स्वतंत्रता दिवस के जश्न की सार्थकता: संपादकीय (हनीफ मदार)

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हनीफ मदार 22 2018-11-17

स्वतंत्रता दिवस के जश्न की सार्थकता (हनीफ मदार) सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं दिल पे रखकर हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है | अदम गौंडवी साहब को क्या जरूरत थी इस लाइन को लिखने की | खुद तो चले गए लेकिन इस विरासत को हमें सौंप कर जिसके चंद शब्दों की सच बयानी या साहित्यिक व्याख्या आज किसी को भी देश द्रोही कहलवा सकती है | दरअसल यह लेख लिखते समय अचानक इन लाइनों ने आकर दस्तक दी है और परेशान किया है | जबकि हम सब पूरा देश स्वाधीनता दिवस की 69वीं वर्षगाँठ पर आज़ादी के जश्न की ख़ुमारी में डूबे हैं | यही समय है जब देशभक्ति हमारे रोम-रोम से फूट पड़ने को आतुर होती है | और यह होना भी चाहिए स्वाभाविक भी तो है क्योंकि आज़ादी खुद जश्न की वायस है ज़िंदगी का सर्वोत्तम है इसलिए यह लालसा न केवल इंसान को बल्कि हर जीव को होती है | फिर हमने तो इस आज़ादी के लिए बहुत बड़ी क़ीमत चुकाई है | हमें गर्व है कि हम दुनिया के एक मात्र ऐसे देश हिन्दुस्तान के बाशिन्दे हैं जहाँ विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, वर्ग-समूह, भाषा-भूषा, कला-संस्कृति, पर्व-अनुष्ठान एक साथ सांस लेते हैं | हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस की वर्षगाँठ मनाते हुए हम समय के लिहाज़ से एक और वर्ष आगे बढ़ चुके होते हैं यानी व्यवस्थाओं और सुशासन में एक वर्ष आगे की प्रगति | वैसे भी यह दिन महज़ राष्ट्र ध्वज फहराकर इतिश्री करने का तो नहीं ही है बल्कि देश की आज़ादी के लिए कुर्बान हुए हज़ारों शहीदों के अरमानों में बसने वाले आज़ाद भारत के सपने की दिशा में बढ़ने का संकल्प लेने का भी तो है |

स्वतंत्रता दिवस के जश्न की सार्थकता (हनीफ मदार)

सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं
दिल पे रखकर हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है |

अदम गौंडवी साहब को क्या जरूरत थी इस लाइन को लिखने की | खुद तो चले गए लेकिन इस विरासत को हमें सौंप कर जिसके चंद शब्दों की सच बयानी या साहित्यिक व्याख्या आज किसी को भी देश द्रोही कहलवा सकती है | दरअसल यह लेख लिखते समय अचानक इन लाइनों ने आकर दस्तक दी है और परेशान किया है | जबकि हम सब पूरा देश स्वाधीनता दिवस की 69वीं वर्षगाँठ पर आज़ादी के जश्न की ख़ुमारी में डूबे हैं | यही समय है जब देशभक्ति हमारे रोम-रोम से फूट पड़ने को आतुर होती है | और यह होना भी चाहिए स्वाभाविक भी तो है क्योंकि आज़ादी खुद जश्न की वायस है ज़िंदगी का सर्वोत्तम है इसलिए यह लालसा न केवल इंसान को बल्कि हर जीव को होती है | फिर हमने तो इस आज़ादी के लिए बहुत बड़ी क़ीमत चुकाई है | हमें गर्व है कि हम दुनिया के एक मात्र ऐसे देश हिन्दुस्तान के बाशिन्दे हैं जहाँ विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, वर्ग-समूह, भाषा-भूषा, कला-संस्कृति, पर्व-अनुष्ठान एक साथ सांस लेते हैं | हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस की वर्षगाँठ मनाते हुए हम समय के लिहाज़ से एक और वर्ष आगे बढ़ चुके होते हैं यानी व्यवस्थाओं और सुशासन में एक वर्ष आगे की प्रगति | वैसे भी यह दिन महज़ राष्ट्र ध्वज फहराकर इतिश्री करने का तो नहीं ही है बल्कि देश की आज़ादी के लिए कुर्बान हुए हज़ारों शहीदों के अरमानों में बसने वाले आज़ाद भारत के सपने की दिशा में बढ़ने का संकल्प लेने का भी तो है |
यह दिन है हर अगले स्वाधीनता दिवस के आने तक अदम गौंडवी, हरिशंकर परसाई, मुक्तिबोध, बाबा नागार्जुन, जनकवि शील, आदि की रचनाओं के समक्ष एक ऐसी समाज व्यवस्था के साथ भारत निर्माण के अहद का जो इन तमाम लेखकों की रचनाओं को तात्कालीन रचनाएं सिद्ध कर सके | क्या हर वर्ष 15 अगस्त को मन में यह सवाल नहीं उठता कि इतने लम्बे समय के अपने स्वाधीन लोकतंत्र के बावजूद भी भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, कृपलानी, असफाक़उल्ला खान जैसे अमर शहीदों के आज़ाद भारत के सपने को साकार कर पाने में पूर्ण सफल हुए हैं…? फिर क्यों इन लेखकों की रचनाओं में मिलने वाले तात्कालीन भारतीय समाज के चित्र हमें आज भी बहुतायत में और बदतर हालत में नजर आते हैं |

आज हम तकनीकी रूप से न केवल सुदृढ़ हुए बल्कि दक्ष भी तब भी युवा बेरोजगारी की दर का साल दर साल बढ़ते जाना | जनगणना निदेशालय द्वारा जारी पिछली रिपोर्ट के अनुसार भारत में सत्ताइस प्रतिशत मौतों का चिकित्सा के अभाव में होना | हमारी स्वाधीन लोकतांत्रिक व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला खड़ा करता है | भारतीय आज़ादी के प्रतीकों से सजी दुकानों और पटे हुए बाज़ारों की चमक की आत्ममुग्धता में डूबे हुए हम क्या यह भुला सकते हैं कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी स्कूली शिक्षा पार करने के बाद 9 छात्रों में से महज़ 1 छात्र ही कॉलेज तक जा पाता है | नैसकॉम और मैकिन्से के शोध के अनुसार मानविकी में 10 में से एक और इंजीनियरिंग में डिग्री ले चुके चार में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने के योग्य होता है | आज़ाद भारतीय सत्ता व्यवस्थाओं द्वारा हर वित्तीय वर्ष में घटा दिए जाने वाले शिक्षा बजट से उत्पन्न होतीं इन स्थितियों के साथ क्या मात्र राष्ट्रवादी भावनाओं में विकसित राष्ट्र के भ्रम में जीते रहना उचित मान लिया जाय ?

निसंकोच स्वतंत्रता के बाद इन वर्षों में हम वैज्ञानिक एवं तकनीक की दिशा में प्रगति के कई पड़ाव पार करके सूचना प्रौद्योगिकी में एक अग्रणी देश बन गए हैं लेकिन आज भी देश के अंतिम नागरिक तक स्वच्छ पेय जल की व्यवस्था दे पाने में काफी पीछे है। आज भी देश में प्रदूषित पानी पीने से पनपने वाली कई बीमारियों से होने वाली मौतों की संख्या कम नहीं है | बात फिर चाहे सड़कों की हो बिजली या अन्य मूलभूत सुविधाओं की हो, दलित और स्त्री अधिकारों की हो | हर वर्ष हमारी आज़ादी का यह दिन अपील करता है और उम्मीद के साथ विदा होता है कि अगला वर्ष आज से बेहतर होगा | अब आवश्यकता नहीं रही है कोरे वादों और लुभावने भाषणों की, जरूरत है तो बस राजनैतिक इच्छाशक्तियों से सामाजिक रूप से इन तमाम क्षेत्रों के अधूरे कार्यों को पूरा करने की | देश के अंतिम व्यक्ति तक संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में इंगित मूलभूत सुविधाओं की पहुँच सहज, सरल और सुलभ हों, इसे हम अपनी प्राथमिकता तय करें | सही अर्थों में यही हमारी सच्ची राष्ट्रीयता और स्वतंत्रता दिवस के जश्न की सार्थकता भी होगी | तब निश्चित ही अदम गौंडवी की यह लाइनें निरर्थक और तात्कालीन ही साबित होंगी |

स्वतंत्रता दिवस की ढेरों शुभकामनाओं के साथ …..

हरिशंकर परसाई …… चर्चा जारी है…….|

व्यंग्य के क्षेत्र में हरिशंकर परसाई का नाम भी उसी सम्मान का हक़दार है जो हिंदी साहित्य में प्रेमचंद को मिला है | साहित्य जगत में व्यंग्य को इंसानी सरोकारों के साथ महत्वपूर्ण साहित्यक विधा के रूप में पहचान कराने वाले परसाई ने सामाजिक रूप से हल्के फुल्के मनोरंजन की सांस्कृतिक धारा को मानवीय सरोकारों के साथ व्यापक प्रश्नों से जोड़ने का काम किया |
उनकी हर रचना सामाजिक चेतना की महत्वपूर्ण विरासत के रूप में नज़र आती है | यही कारण है कि आज भी लेखक व्यंग्यकार परसाई को अपना आदर्श मानते हैं बावजूद इसके उनके समूल राजनैतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक दृष्टिकोण को लेकर एक अजीब विभ्रम की स्थिति नज़र आती है | जब अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से उनको व्याख्यायित कर लिया जाता है | तब जरूरत लगती है परसाई जी को एक सामूहिक दृष्टिकोण से समझने या पुनर्मूल्यांकन के प्रयास की | परसाई के व्यक्तित्व, राजनैतिक व् सामाजिक दृष्टि, के अलावा साहित्यिक और मानवीय प्रतिबद्धता को विभिन्न दृष्टिकोणों से जानने समझने और अपने पाठकों के बीच लाने के लिए हमरंग ने हरिशंकर परसाई की पुण्यतिथि 10 अगस्त से उनके जन्म दिवस 22 अगस्त तक ‘हमरंग’ का यह मंच “हरिशंकर परसाई….. चर्चा जारी है…|” आयोजन के नाम से परसाई को समर्पित किया है | हमारे लिए यह साहित्यिक आयोजन इतनी जल्दी में और बेहद कम समय में सुचारू और निरंतरता में कर पाना शायद संभव न होता, यदि इस काम में व्यंग्यकार भाई एम्0 एम्0 चंद्रा की अथक मेहनत और सहयोग न रहा होता | हालांकि उनकी यह लगन स्वाभाविक भी है क्योंकि हमरंग पर इस आयोजन के प्रस्ताव में भी उनकी महत्वपूर्ण और साहसिक भागीदारी रही है |

हमारे इस प्रयास की सम्पूर्ण सफलता का कारण वे सभी व्यंग्यकार, लेखक हैं जिन्होंने बेहद अल्प समय में भी हमारे आग्रह पर हरिशंकर परसाई के रचनाकर्म और उनके व्यक्तित्व पर आलेख लिखकर भेजे | हम उन सभी साथी लेखकों के प्रति कृतज्ञ और आभारी हैं | और अपेक्षा करते हैं कि आप सभी का रचनात्मक सहयोग हमरंग को आगे और हमेशा मिलता रहेगा |

आप सभी लेखकों, पाठकों को एक बार पुनः भारतीय स्वतंत्रता दिवस की ढेरों शुभकामनायें |

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 119 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

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पंकज तिवारी 216 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

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अरविंद जैन 113 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

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