नहीं टूटेगा आपका भरोसा….: संपादकीय (हनीफ मदार)

अपनी बात अपनी बात

हनीफ मदार 44 2018-11-17

नहीं टूटेगा आपका भरोसा…. हनीफ मदार हनीफ मदार किसी भी लेखक की पूँजी उसका रचनाकर्म होता है | अपनी रचनाओं को संजोने के लिए लेखक अपनी जिंदगी के उन क्षणों को अपने लेखन के लिए आहूत करता है जो आम तौर पर अपने निजत्व या अपनों की छोटी-छोटी खुशियों के बायस होते हैं | बावजूद इसके अनेक अलिखित और श्रमसाध्य मुश्किलों से गुज़रकर लिखा जाने वाला साहित्य या रचनाएं लेखक की अपनी नहीं होतीं क्योंकि वह खुद ही अपनी संवेदनाओं के वशीभूत, सामाजिक और मानवीय उत्तरदायित्व समझते हुए अपना सम्पूर्ण रचनाकर्म समाज को सौंप देता है | लेखक पास रहता है तो बस अदृश्य आशाओं का एक किला जिसे वह अपने प्रति सामाजिक प्रतिक्रिया और सामाजिक बदलाव के रूप में देखता है | सामाजिक बदलाव की दिशा में उसकी यही आंशिक भागीदारी उसकी संतुष्टि की वाहक होती है |

नहीं टूटेगा आपका भरोसा…. 

हनीफ मदार

हनीफ मदार

किसी भी लेखक की पूँजी उसका रचनाकर्म होता है | अपनी रचनाओं को संजोने के लिए लेखक अपनी जिंदगी के उन क्षणों को अपने लेखन के लिए आहूत करता है जो आम तौर पर अपने निजत्व या अपनों की छोटी-छोटी खुशियों के बायस होते हैं | बावजूद इसके अनेक अलिखित और श्रमसाध्य मुश्किलों से गुज़रकर लिखा जाने वाला साहित्य या रचनाएं लेखक की अपनी नहीं होतीं क्योंकि वह खुद ही अपनी संवेदनाओं के वशीभूत, सामाजिक और मानवीय उत्तरदायित्व समझते हुए अपना सम्पूर्ण रचनाकर्म समाज को सौंप देता है | लेखक पास रहता है तो बस अदृश्य आशाओं का एक किला जिसे वह अपने प्रति सामाजिक प्रतिक्रिया और सामाजिक बदलाव के रूप में देखता है | सामाजिक बदलाव की दिशा में उसकी यही आंशिक भागीदारी उसकी संतुष्टि की वाहक होती है |

अपनी रचनाओं को समाज को सौंपने या सामाजिक पटल पर रखने का  माध्यम ही लेखक और प्रकाशक का रिश्ता बनता है | दुनिया के किसी भी रिश्ते की भाँति लेखक-प्रकाशक का यह रिश्ता भी आपसी विश्वास और बड़े भरोसे की नींव पर ही टिकता है | फिर चाहे रचनाओं के प्रकाशन का स्वरूप वज़ूद में हो या आभासी | लेखकीय रचनाकर्म की महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पूँजी को सुरक्षा और संरक्षण के साथ, सामाजिक रूप से वृहद् कैनवस में पाठकों के बीच पहुँचाने का जिम्मा, प्रिंट या ऑन लाइन दोनों ही स्थितियों में बराबर लागू होता है | किसी भी प्रकाशन, पत्रिका या साहित्यिक वेब पोर्टल के लिए यह जिम्मेदारी तब और बड़ी हो जाती है जब लेखक अवैतनिक या बिना किसी पारिश्रमिक के अपनी रचनाएं लिख और भेज रहे हों |

यहाँ इन सब बातों को लिखकर कोई उपदेश झाड़ने की मेरी मंशा यकीनन बिल्कुल नहीं है | मेरी बातों की शुरूआत किसी उपदेश की तरह लगी हो तो माफ़ करें क्योंकि, मैं भी, इस महान देश में विभिन्न ईश्वरों, देवताओं, पैगम्बरों और विराट महापुरुषों की ही संतानों में से हूँ जिनके सामने उपदेश ग्रहण करने को अनेक आलौकिक और चमत्कारी किताबें हैं, जो जीव को जीव से प्रेम करने के संदेशों से भरी हैं,  वहां मैं उपदेशक कैसे हो सकता हूँ | फिर मुझमें ‘डार्विन, फ्राइड या मार्क्स के जैसा साहस है, न ही चेतना | कि, अंधविश्वासों के साथ गरीबी और दुखों में जीते रहने को अपना भाग्य मान कर, महान मेधा, प्रचंड शक्तियों एवं आलौकिक दृष्टि और विभिन्न अद्युतीय प्रतिभाओं से लैस महापुरुषों के वंशज होने के गौरवशाली भ्रम में जीने को अभिशप्त खुद से भी, मार्क्स की तरह यह कह सकूं कि, “सांसारिक दुःख-सुख, अमीरी-गरीबी या बाहरी भौतिक परिस्थितियों के लिए कोई विधाता या भाग्य नहीं हम खुद जिम्मेवार हैं | और अपनी परिस्थितियों के साथ अपने प्रारब्ध को भी खुद ही बदल सकते हैं |”

अतः मैं उपदेश नहीं बल्कि अपनी बात को कहने और अपनी मूल भावना को आपके पास तक पहुँचाने के लिए महज़ भूमिका भर बना रहा हूँ | या कहूं कि अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग स्वीकारोक्ति को बयाँ करने की सफल-असफल कोशिश कर रहा हूँ | दरअसल, हमें हमेशा ही ‘हमरंग’ के लेखकों और पाठकों के साथ एक परिवार होने का एहसास होता रहा है | निश्चित ही हमारे भीतर इस एहसास को पैदा करने में, आप ही की सहयोगी और व्यावहारिक भूमिका महत्वपूर्ण है | तब आपके और आपके मंच ‘हमरंग’ के प्रति हम अपनी जिम्मेदारियों से कैसे भाग सकते हैं | खासकर तब जब परिवार के किसी भी हिस्से में, किसी एक भी व्यक्ति का विश्वास दरकने की कगार पर हो | हाँ…! ऐसे में लाजिमी है स्थितियों, परिस्थितियों की सच बयानी के साथ आपसी संवाद का होना | इसी समझ के साथ परिवार के बीच खुद को बाँट लेना ही आज की मंशा या उद्देश्य है |

विगत लगभग दो वर्षों से, आपकी, कुछ अपनी रचनात्मक साहित्यिक पूँजी को जिम्मेदारीपूर्वक प्रकाशित करते हुए भी निरंतर एक तलाश ज़ारी थी, ‘हमरंग’ के कलेवर को लेकर | शुरू से ही कल्पना थी ‘हमरंग’ के रूप में, एक ऐसे सुसज्जित साहित्यिक मंच की, जहाँ आप अपनी या किसी अन्य साथी या लेखक की रचना पढ़ते हुए न केबल रचना से ही आनंदित हों बल्कि रचना की मंचीय पृष्ठभूमि, उसका सौन्दर्य एवं सहज-सरल गरिमामय अनुशासन भी आपको सुकून दे सके | ऐसा इसलिए भी कि जब खान-पान से लेकर रहन-सहन तक की संस्कृति, बाजारी प्रभाव में आकर्षण  के साथ युवा हो रही है | तब महज़ हिंदी साहित्य ही क्यों किसी प्राचीन अवधारणा की तरह उबाऊ कलेवर में ही उपस्थित हो | जबकि अन्य दिनचर्या या जीवन की तरह, हिंदी साहित्य के लिए भी ऐसी अवधारणा कोई संवैधानिक नियम या मान्यता नहीं है | इसी समझ के साथ हमरंग का कलेवर बदल दिया गया |

हमरंग के इस मौजूदा कलेवर को डिजायन करने-कराने में पिछले दो माह कब निकले पता ही नहीं चला | ठीक इसी समय में हमरंग की सक्रीय टीम का चिकुनगुनिया और डैंगू की चपेट में आना भी बाधा बनता रहा, जब कई-कई दिनों तक हमरंग पर कुछ भी प्रकाशित नहीं हो सका | साथ ही हमरंग पर होने वाले तकनीकी कार्यों के चलते हमरंग को न दिख पाने की भूमिका भी शामिल रही | ऐसे में आपका अपनी रचनाओं के लिए चिंतित होना और ‘हमरंग’ के भविष्य को लेकर कुछ नकारात्मक शंका-आशंकाओं से घिर जाना भी स्वाभाविक ही है |

आपकी यही शंका और आशंकाए तब और मज़बूत हुई होंगी जब हमरंग अपने नये और मौजूदा कलेवर में उपस्थित तो हुआ किन्तु विगत में ‘हमरंग’ पर प्रकाशित आपकी रचनाएं वहाँ से लगभग नदारद ही थीं | तब यकीनन ‘हमरंग’ और हमारे प्रति आपका अविश्वास से भर जाना भी उसी सहज प्रक्रिया का ही हिस्सा है | ऐसे समय में जहाँ एक बड़ा हिस्सा किसी भी हुए के लिए अपनी धारणा-अवधारणाओं के साथ आपसी बतकही तक ही रह कर चुप हो जाता है वहीँ दूसरा हिस्सा मुखरता के साथ सवाल पूछकर अपनी जिम्मेदारी का एहसास करता है | कुछ ऐसा ही आभास किया हमने जब कुछ लेखक और पाठकों ने हमसे सीधे सवाल किये और पूछा कि हमारी विगत में प्रकाशित हुई रचनाएं कहाँ हैं…?

आपका यह सार्थक सवाल हमरंग के भरोसे और गरिमा के लिए किसी प्रश्न चिन्ह की तरह देखा जाना आवश्यक लगा | साथ ही यह भी कि व्यक्तिगत रूप में अब तक लगभग तीन सौ लेखकों और असंख्य पाठकों के ‘हमरंग’ परिवार को सार्वजनिक रूप से यह बताया जाय कि आपकी रचनात्मक पूँजी कहाँ है और हमरंग पर क्यों नहीं दिखाई दे रही है |

दरअसल, बिना किसी आर्थिक सहायता के किसी भी सार्वजनिक मंच को संचालित बनाए रखना उतना आसान नहीं है जितना हम समझते हैं | ‘हमरंग’ की सक्रीय टीम के जेब-खर्च से संचालित ‘हमरंग’ के वर्तमान बदलाव ने हमें आर्थिक रूप से बेहद कमज़ोर करके घुटनों के बल ला खड़ा किया | निश्चित ही तब कुछ लेखक, मित्रों का आंशिक और आत्मिक सहयोग जीवनदाई ग्लूकोज से कम नहीं था | उसके बाद ही ‘हमरंग’ वर्तमान स्वरूप में आ सका | किन्तु बड़ा सवाल अभी भी डेटा माइग्रेशन पर आने वाले खर्चे का था | उस खर्चे को उठा पाने की अब आर्थिक ताकत भी नहीं बची थी | जब कोई रास्ता नज़र नहीं आया तब एक ही रास्ता दिखा, खुद के परिश्रम का | सभी रचनाओं को सुरक्षित किया गया और पुनः ‘हमरंग’ पर लगाये जाने की प्रक्रिया शुरू की गई जो अब तक जारी है | और आपकी हर एक रचना को वर्तमान हमरंग पर आ जाने तक जारी रहेगी | बस हमारी इस मेहनत का प्रतिफल आपका सहयोग और भरोसा है जो हमें हौसले के साथ रोमांचित किये हुए है |

 ‘हमरंग’ के वर्तमान स्वरूप के साथ ही हमरंग की पाठक संख्या में अचम्भित कर देने वाली वृद्धि का देखना, न केबल हमारे या आपके लिए बल्कि हिंदी साहित्य के लिए भी एक सुखद अनुभूति है | प्रसंगवश यहाँ पटना से ‘कमलेश जी’ के साथ हुई बात चीत का जिक्र करना जरूरी लग रहा है | अभी पिछले हफ्ते ‘हमरंग’ पर उनकी कहानी ‘बाँध’ प्रकाशित होने के तीन दिन बाद उन्होंने फोन पर बताया कि “मैं अचम्भित हूँ ‘हमरंग’ पर मेरी कहानी को मिल रहे रिस्पौंस को देखकर | मुझे इतने कमेन्ट और फोन आ रहे हैं इसकी मैंने सच में कल्पना नहीं की थी |” बड़ी संख्या में हमरंग से पाठकों का यही जुडाव हमारा हौसला है |

 

आशान्वित रहना बेहतर कल के लिए सार्थक पहल है इसलिए हम आशान्वित हैं आपके उसी विश्वास, प्रेम, रचनात्मक सहयोग के साथ आपके मंच ‘हमरंग’ के बेहतर कल के लिए | इस स्पष्टता के बाद, आइये प्रकाश पर्व की खुशियों में आशाओं, सपनों, प्रेम और विश्वास की कुछ और रौशनी भरें …. |

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ …..|

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
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