‘सबाहत आफ़रीन’ की कविताएँ ॰॰॰॰॰

कथा-कहानी लघुकथा

सबाहत आफरीन 157 2018-11-18

सचेतन मानवीय अभिव्यक्तियों को वर्गों में बाँटना और दायरों में क़ैद करना मुझे हमेशा ही ख़राब लगता रहा है। मेरे लिए ख़ासकर यह संकट तब और गहरा जाता है जब एक वर्ग विशेष, प्रेम और नैतिकता की दुहाई तो देता है किन्तु प्रेम अभिव्यंजना को सामाजिक रूप से ग़ैर ज़रूरी बताने से भी नहीं चूकता। शब्दों से रिसता प्रेम इंसानी संवेदना का जीवंत प्रतीक है। “सबाहत आफ़रीन” की रचनाओं से गुज़रते हुए मानवीय मन के उस कोने में कुछ अंकुरित सा होने लगता है जहाँ इंसानी ऊर्जा का श्रोत अदृश्य वक़्त के अंधियारों से ओझल है। हादसों के वक़्त की उठती चीख़-पुकारों से सहमे और असफलताओं की निराशा से भरते समय में इनकी कविताओं के शब्दों के संवेग में पिघलकर फूटती रचनात्मक प्रेम अभिव्यक्ति न केवल मानवीय संवेदना को झंकृत करती है बल्कि जिजीविषा के संघर्ष को ऊर्जा प्रदान करती है । कुछ इन्हीं एहसासों से भरना है “सबाहत” की रचनाओं से गुज़रना॰॰॰॰॰॰॰॰

1-  

सबाहत आफ़रीन

दिसम्बर की उतरती शाम ,
दरख्तों पर फैले हुए गहरे सन्नाटे
रफ़्ता रफ़्ता उतर रही है ,
दिलों में भी गहरी ख़ामोशियाँ ।

ये ख़ामुशी दरअसल
सुकूत नही है ।
यहाँ तो चीख़ें हैं ,
जो बेआवाज़ होकर भी
इतनी बलन्द हैं ,
कि सितारों से टकराकर
सिसकियों में तब्दील हो रही हैं ।

घने कोहरे की सर्द शाम ,
लरजते कांपते शबनमी पत्ते ,
सहमे परिंदे ,
बेआवाज़ रुकी सी नदी ,
ये समां हर्गिज़ खुशनुमा नही है ।

यह तो उम्र भर की ख़लिश है ,
वो दिलों में क़ैद आँसू हैं
जिन्हें कभी रस्ता न नसीब हुआ ,
बह जाने का ।
यह तो किसी से किये गए
हज़ार वादे हैं ,
जो लबों तक आ ही न पाए ,
जिन्हें दूसरे दिल ने मंज़ूरी ही न दी ।
और वो वादे  वो लफ़्ज़ (मुहब्बत)
अपनी हज़ार शर्मिन्दगी के बाइस ,
आहिस्ता आहिस्ता
रुख़ अख्तियार कर गए खामोशी का ।
कि ख़ामुशी में बेहद तड़प है ,
और ये तड़प तब्दील होती है
दिसम्बर की सर्द शबनम में ,
जिनकी बर्फ़ीली आहों से
काँप उठते हैं दरख़्त
उतर जाते हैं चेहरे ।
ये सन्नाटे बेवजह नही हैं ,
ये नाकाम ,बेबस दिलों की उलझन है ।।

2-  

साभार google से

मुहब्बत नाम है ,
आसूदगी ,मस्ती ख़ुमारी का ,
ज़ेहन की ताज़गी का ,
मख़मली पुरकैफ रातों का ,

मुहब्बत कशमकश है ,
रंजो ग़म है , बेक़रारी है ।
मुहब्बत जान की हद तक यकीं है ,
बेयक़ीनी भी ,
कि ये मासूमियत की
इंतहा को पार करती है ,
मुसल्सल रब्त में रहती है ,
फ़िर भी पूछा करती है ,
“तुम्हे कितनी मुहब्बत है ?
मेरे जितनी मुहब्बत है ?

मुहब्बत बचपना है ,
मर्ज़ है ,संजीदगी भी है ।

ख़यालो की मुसल्सल बारिशों में ,
भीगते रहना ,
कभी बेख़ौफ़ हो जाना ,
कभी घबरा के रो उठना ,
मुहब्बत नाम है बेगर्ज़ ,
उजले उजले जज़्बों का ,
मुहब्बत आग की लपटें हैं ,
थोड़ी तल्खियां भी हैं ,

तग़ाफ़ुल तंज़  में डूबी हुई ,
रातों की उलझन है ।

मगर ये तल्खियाँ ये उलझनें ,
मोहताज होती हैं ,
फक़त इक लम्स में सिमटी ,
मुहब्बत पाश नज़रों की ।
मेहरबानी भरी बेसाख्ता ,.
जब दिल से उठती है ,
मुहब्बत आग की लपटों पे
पानी फेर देती है ।
उसे आगोश में लेकर ,
उससे बारहा कहकर ,

मुझे अब भी मुहब्बत है ।
पहले जितनी मुहब्बत है ।

3- 

साभार google से

मुहब्बत से
दस्तबरदार हो जाना ,
पलट जाना ,
मुकर जाना ,चले जाना ,
दिलों से फिर उतर जाना ।

ये सारे लफ्ज़ कहने में
ज़रा मुश्किल नही फिर भी ,
जब उस इक रात जो गुज़री ,
तब ये वाज़ेह हुआ हमपर ,

मुहब्बत ख़ून बन कर दौड़ती है ,
मेरी नस नस में ,
लहू के रंग में रंगी ,
सुर्ख़ चटकीली बिंदी सी ,
मेरे माथे पे काबिज़ है ।

किनारा उनसे होता है ,
जहां कुछ फ़ासला तो हो ,
तबीयत वाँ पलटती है ,
जहां कुछ रास्ता तो हो ?
परिंदा तब उड़े जब ,
एक छोटा आसमा तो हो ?

ये बेरहमी की शामो शब ,
उतर जाए तो अच्छा हो ,
तख़य्यूल के सवालों से ,
निजात पाएं तो अच्छा हो ,
मुसल्सल चीख़ते दिल को
क़रार आये तो अच्छा हो ।

ये सारे वसवसे ये तीरगी दिल की ,
ख़तम तो हो ,
नज़र के सामने उसका शबीह चेहरा
झलकता था ,
मुहब्बत छोड़ना मुमकिन नहीं ,
की रट लगाता था ।

सुब्ह के नूर ने हौले से
दिल को थपथपाया था ,
हवाये ख़ैर ने चुपके से ,
कानो में बताया था …
“नज़ामे दहर क़ायम है ,
तेरी सच्ची मुहब्बत से ,
कि यह तस्दीक़ करती है
तू जावेद ज़िंदा है ।।

4- 

साभार google से

कैसे कहूँ की तुम्हे पाना है मुझे ,
कि पाने के साथ ही ,
शुरू हो जाती है खोने की प्रक्रिया ,
धीमे धीमे आहिस्ता आहिस्ता ।

तुम्हे पाना ,तुम्हे बाँध लेना भी  तो है ।
एक निश्चित दायरे में बांधकर ,
मैं कब आसूदा रह सकती हूँ भला ।
कि तुम तो ब्रह्माण्ड हो  जिसका न कोई ओर है न छोर ।

तुम्हे पा लेना ठीक वैसा ही है ,
जैसे किसी शरारती बच्चे की मासूमियत छीन लें ,सज़ा देकर ।

तुम हो ओस की बूँदों की मानिंद ,
जिसके लिए कलियाँ सुलगती हैं ,मद्धम आँच पर ,
पूरा दिन।
तुम भोर की पहली किरण हो ,
जिसकी गुलाबी आभा से अभिभूत हो उठती है समस्त सृष्टि ।

तुम्हे पा लेना , तुम्हारी  प्रकृति को समेट देना है , संकुचित अर्थों में ।

आधी रात के बाद ,
भोर से पहले का सुकून
कोई बांध सका है भला ?

तुम तो अथाह हो सागर की तरह ,
तुम्हे पाकर तुम्हे सीमित करना है ,
जबकि तुम असीमित हो अनंत ।

5- 

वो जो उम्मीद दिख रही है न
तितली के परों के बीच ,
संदली रेशमी ।
हाँ वहीं से मैंने मुस्कुराना सीखा,
बग़ैर कल की परवाह किये ।
और वहीं से चाँद ने
कुछ और चमकीला होना सीखा
बग़ैर अंधेरे की परवाह किये ।
वो जो शबनम की ताज़ा बूंदें हैं न
अलमस्त छिटकी हुई ,
उनसे ही कलियों ने  खिलना सीखा
बग़ैर मुरझाने की परवाह किये ।
हाँ , तुमसे मैंने जीना सीखा
बगैर कल की परवाह किये ।

सबाहत आफरीन द्वारा लिखित

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