रोज़ा…: कहानी (हनीफ मदार)

कथा-कहानी कहानी

हनीफ मदार 35 2018-11-17

समाज में फ़ैली धार्मिक कट्टरता व् आडम्बरों पर तीखा प्रहार करती और ठहर कर पुनः सोचने को विवश करती, “हनीफ मदार” की छोटी एवं बेहद मार्मिक कहानी ……| – अनीता चौधरी

रोज़ा…

पाक रमजान माह का दसवां रोजा था, मैंने रोजा नहीं रखा था। जबकि मैं जानता था कि दुनिया के हर मुसलमां को रोजा रखना फर्ज है। ऐसी धार्मिक मान्यताऐं भी हैं। साल के बारह महीनों में से एक महीना खुदा की इबादत के लिए तय है। इस्लाम में इस महीने को नेकियों का महीना भी कहते हैं। इसलिए रोजे के लिए कुछ सिद्धान्त (उसूल) भी तय हैं उनकी पूर्ति के साथ रोजा रखना ही अल्लाह की सच्ची इबादत है। रोजा रखने के लिए दृढ़ निश्चय करना होता है कि मैं झूठ नहीं बोलूंगा, किसी को गाली नहीं दूंगा, किसी की चुगली या कोई ऐसा काम नहीं करूंगा, जिससे किसी को कोई भी पेरशानी हो, मैं केवल तेरी (खुदा) की इबादत करूंगा। नमाज एवं कुरान पढ़ने के साथ-साथ दुनिया की भलाई को दुआ करूंगा इसके साथ-साथ अपने तमाम शौक जलपान आदि के त्याग का नाम रोजा है।
मैंने एक बार रोजा रखा था। सुबह की नमाज घर पर ही अता की और काम पर आ गया यहां आकर मुझे बिजनेस के दृष्टिगत कुछ लोगों से एकदम झूठ बोलना पड़ा, सफेद झूठ। मेरे हृदय से एक आवाज उठी कि तूने रोजा तोड़ दिया और मुझे अपने ऊपर एक बोझ सा प्रतीत होने लगा मैंने अपने को और संयमित किया और रोजा बरकरार रखा अभी दोपहर नहीं हो पाया था कि मेरी जुबान से एक आध भद्दा शब्द भी फिसल गया जो बातचीत के बीच में आजकल हवा में तैरते रहते हैं सांसों के साथ अंदर जाते हैं और जुबान के द्वारा बाहर आकर फिर हवा में तैरने लगते हैं। आॅफिस में कुछ मित्रों के साथ वार्ता में कुछ अच्छे बुरे विचारों का आदान-प्रदान भी मेरे न चाहते हुए हो गया उन्हें मैं चाहकर भी न रोक पाया क्योंकि वही मेरे मित्र ग्राहक भी थे जिनसे मेरी जीविका चलती है। अतः शाम होते-होते कितनी बार मेरा रोजा खण्डित हुआ। दिनभर की भूख-प्यास से ज्यादा कितनी ही दफा रोजा टूटने एवं खुद एवं खुदा को धोखा देने की टीस ने मुझे तोड़ कर रख दिया। मैंने बुझे मन से रोजा खोला। मुझे लगा कि मैंने रमजान नहीं रखा बल्कि, बहुत बड़ा गुनाह किया है। मैंने रोजा नहीं रखा अपितु दिखावा किया है। रोजे का ढोंग किया है। तबसे मैं रोजा नहीं रखता और तभी से मैंने रमजान में कहीं भी जाना बंद कर दिया था, क्योंकि बिना रमजान रखे कहीं भी किसी रिश्तेदार के यहां जाना मानो पुलिस रिमाण्ड पर जाना हो, यही सुनने को मिलेगा रोजा जरूर रखा करो। खुदा को मत भूलो। हर मुसलमान को रोजा रखना जरूरी है। तुम्हें शर्म नहीं आती, पलभर में चेहरे की हवाइयां उड़ा देना बस इसी डर से मैं रमजान के महीने में किसी भी मुस्लिम संबधी के यहां नहीं जाता।
दुर्भाग्य से उस दिन मुझे किसी अति आवश्यक कार्य से अपनी बहन के यहां जाना पड़ा। मैं डरा हुआ सा बस में जा बैठा बस धीर-धीरे स्थान छोड़ गंतव्य की ओेर बढ़ने लगी थी बस के इंजन की आवाज के साथ-साथ मेरा डर भी प्रखर होने लगा था। मुझे डर था रोजा न रखने का और मेरी मंजिल थी दूर शहर के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में मेरी बहन का घर। जबकि अम्मा ने मुझे सुबह सहरी के वक्त जगाया भी था कहा था आज तो रोजा रख ले बहन के यहां बिना रोजे से जाएगा तो लोग क्या कहेंगे ‘‘परन्तु उस समय मैंने अम्मा की इस बेहद जरूरी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया था। अब मुझे अपनी मनाही के फैसले पर पश्चाताप भी हो रहा था। काश मैं आज तो रोजा रख ही लेता। गड्ढायुक्त सड़कों पर बस हिचकोले खा रही थी मुझे लगा किसी ने मुझे झकझोर कर कहा है हां आज के रोजे से वहां झूठा सम्मान तो मिल जाता क्या यह धोखा नहीं होता ? मैंने जेब से तम्बाकूयुक्त जर्दा निकाला मुंह में डालता कि पीछे से आवाज उभरी ‘‘भाई साहब बीड़ी मत पीयो मैं रोजे से हूं’’ मुझसे तीसरी सीट पर बैठे हुए एक आदमी ने कहा था, बगल में बैठे हुए आदमी से जो बीड़ी पी रहा था सभी यात्रियों का ध्यान बरबस उस व्यक्ति की ओर चला गया जो रोजे से था, मुंह पर गमछा लपेटे हुए उसकी हल्की दाढ़ी के कुछ सफेद काले बाल गमछे से बाहर झांक रहे थे। उसने बीड़ी फेंक दी और एक अपराधी की भांति सिमट कर बैठ गया, मेरे हाथ से जर्दा का पैकेट भी गिर चुका था, मुझे बस के सभी यात्री मेरी तरफ घूरते से प्रतीत हो रहे थे और जैसे मुझ पर झपटने वाले थे तूने रोजा नहीं रखा। क्यों ? तम्बाकू के पैकेट को मैंने जूते से दबाकर छिपा लिया सामने अम्मा खड़ी थी, कहा था कि आज तो रोजा रख ले मैंने अम्मा के साथ खड़े इतने लोगों से नजरे बचाने के लिए अपनी आंखे मूंद लीं और सीट में मानो चिपक कर बैठ गया |
बस के झटके से मेरी तंद्रा टूटी, बस मेरी मंजिल पर अपने साथियों के बीच खड़ी थी। बैठे यात्री खड़े एक-दूसरे को धकियाते अपनी शीघ्रता का एहसास दिला रहे थे। मैं थके बैल की तरह ऐसा बैठा था, जिसे लाठियों के सहारे उठाया जात है। दिल बैठा जा रहा था, सामने बहन का घर दिखाई दे रहा था। सहमे कदमों से घर में प्रवेश किया, हृदय में समाए भय का कुछ अंश होठों पर आकर सूख गया था। नैतिक अभिवादन के साथ ही ‘‘आजाओ क्यों तबियत ठीक नहीं है क्या ?’’ बहन ने हमदर्दी दिखाई और खुद ही जबाब दे दिया ‘‘ हां, रमजान से होंगे’’ मैंने संकोच से नहीं में सिर हिला दिया। क्या ? मानो बहन को गाली दी हो ‘‘ तुम रोजे से नहीं हो तुम तो पढ़े-लिखे हो, यहां देखो छोटे बच्चे से लेकर बुड्ढे तक सभी रोजा रखते हैं अभी शाम को देखना घर-घर से सबको बुलाते हुए एक भीड़ के रूप में सभी मस्जिद को जाऐंगे’’ मैं कुछ बोलता कि ह फिर समझाने लगी ‘‘एक बात बताओ ग्यारह महीने कमाना खाना, भला-बुरा, झूठ-सांच न जाने क्या-क्या करते हैं अमानुष हो जाते हैं कम से कम इसी बहाने एक महीने इंसान बनकर तो जी लेते हैं अपने तमाम गुनाहों से तौबा तो कर लेते हैं तुम तो वह भी नहीं कर रहे हो।’’ मैं पैरों तले जमीन को पढ़ने की कोशिश कर रहा था इसके बाद हम दोनों घर परिवार की सलाहियत की चर्चा में घंटों व्यतीत करते रहे।
अब तक आसमान में पंछी भी समूह के रूप में अपने घोंसलों में वापस होने लगे थे। धूप पहले ही जा चुकी थी। मैं भी घर को वापस हो लिया, मैं वहां पूर्ण संध्या नहीं होने देना चाहता था क्योंकि अब तक मुझमें तमाम रोजेदारों का सामना कर पाने का सहस शेष नहीं रह गया था। मैं गली के नुक्कड़ पर ही था, सामने से भीड़ ने रास्ता बंद कर रखा था। दो औरतें आपस में लड़ रहीं थींं। कारण जानने की उत्सुकता में मैं भी भीड़ में समा गया, कुछ बच्चे हाथ में प्लेटों में नमकीन कुछ कटे हुए फल लिए खड़े थे जो शायद मस्जिद जा रहे थे रोजा खोलने, गोल टोपी लगाए एक व्यक्ति दूसरे दाढ़ी वाले को बता रहा था ‘‘ये नालायक तो है, जब वह नमाज पढ़ रही थी तो उसे क्या जरूरत थी इतनी तेज आवाज में टेप बजाने की मना किया तो लड़ने लगी। दोनों ओर से भयंकर भद्दी गालियों के बाण चल रहे थे जिन्हें सुन पाना मेरे लिए असंभव हो रहा था। गालियां क्या साक्षात अमानवीय अश्लीलता का बखान हो रहा था। दोनों अपने भद्दे शब्दों से एक दूसरी की बेटियों को नंगी कर रही थीं। वे दोनों रोजे से नहीं हैं, मैं इसी भ्रम में रहता यदि उनमें से एक ने न कहा होता …………. ‘‘मैं रोजे से हूं, नहीं तो तुझे पैर पर पैर रखकर चीर देती ………. कुतिया, ……….. बदजात।’’ इसलिए तो बची है तू कि मैं रोजे से हूं नहीं तो…………….. मेरे हाथ-पैर भी टूटे नहीं हैं………… छिनाल…….।’’ दूसरे ने पलटवार किया था।
मेरा भ्रम टूटा……….. उन्हें याद था कि वे रोजे से हैं फिर भी झगड़े की पराकाष्ठा चरम छू गई और उन्होंने
‘‘ तू ऐसे नहीं मानेगी’’ कहते हुए अपने-अपने दुपट्टे अपनी लड़कियों को थमाए और एक-दूसरी से दो सांड़ों की भांति भिड़ गईं……..। मूकदर्शक बना मुझे लगा उन्होंने, अपना रोजा टूटने के डर से अपने सिर से उतार कर अपनी बेटियों को पकड़ा दिया, जो खड़ी तमाशा देख रही थीं और खुद भिड़ गईं ताकि एक-दूसरे के बाल नोंचने तथा खून बहाने पर भी रोजा न टूटे….. । अजान का स्वर गूंजा…….. भीड़ दौड़ी मानो रेड अलर्ट हुआ हो दोनों ने भी अपना-अपना रोजा सिर पर ओढ़ा ‘‘तुझे रोजा खोलकर देखूंगी’’ कहती हुई अपने घरों में समा गईं….सन्नाटा……… मै स्तब्ध खड़ा रह गया, मेरा सम्पूर्ण भय न जाने कहां काफूर हो गया, सामने अम्मा खड़ी थी, नजरें झुकी, मैंने सगर्व कहा ‘‘इनसे मैं तो फिर भी अच्छा हूं जो खुद को या खुदा को धोखा नहीं देता।

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 198 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

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पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

नोट-

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