‘किताबों के प्रति दीवानगी’ पटना पुस्तक मेला 2015: (रविशंकर)

बहुरंग रिपोर्ताज

रविशंकर 23 2018-11-18

‘किताबों के प्रति दीवानगी’ पटना पुस्तक मेला 2015 ravishankar

मेले से भारतीय समाज का बहुत ही पुराना और भावनात्मक रिश्ता रहा है ! लोग मेले का इंतज़ार और घूमने की तैयारी बड़े चाव से करते हैं…! बिहार भी अपने मेलों के लिए खासा प्रसिद्ध है ! हरिहर क्षेत्र के सोनपुर मेले को लेकर जितना उत्साह आम जन में होता है, “CRD पटना पुस्तक मेला” को लेकर उससे कम उत्साह बुद्धिजीवी वर्ग में नहीं होता…!

%e0%a4%aa%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a4%beपढेगा बिहार तो बढेगा बिहार ! इस स्लोगन के साथ शुरु हुआ पटना पुस्तक मेला १२ दिनों तक प्रदेश को अपनी ओर आकर्षित करता रहा ! पटना पुस्तक मेला अपनी खासियतों कि वजह से बिहार की एक पहचान के तौर पर उभरा है ! जिसकी धूम बिहार से बाहर पूरे देश में है ! यह सिर्फ़ पुस्तक मेला ही नहीं बल्कि एक “सांस्कृतिक-उत्सव” का रूप है ! जहां किताबों के अलावा तमाम सांस्कृतिक गतिविधियों का संगम देखने को मिलता है ! इस बार मेले के सभी द्वार और ब्लाक्स के नाम नदियों पर रखे गये थे, जैसे –गंगा मुख्य द्वार, सोन प्रशासनिक भवन, गंडक सभागार एवं कोशी मुक्ताकाश मंच इत्यादि ! तमाम सांस्कृतिक गतिविधियों को अपने में समेटे “कोशी मुक्ताकाश मंच” इस मेले का खास आकर्षण रहा ! हर दिन इस मंच से कभी कहानी, कविता,उर्दू मुशायरा तो कभी गीत-संगीत एवं नृत्य का कार्यक्रम तो कभी समसमायिक मुद्दे पर बात –चीत होते रहे…! अमिताभ पाण्डेय द्वारा जापानी कहानी “तोत्तो चान” का पाठ इस मेले का खास आकर्षण रहा ,तो प्रसिद्ध आलोचक नंद किशोर नवल के साथ अभिनेता जावेद अख्तर खां की बात-चीत भी खूब पसंद की गई ! साथ ही हिन्दुस्तान के संपादक शशि शेखर से  live india के संपादक संजीव पालीवाल की बातचीत की भी खूब चर्चा रही…! मेले में कई पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ जिसमें अवधेश प्रीत की “चांद के उस पार चाभी”,विकास कुमार झा की “वर्षावन की रूपकथा”,रत्नेश्वर की “मैज़िक इन यू”, अरूण श्रीवास्तव की “माओनिज़्म इन इंडिया”, शशिकांत मिश्रा की “नान रेज़िडेन्ट बिहारी”, रवीश कुमार की “इश्क में शहर होना”, गिरीन्द्रनाथ झा की “इश्क में माटी-सोना”, डा. ध्रुव कुमार की “नीतीश-गाथा” और संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर की समाजवादी विचारक सच्चिदानंद सिन्हा से बातचीत पर आधारित पुस्तिका “वर्तमान विकास में मुक्ति के प्रश्न” प्रमुख थी !

patana1समसामयिक मुद्दों से रू-ब-रू करवाते नुक्कड़ नाटक इस मेले के जरूरी अंग हो गये हैं ! हर रोज़ एक नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन मेला परिसर में होता था जिसे लोग बहुत ही मन से देखते थे ! एक साथ तमाम पीढी के लोग ! खास कर वैसे स्टूडेन्ट्स जो पढाई और कोचिंग की आपा-धापी में नाटक जैसी चींज़ों से दूर ही रह जाते हैं, उन लोगों को नाटक से जुड़ना बहुत ही अच्छा लग रहा था ! जिसमें ट्रैफ़िक एस.पी प्राणतोष कुमार दास की “ड्रीफ़्टउड आर्ट” की मूर्तियां चार चांद लगा रहे थे…!

जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि इस मेले का एक सांस्कृतिक महत्व है ! नई पीढी को सांस्कृतिक चेतना से लैश करना हमारे लिए बहुत जरूरी है ,वो काम ये पुस्तक मेला बा-खुबी कर रहा था ! इतना ही नहीं साहित्यकारों, पत्रकारों और संस्कृतिकर्मियों के लिए तो ये मेला संगम-स्थल बना रहा ! देश के नामी-गिरामी साहित्यकार , संस्कृतिकर्मी और पत्रकार लोग इस मेले की शोभा बढा रहे थे! जहां एक ओर केदारनाथ सिंह, आलोकधन्वा, अरूण कमल,अवधेशप्रीत,नंदकिशोर नवल,संजय कुंदन, राकेश रंजन, संजय कुमार कुंदन, प्रेम भारद्वाज, गीता श्री जैसे साहित्यकार थे तो दूसरी ओर अरूण श्रीवास्तव, नवेन्दु, एस.पी. सिंह, संजय कुमार, जैसे पत्रकार और मिडिया के लोग ! हिन्दुस्तान की साझी विरासत की संस्कृति को साकार करता ये पुस्तक मेला अपने आप में अनोखा है और मन को सुकून देता है !

CRD पटना पुस्तक मेला पिछले कई सालों से रंगकर्म, पत्रकारिता,पेंटिंग और साहित्य के क्षेत्र में युवा लोगों को पुरस्कृत करते आ रहा है ! इस बार रंगकर्म में बेहतर योगदान के लिये बुल्लु कुमार को “भिखारी ठाकुर पुरस्कार”, पत्रकारिता में बेहतर योगदान के लिये मारिया शकील को “सुरेन्द्र प्रताप सिंह पुरस्कार”, पेंटिंग में अजित शर्मा को “यक्षिणी पुरस्कार” तथा साहित्य में अर्चना राजहंस मधुकर को “विद्यापति पुरस्कर” से पुरस्कृत किया गया ! सभी को पटना के जानेमाने होमियोपैथ चिकित्सक डा. बी भट्टाचार्या ने अपने हाथों से पुरस्कार दिये !  patana

एक ऐसे समय में जब चारों तरफ़ बाज़ार का शोर अपने चरम पर है, और एक से बढकर एक मंहगी और विलासी चीज़ों का प्रलोभन दे, लोगों के मन पर हमले कर रहा है ! शहर के हृदय स्थल(गांधी मैदान) में पुस्तक मेले का आयोजन खासा महत्व रहता है…! ऐसे दौर में जब इन्टरनेट के ज़रिये लोगों तक सारी चीज़ें घर बैठे पहुंच रही हैं किताबों के प्रति इतनी दीवानगी सुकून देती है…! वैसे बिहार अपनी साहित्यिक रूचियों के लिये काफ़ी प्रसिद्द है…! आज भी पूरे देश में सबसे ज्यादा साहित्यिक गतिविधी वाला प्रदेश बिहार को माना जाता है…! रंगकर्म में आज जितने लोग पटना में सक्रिय हैं उतने अन्य किसी राज्य में नहीं …! यही बिहार की ताकत और पहचान है…! तमाम अभाव और पिछड़ेपन के बावजूद ज़िन्दगी के प्रति इसका लगाव कभी कम नहीं होता…! सीखने और जानने –समझने की ललक कभी फ़ीकी नहीं होती…! यही कारण है कि देश जब भी मुश्किल दौर से गुजरा बिहार ने हमेशा उसे संभाला और दिशा दी है…!

इस शहर को एक सांस्कृतिक माहौल देने के लिए CRD और पुस्तक मेले के आयोजकों खास कर युवा साहित्यकार रत्नेश्वर को बधाई…! जिनके प्रयास से ये पुस्तक मेला ,सिर्फ़ पुस्तक की खरीद-फ़रोख्त की जगह से ऊपर उठकर एक सांस्कृतिक मेले के तौर पर अपनी पहचान बनाने में सफ़ल रहा है !  साथ ही कुछ सुझाव ! मुझे याद है पहले जब हम पुस्तक मेले में आते थे तो इतनी जगह होती थी कि कहीं भी बैठकर चिनियाबादाम खा लेने थे, अब जगह कम होती जा रही है…! इस पर ध्यान देने की जरूरत है ! साथ ही अगर मुख्य मंच पर आगे से कुछ समसामयिक मुद्दे पर डाक्यूमेंट्री फ़िल्म भी दिखाई जाए तो अच्छा होगा ! अंत में “पटना पुस्तक मेला” जल्द ही अपने २५वें साल में प्रवेश करे इसकी शुभकामनाएं !

रविशंकर द्वारा लिखित

रविशंकर बायोग्राफी !

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 119 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

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पंकज तिवारी 216 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

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आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

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