वाले आयोजनों की खिलाफत का उद्देश्य नहीं है किन्तु यह सोचने की अवश्य जरूरत है कि ३१ जुलाई महज़ एक बाजारी इवेंट बनकर न रह जाय | और यह तब ही संभव हो सकेगा जब वर्गीय शोषण, दमन, और अत्याचार के खिलाफ, सामाजिक इंसानी समानता के लिए उठती आवाजों के साथ खड़े हों | और प्रेमचन्द की सामाजिक, राजनैतिक साहित्य चेतना को बंद ए सी कमरों से निकालकर उन गलियों मुहल्लों और घरों तक ले जाने की कवायद हो जहाँ आज भी किसान, दलित, मजदूर के रूप में होरी, धनियाँ, घीसू, माधव, हल्कू, भगत जैसे प्रेमचन्द के चरित्र बसते हैं |

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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हनीफ मदार 197 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

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पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

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