शातिर आँखें: एवं अन्य कविताएँ (डॉ० मोहसिन खान ‘तनहा’)

बहुरंग स्मरण-शेष

डॉ0 मोहसिन खान 'तनहा' 56 2018-11-17

इंसानी हकों के उपेक्षित और अनछुए से पहलुओं के मानवीय ज़ज्बातों को चित्रित करतीं ‘डॉ० मोहसिन खान ‘तनहा’ का कवितायें

शातिर आँखें 

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

कई जगह, कई आँखें
पीछा कर रही हैं आपका
क़ैद कर रही हैं आपके फ़ुटेज
जमा कर रही हैं
आपकी सारी हरकतें।
ये शातिर आँखें
इतनी भीतर पहुँच गई हैं कि
कोई भी जगह अब मेहफ़ूज़ नहीं
यहाँ तक कि सुरक्षित क़ब्र भी नहीं।
किसी होटल के कमरे, बाथरूम
अब सुरक्षित नहीं,
जड़ दी गई हों
वहां भी कई छुपी आँखें,
एक डर लगातार
मंडरा रहा है आसपास
कब किसे डस ले
ये नहीं मालूम।
इन ही आँखों से क़ैद हुई हैं
प्यार में पागल कई लड़कियाँ,
जिन्होंने बिना सोचे, समझे
जताया था भरोसा अपने प्रेमी पर
उनको पता ही नहीं कि
(पता न हो तो ही अच्छा)
उनको कितनी आँखें देख रही हैं
अपने मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन पर,
क्योंकि अब वो पोर्न क्लिप का हिस्सा हैं।

याद दिला दूँ  

साभार google से

एक-एक करके ख़ाली होती जा रही हैं जगहें
और भरती जा रही हैं,
वो ख़ाली जगहें
दूसरी चीज़ों से,
मेरे घर का नक्शा कब बादल गया
मुझे पता ही न चला!
आज जब ढूँढने लगा चीज़ें
तो पता चला कि
उन चीज़ों के साथ
मेरी भाषा का नक्शा भी बादल गया है!
मुझे नहीं मिलता किसी घर मे ये सामान,
गंजीना, सिलबट्टा, छींका,
ओखली, ताख, चिकें,
चक्की, मथनी, मरतबान, उगालदान,
अब इन शब्दों का करता हूँ उच्चारण
तो बड़े अटपटे से लगते हैं मेरी ज़बान पर;
नए बच्चे बड़ी हैरत से सुनकर शब्द
देखते हैं मेरी ओर आश्चर्य भरी नज़रों से!
और भी कई चीज़ों को
उनके नामों के साथ गिनाकर,
उनके अलविदा होने से पहले
याद दिला रहा हूँ,
सुराही, मटका, छागल, चूल्हा-फुँकनी,
सूप, सरोता, पानदान, लालटेन।
इनसे भी रिक्त हो जायेंगे
जब सारे घर तो,
शब्द भी मर जायेंगे,
ख़ामोशी के साथ धीरे-धीरे,
अस्थियों की राख़ के समान,
पड़े रहेंगे कलश में शब्द,
सभी शब्दकोशों में,
एक दिन महाप्रलय की आँधी में,
ये शब्द भी उड़ जायेंगे,
शब्दकोशों की ज़मीन से,
तब शायद सबकुछ रिक्त हो जाएगा,
दूसरी चीज़ों के आने के स्वागत में!!!

हम पैर हैं 

साभार google से

जो निरंतर परदेश से रहते हैं संचालित।
सबको सब जगह ले जाते हैं
और ढोते हैं वज़न, हम पैर हैं ।
लेकिन कभी किसी ने की नहीं परवाह हमारी,
हमको दिया गया दर्जा निम्नता का,
तिरस्कार और अपमान ही आया हिस्से में,
धूप, सर्दी, बरसात कोई भी हो मौसम
कभी रुक गए हों, ऐसा न किया हमने।
कभी फिसल गए तो
गलती हमारी ही बताई गई,
कई मुहावरे और कहावतें बनाए गए हम पर
और फब्तियाँ भी कसी गयीं हम पर।
हम रहे सदा मौन,
तो गूँगा समझ लिया गया हमको,
अपवित्र और हेयता की
सब तोहमतें लाद दीं हम पर।
सब बाख़बर होते हुए भी अनजान रहे हैं हमसे,
हम ही तो आधार हैं,
तुम्हारी ऊँचाई और दिशाओं के,
एक हिस्सा हैं तुम्हारा,
फिर क्यों अधम और अछूत
करार दिया जाता रहा है हमें।

सदी की भाषा को भेंट

नए-नए जुमले और मुहावरे,
पिछले कई महीनों से उछल आए
और रच-बस गए
ज़हन, दिलो-दिमाग़ में,
जनता के,
लेकिन ग़लत परिभाषा के साथ।
भाषा तो समाज गढ़ता है,
लेकिन अब भाषा पर भी अधिकार
सफ़ेद देवताओं या कुछ हरे, कुछ भगवा देवताओं ने जता लिया।
नए-नए जुमलों को उछाला गया हवा में,
एक साज़िश के साथ,
बनाए गए कई बेतुके जुमले और मुहावरे
इस सदी की भाषा को भेंट देने के लिए।
खिलवाड़ हुआ है शब्दों का ऐसे मुँह से,
जिनके जबड़ों के बीच अपनी ज़बान नहीं।
बड़ा बेचैन हूँ मैं,
इस बात को लेकर कि
आज ये जुमले और मुहावरे
जो रच-बस गए हैं जनता के
ज़हन, दिलों-दिमाग़ में,
कल अपना असर दिखाएंगे ज़रूर।
बदल जाएगा ज़हन, दिलो-दिमाग़
जनता का,
क्योंकि रिस रहा है धीरे-धीरे,
एक रसायन विष भरा।
बदल जाएगी भाषा,
आने वाली पीढ़ियों की,
जैसे बदली गई थी साम्राज्य विस्तार के तहत हमेशा।
अब ये काम हमारे चुने हुए
शासक कर रहे हैं,
बड़ी ही चालाकी के साथ।

डॉ0 मोहसिन खान 'तनहा' द्वारा लिखित

डॉ0 मोहसिन खान 'तनहा' बायोग्राफी !

नाम : डॉ0 मोहसिन खान 'तनहा'
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 166 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 123 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 193 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 198 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 311 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.