यादें हैं शेष, इंसान और इंसानियत को ऊँचाई देने वाले कवि की:

बहुरंग स्मरण-शेष

डॉ0 मोहसिन खान 'तनहा' 106 2018-11-17

कुंवर नारायण (19 सितम्बर, 1927, फैजाबाद, उत्तर प्रदेश) हिन्दी के सम्मानित कवियों में गिने जाते हैं। कुंवर जी की प्रतिष्ठा और आदर हिन्दी साहित्य की भयानक गुटबाजी के परे सर्वमान्य है। उनकी ख्याति सिर्फ़ एक लेखक की तरह ही नहीं, बल्कि कला की अनेक विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले रसिक विचारक के समान भी है। कुंवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के माध्यम से वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। उनका रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं है। आपके संक्षिप्त परिचय के साथ आपकी कविताओं पर चर्चा करते हुए कुंवर नारायण को याद कर रहे हैं ‘डॉक्टर मोहसिन खान’

‘एक अजीब-सी मुश्किल’ संस्पर्श और अनुभूति ( दो कविता)

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

कुंवर नारायण की कविता ‘एक अजीब सी-मुश्किल’ जीवन की सच्चाइयों और मन की सम्वेदनाओं की कविता है, जिसके अंतर्गत कवि ने मन की स्थिति का चित्रण करते हुए सामाजिक सांप्रदायिक अवस्थाओं का चित्रण किया है और आपसी समन्वय का संदेश प्रस्तुत किया है। मूल रूप से यह कविता मानवीय प्रेम की कविता है, जहां पर धर्म, जाति, रंग , नस्लें, अमीरी-गरीबी आदि भेद नहीं माना जाता है। कवि ने इसी समन्वयात्मक था सहिष्णुता को बड़ी गंभीरता के साथ शब्दों में ढाला है। कवि ने अपनी कविता में उन समस्त स्थितियों का चित्रण किया है, जहां पर व्यक्ति दिन रात कभी धर्म को लेकर कभी मान्यताओं को लेकर कभी संस्कृति को लेकर, कभी परंपराओं, कभी भाषा इत्यादि को लेकर टकराहट पैदा करता है और एक दूसरे से विरोध जताता है, परंतु कभी कहना चाहता है कि विरोध की कोई जरूरत नहीं है हम सब आपस में एक दूसरे के सहयोगी ही है इसका कारण यह है कि हमने एक दूसरे को बहुत कुछ दिया है एक-दूसरे की संस्कृति में एक दूसरे को आगे बढ़ाया है और नई सी नई चीजों को उपलब्ध कराया है। कवि कुंवर नारायण स्पष्ट करते हैं कि कोई कितनी ही ताकत से किसी से नफरत करें लेकिन यह नफरत बहुत ज्यादा दिनों तक ठीक नहीं पाएगी इसका कारण यह है कि नफरत से संसार नहीं चलता है संसार चलता है एक दूसरे के सहयोग से और सहिष्णुता से इसीलिए वह दर्शाते हैं कि यदि अंग्रेजों से भी नफरत की जाए तो किस आधार पर नफरत की जाए क्योंकि अंग्रेजों की दी हुई संपत्ति में हुई चीजें दिए हुए कवि दिए हुए कितने ही एहसान ऐसे हैं जो हम ने अंग्रेजो से उधार लिए हैं तो हम कैसे उनसे नफरत कर सकते हैं? इसी तरह से भारत में कई ऐसे संप्रदाय धर्म और जातियां रहती हैं जिनसे चाह कर भी नफरत नहीं की जा सकती है चाहे वह हिंदू मुस्लिम सिख इसाई किसी भी धर्म और जाति के हैं उनकी परंपराएं उनकी भाषा उनके धर्म ग्रंथ उनकी संस्कृति ने हमें प्रभावित किया है और हमने उनसे बहुत कुछ सीखा है उनके कवि उनके लेखक हमारे जीवन के हिस्से बन चुके हैं इसलिए कैसे दूसरी जाति और धर्म संप्रदाय से नफरत की जा सकती है? इस स्थिति को कवि निम्न पंक्तियों में दर्शा रहा है-

एक अजीब-सी मुश्किल में हूं इन दिनों-
मेरी भरपूर नफरत कर सकने की ताकत
दिनों दिन क्षीण पड़ती जा रही
अंग्रेजों से नफरत करना चाहता
जिन्होंने दो सदी हम पर राज किया
तो शेक्सपियर आड़े आ जाते
जिनके मुझ पर न जाने कितने एहसान हैं
मुसलमानों से नफरत करने चलता
तो सामने गालिब आकर खड़े हो जाते
अब आप ही बताइए किसी की कुछ जलती है
उनके सामने
?”

साभार google से

कवि कुंवर नारायण अपनी कविता में स्पष्ट करते हैं कि चाहे किसी से कितनी ही नफरत की जाए एक न एक दिन यह नफरत कमजोर पड़ जाती है क्योंकि यह भारत देश सामाजिक संस्कृतियों का देश है यहां पर कई धर्म जाति रंग रूप नस्ल वाले लोग एक साथ रहते हैं और भारत के निर्माण में इन सभी की समान भूमिका लोक जाति के आधार पर नफरत करें संस्कृति के आधार पर या धर्म के आधार पर वह बहुत दिन तक नफरत नहीं कर सकते हैं। क्योंकि कई लोगों के साथ उनके संबंध निकट से जुड़े होते हैं और इन संबंधों को वह भुला नहीं पाता है इसीलिए हम समन्वय से काम लेते हैं और एक दूसरे के पूरक बनकर देश में उपस्थित होते हैं। पूरब से लेकर पश्चिम उत्तर से लेकर दक्षिण विशाल भूमि तक अगर हम घूम कर आएं तो कई लोग हमारे जीवन में ऐसे नजर आएंगे जिससे हमारा गहरा नाता जोड़ा हुआ है। हम चाहकर भी उस संस्कृति उस नाते को उन लोगों को भूल नहीं पाएंगे क्योंकि सभी से हमारा गहरा जुड़ाव बचपन से अब तक दिखाई देता है, इसलिए लाख चाहकर भी हम किसी से कभी भी नफरत नहीं कर सकते हैं। हम कितना ही अपने आप को समझा लें कि यह लोग हमारे नहीं उनकी नस्लें, रंग, संस्कृति, धर्म, जाति अलग है परंतु ऐसा नहीं है वह भिन्न होकर भी अभिन्न है और हमारे होकर ही रहते हैं। इसलिए कवि बहुत आश्चर्य के साथ व्यक्त करता है कि-

सिखों से नफरत करना चाहता
तो गुरु नानक आंखों में छा जाते
और सिर्फ अपने आप झुक जाता
और यह कंबनत्यागराजमुत्तुस्वामी….
लाख समझाया अपने को
कि वह मेरे नहीं
दूर कहीं दक्षिण के हैं
पर मन हे कि मानता ही नहीं
बिना उन्हें अपनाएं।”

कवि कुंवर नारायण अपने निजी जीवन की अवस्था को दर्शाते हुए कहते हैं कि मैंने अपनी प्रेमिका से भी बहुत नफरत करने की कोशिश की इस हद तक नफरत करने की कोशिश की यदि वह मुझे मिल जाए तो मैं उसका खून कर दूं, लेकिन ना जाने क्यों मेरा मन बदल जाता है। क्योंकि वह नफरत करने के काबिल नहीं है और मैं नफरत इतनी ही करूं मेरा भी मन बदल जाता है। क्योंकि मेरी प्रेमिका जब भी मुझसे मिलती है तो कभी मित्र बनकर कभी मां बनकर कभी बहन की तरह तो मेरा मन बदल जाता है यह सिर्फ प्यार ही है जिसके कारण मैं नफरत नहीं कर पाता हूं इसलिए कभी कहते हैं कि-

और वह प्रेमिका
जिससे मुझे पहला धोखा हुआ था
मिल जाए तो उसका खून कर दूँ!
मिलती भी हैमगर
कभी मित्र
कभी माँ
कभी बहन की तरह
तो प्यार का घूंट पीकर रह जाता।”

गूगल से साभार

कुंवर नारायण अपनी कविता के अंत में स्पष्ट करना चाहते हैं कि मैं इतनी ही नफरत कर लूं लेकिन नफरत मेरे भीतर से जन्म ले ही नहीं पाती है। मैं कितना ही पागलों की तरह भटकता रहा हूं कि कोई ऐसी व्यक्ति मिल जाए जिससे मैं भरपूर नफरत करता हूं ताकि मेरा दिल हल्का हो जाए, लेकिन यह कार्य हो नहीं पाता मैं अपने कार्य में असफल हो जाता हूं और मेरी सारी कोशिश खत्म हो जाती है। कवि नफरत करना चाहता है, लेकिन उसे नफरत करने के लायक कोई व्यक्ति मिल नहीं पाता है। यही कवि दर्शाना चाहता है कि यहां इस धरती पर नफरत की जगह नहीं है, बल्कि जगह तो सच में प्रेम की है समन्वय की है, सहिष्णुता की है। हमें एक-दूसरे से प्रेम करके ही आगे बढ़ना चाहिए। इसीलिए कवि कहता है कि मैं जब भी नफरत करने जाता हूं तो ठीक इसका उल्टा ही होता है। कहीं कोई नफरत के काबिल व्यक्ति मुझे मिलता ही नहीं है कि मैं उससे नफरत कर लूं। हर बार मैं नफरत करने जाता हूं, उल्टा मुझे ही प्यार मिलने लगता है। मेरा यह प्यार करो एक न एक दिन मेरी जान ले लेगा। कवि प्रेम को लेकर बहुत आश्वस्त है और कहना चाहता है कि प्रेम ही इस दुनिया को बनाने वाला है-

हर समय
पागलों की तरह भटकता रहता है
कि कहीं कोई ऐसा मिल जाए
जिस से भरपूर नफरत करके
अपना जी हल्का कर लूं।
पर होता है इसका ठीक उल्टा
कोई नकोई कहीं न कहींकभी न कभी
ऐसा मिल जाता
जिससे प्यार किए बिना रही नहीं पाता।
दिनों दिन मेरा यह प्रेम रोग बढ़ता ही जा रहा
और इस वहम ने पक्की जड़ पकड़ ली है
कि वह किसी दिन मुझे
स्वर्ग दिखाकर ही रहेगा।”

कुंवर नारायण की कविता ‘अबकी अगर लौटा तो’ एक संकल्प साधने वाली कविता है जिसके अंतर्गत कवि मन ही मन पढ़ ले रहा है यदि अब उसने मनुष्य रुप में जन्म लिया तो वह बहुत प्रेमी सहायक और लोगों की कद्र करने वाला मनुष्य बनेगा साथ ही साथ वह एक साहसी मनुष्य बनकर लौटेगा। कवि को लग रहा है कि उसका जन्म मनुष्य रुप में तो हुआ है लेकिन अभी वह पूर्ण रूप से मनुष्य नहीं बन पाया है अभी उसे मनुष्य बनने में काफी कमियां महसूस हो रहे हैं। उसे लगता है कि इन कमियों से यह जीवन बना हुआ है लेकिन आने वाले भविष्य में यदि में जन्म लूंगा तो यह कमियां समाप्त कर दूंगा और वृहत्तर होकर लौटूंगा। कुंवर नारायण को यह अनुभव होता है कि इस जीवन में तो वह इस तरह से व्यवहार ना कर पाए जिस तरह से मनुष्यों को करना चाहिए इसलिए वह कहते हैं चेहरे पर जिस तरह से मैंने चेहरा चढ़ा रखा है और अपना व्यवहार बदल रहा है इस दोनों को में आने वाले भविष्य में या  अन्य जन्म में बदल दूंगा। उन्हें लगता है कि यहां जीवन की आपाधापी है संघर्ष है और जिन राहों पर वह चल रहे हैं उन राहों में ऐसे लोग भी हैं जो उनके साथ चल रहे हैं। भले ही मैं उन्हें चलने की जगह नहीं दे रहे हो लेकिन वह संकल्प करते हैं कि आपके यदि जन्म मिला तो मैं उन लोगों के साथ चलूंगा। उन लोगों को साथ लेकर चलूंगा कभी उन्हें गलत निगाह से नहीं देखूंगा कभी मैं उनका प्रतिस्पर्धी नहीं बनूंगा बल्कि उनका जीवन और उन्हें आगे बढ़ाने में मैं भरसक प्रयास करूंगा। इसलिए वह कहते हैं-

 

अबकी अगर लौटा तो

वृहत्तर लौटूंगा

चेहरे पर लगाएं नोकदार  मूछें नहीं

कमर में बांधे लोहे की पूछे नहीं

जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को

तरेर कर न देखूंगा उन्हें

भूखी शेर आंखों से।”

         कवि आगे संकल्प लेते हुए कहता है कि अगर अब मैं लौटा तो फिर पूर्ण रुप से मनुष्यता को साथ में लिए लौटूंगा। कहीं पर भी मन भेद विचार भेद न रखूंगा और मनुष्य को मनुष्य मानकर जीवन जियूंगा। कवि इस दुनिया को बेहतर बनाना चाहता है वह चाहता है कि यहां प्रतिस्पर्धा ना हो मनुष्य को कुचला ना जाए सब को सुविधाएं मिले और सब बेहतर तरीके से जीवन जिए। दिन रात की आपाधापी में मनुष्य भीड़ में पिस्ता जा रहा है उसे तरह तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है काम पर जाते हुए काम से लौटते हुए या अन्य जगह जाते हुए ट्रेनों और बसों में बढ़ी भीड़ में वह चलता चला जा रहा है। कवि कुंवर नारायण चाहते हैं कि इस प्रकार से मनुष्य का जीवन नहीं होना चाहिए उसे सीधा संबंध बनकर मनुष्यता के साथ जीना चाहिए इसलिए उंहें मनुष्य पिद्दी सा जानवर नजर आता है। उन्हें लगता है कि मनुष्य और जानवर में अब भेद नहीं बचा है जानवर की तरह मनुष्य भी एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं इस बात का उन्हें बेहद दुख है।

अबकी अगर लौटा तो

मनुष्यता लौटूंगा

घर से निकलते

सड़कों पर चलते

बसों पर चढ़ते

ट्रेनें पकड़ते

जगह-बेजगह कुचला पड़ा

पिद्दी सा जानवर नहीं।”

         कवि अपनी कविता के अंतिम पंक्तियों में कहता है कि यदि मैं बचा रहा तो पूर्ण रूप से मनुष्य ही बना रहूंगा और हर किसी के प्रति कृतज्ञ होकर जीवन जिऊंगा। कवि मन ही मन संकल्प ले रहा है कि यदि वह वापस लौटा तो किसी को हताहत नहीं करेगा बल्कि सभी का हित सोचता हुआ मनुष्यता को ऊंचा उठाएगा वह किसी से प्रतिस्पर्धा ना करके सबका सहयोगी बना रहेगा। कुंवर नारायण को किस प्रकार की प्रतिस्पर्धा में किस रहे मनुष्य की मनुष्यता पर बड़ा दुख हो रहा है वह मानते हैं कि मनुष्य और मनुष्यता बहुत ऊंची चीज है और उसे इतना नीचे नहीं गिरना चाहिए इसलिए मनुष्य और मनुष्यता को ऊंचा उठाने की वह बात करते हैं।

अगर बचा रहा तो

कृतज्ञतर लौटूंगा

अबकी अगर लौटा तो

हताहत नहीं

सबके हितहित को सोचता

पूर्णतर लौटूंगा।”

कवि ने अपनी कविता में प्रेम का संदेश देने का भरसक प्रयास किया है। कवि मानता है कि इस धरती पर नफरत का कोई स्थान नहीं है चाहे किसी से कितनी ही नफरत कर लो लेकिन उनके धर्म उनकी संस्कृति उनकी जाति या उनकी कोई मान्यताएं परंपराएं ऐसी आपके सामने आकर खड़ी हो जाएंगे जिससे आप जहां पर भी नफरत नहीं कर पाएंगे। कवि को स्पष्ट करता है कि हमारे भारत की सामासिक संस्कृति के कारण हमारी पहचान है और यहां के कई अद्भुत व्यक्ति हमें प्रभावित करते हैं। हम चाह कर भी उन लोगों का विरोध नहीं कर सकते या उनसे नफरत नहीं कर सकते जो हमें विरोधी नजर आते हैं वास्तव में विरोध और नफरत तो समाज में ही ही नहीं यह हमारे मन का भ्रम है जो हम विरोध और नफरत कर रहे हैं वरना हम अपनी अपनी विशेषताओं के साथ जीने वाले लोग हैं और एक दूसरे का आदर सम्मान करने वाले लोग हैं।

कवि कुंवर नारायण मनुष्य और मनुष्यता को ऊंचा उठाने की बात कर रहे हैं। वह इस बात के लिए चिंता व्यक्त कर रहे हैं कि मनुष्य और मनुष्यता दिन-रात अपने स्तर से नीचे गिरती चली जा रही है। लोग आपस में प्रतिस्पर्धा में उलझे हुए हैं और मनुष्य को मनुष्य समझकर अपना दुश्मन समझने लगे हैं। दिन-रात मनुष्य आपाधापी के युग में जी रहा है बस से ट्रेनें पकड़ता हुआ कुछ चलता चला जा रहा है ऐसे कुचले हुए मनुष्य को फिर से गौरव प्रदान करने के लिए कभी संकल्प ले रहा है। कवि बहुत दुखी है कि मनुष्य को यह क्या हो गया है? इस दुनिया में मनुष्य इतना नीचे क्यों गिरता चला जा रहा है? कवि इसीलिए सोचता है कि यदि उसे अवसर मिला तो वह पूर्णतर मनुष्य होकर जिएगा। कवि किसी का प्रतिस्पर्धी नहीं बनेगा। लोगों की सहायता करेगा उन्हें आगे बढ़ने का हौसला प्रदान करेगा। किसी का मन दुखी नहीं करेगा, बल्कि जिनके मन दुखी हैं उनकी हित कामना सोचेगा।

कुंवर नारायण परिचय

कुंवर नारायण (19 सितम्बर, 1927, फैजाबाद, उत्तर प्रदेश) हिन्दी के सम्मानित कवियों में गिने जाते हैं। कुंवर जी की प्रतिष्ठा और आदर हिन्दी साहित्य की भयानक गुटबाजी के परे सर्वमान्य है। उनकी ख्याति सिर्फ़ एक लेखक की तरह ही नहीं, बल्कि कला की अनेक विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले रसिक विचारक के समान भी है। कुंवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के माध्यम से वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। उनका रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं है। फ़िल्म समीक्षा तथा अन्य कलाओं पर भी उनके लेख नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। आपने अनेक अन्य भाषाओं के कवियों का हिन्दी में अनुवाद किया है और उनकी स्वयं की कविताओं और कहानियों के कई अनुवाद विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं में छपे हैं। ‘आत्मजयी’ का 1989 में इतालवी अनुवाद रोम से प्रकाशित हो चुका है। ‘युगचेतना’ और ‘नया प्रतीक’ तथा ‘छायानट’ के संपादक-मण्डल में भी कुंवर नारायण रहे हैं। 19 सितम्बर, 1927 ई. को कुंवर नारायण का जन्म उत्तर प्रदेश के फैजाबाद ज़िले में हुआ था। कुंवर जी ने अपनी इंटर तक की शिक्षा विज्ञान वर्ग के अभ्यर्थी के रूप में प्राप्त की थी, किंतु साहित्य में रुचि होने के कारण वे आगे साहित्य के विद्यार्थी बन गये थे। उन्होंने ‘लखनऊ विश्वविद्यालय’ से 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया। 1973 से 1979 तक वे’संगीत नाटक अकादमी’ के उप-पीठाध्यक्ष भी रहे। कुंवर जी ने 1975 से 1978 तक अज्ञेय द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका में सम्पादक मंडल के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। कुंवर नारायण की माता, चाचा और फिर बहन की असमय ही टी.बी. की बीमारी से मृत्यु हो गई थी। बीमारी से उनकी बहन बृजरानी की मात्र 19 वर्ष की अवस्था में ही मृत्यु हुई थी। कार चलाना कुंवर जी का पैतृक व्यवसाय रहा था। लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने साहित्य जगत में भी अपना प्रवेश कर लिया। लेखन कार्य कुंवर नारायण इस दौर के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार हैं। उनकी काव्ययात्रा ‘चक्रव्यूह’ से शुरू हुई थी। इसके साथ ही उन्होंने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की। यद्यपि कुंवर नारायण की मूल विधा कविता ही रही है, किंतु इसके अलावा उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी अपनी लेखनी चलायी। इसके चलते जहाँ उनके लेखन में सहज ही संप्रेषणीयता आई, वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे। उनकी कविताओं और कहानियों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। ‘तनाव’ पत्रिका के लिए उन्होंने कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का भी अनुवाद किया।
चक्रव्यूह

कुँवर नारायण हमारे दौर के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार हैं। उनकी काव्ययात्रा ‘चक्रव्यूह’ से शुरू हुई। इसके साथ ही उन्होंने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की।

परिवेश हम तुम

उनके संग्रह ‘परिवेश हम तुम’ के माध्यम से मानवीय संबंधों की एक विरल व्याख्या हम सबके सामने आई।

आत्मजयी
उन्होंने अपने प्रबंध ‘आत्मजयी’ में मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को कठोपनिषद का माध्यम बनाकर अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सामने रखा। इसमें नचिकेता अपने पिता की आज्ञा, ‘मृत्य वे त्वा ददामीति’ अर्थात मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ, को शिरोधार्य करके यम के द्वार पर चला जाता है, जहाँ वह तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहकर यमराज के घर लौटने की प्रतीक्षा करता है। उसकी इस साधना से प्रसन्न होकर यमराज उसे तीन वरदान माँगने की अनुमति देते हैं। नचिकेता इनमें से पहला वरदान यह माँगता है कि उसके पिता वाजश्रवा का क्रोध समाप्त हो जाए।
वाजश्रवा के बहाने

कुँवर नारायण ने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की। नचिकेता के इसी कथन को आधार बनाकर कुँवर नारायणजी की जो कृति 2008 में आई, ‘वाजश्रवा के बहाने’, उसमें उन्होंने पिता वाजश्रवा के मन में जो उद्वेलन चलता रहा उसे अत्यधिक सात्विक शब्दावली में काव्यबद्ध किया है। इस कृति की विरल विशेषता यह है कि ‘अमूर्त’को एक अत्यधिक सूक्ष्म संवेदनात्मक शब्दावली देकर नई उत्साह परख जिजीविषा को वाणी दी है। जहाँ एक ओर आत्मजयी में कुँवरनारायण जी ने मृत्यु जैसे विषय का निर्वचन किया है, वहीं इसके ठीक विपरीत ‘वाजश्रवा के बहाने’कृति में अपनी विधायक संवेदना के साथ जीवन के आलोक को रेखांकित किया है।

प्रमुख कृतियाँ

इनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं-

कविता संग्रह – चक्रव्यूह (1956), तीसरा सप्तक (1959),परिवेश : हम-तुम (1961), अपने सामने (1979), कोई दूसरा नहीं (1993), इन दिनों (2002)।खंड काव्य – आत्मजयी (1965) और वाजश्रवा के बहाने (2008)। कहानी संग्रह – आकारों के आसपास (1973)।
समीक्षा विचार – आज और आज से पहले (1998), मेरे साक्षात्कार (1999), साहित्य के कुछ अन्तर्विषयक संदर्भ (2003)। संकलन – कुंवर नारायण-संसार(चुने हुए लेखों का संग्रह)2002,कुँवर नारायण उपस्थिति (चुने हुए लेखों का संग्रह)(2002), कुँवर नारायण चुनी हुई कविताएँ (2007), कुँवर नारायण- प्रतिनिधि कविताएँ (2008) पुरस्कार व सम्मान कुंवर नारायण को 2009 में वर्ष 2005 के ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। उन्हें 6 अक्टूबर को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने देश के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान से सम्मानित किया। कुंवर जी को ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘व्यास सम्मान’, ‘कुमार आशान पुरस्कार’, ‘प्रेमचंद पुरस्कार’, ‘राष्ट्रीय कबीर सम्मान’, ‘शलाका सम्मान’, ‘मेडल ऑफ़ वॉरसा यूनिवर्सिटी’, पोलैंड और रोम के ‘अन्तर्राष्ट्रीय प्रीमियो फ़ेरेनिया सम्मान’ और 2009 में ‘पद्मभूषण’ से भी सम्मानित किया जा चुका है।

डॉ0 मोहसिन खान 'तनहा' द्वारा लिखित

डॉ0 मोहसिन खान 'तनहा' बायोग्राफी !

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

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