इंतज़ार: कहानी (सुशील कुमार भारद्वाज)

कथा-कहानी कहानी

सुशील कुमार भारद्वाज 143 2018-11-18

आधुनिक तकनीक के साथ बदलते सामाजिक परिवेश में निश्छल कहे जाने वाले प्रेम ने भी अपना स्वरूप बदला है | महज़ मानवीय संवेदनाओं के रथ पर सवार रहने वाला प्रेम व्यावहारिक धरातल पर उतर कर जीवन यापन के लिए जैसे रोज़ी-रोटी की खोज में है ….. प्रेम के मानवीय स्वरूप को मशीनी स्वरूप में बदलते हुए देख रही है ‘सुशील कुमार भारद्वाज‘ की कहानी …| – संपादक

इंतज़ार

सुशील कुमार भारद्वाज

“मैं क्यों किसी लड़की का इंतज़ार कर रहा हूँ? क्या है वो? अगर वो नज़र के सामने आ भी जाएगी, तो क्या फर्क पड़ जाएगा?” – इन सवालों को खुद से पूछकर ध्यान बटाना चाह रहा था| पर मन था कि मानने को तैयार ही नहीं| बरबस नज़रें चारों ओर उसी को ढूंढें जा रही थी| चार – पांच बार कैम्पस में चक्कर लगा चुका| पर दिखी एक बार भी नहीं| फोन पर बोली थी कि तीन बजे तक रुके रहना मुश्किल है| इसलिए न चाहते हुए भी बारह बजे ही कॉलेज पहुँच गया| पर यह क्या? दोपहर का डेढ़ बज चुका| रास्ते पर नज़र गडाये इंतज़ार करता रहा| भूख लगी तो होटल में खाने बैठ गया, लेकिन नज़र रास्ते पर ही टिकी थी कि कहीं वह चली न जाय| मैं स्वयं नहीं समझ पा रहा था कि उसे देखने के लिए इतना उतावला क्यों हूँ? अगर मेरी इस बैचेनी पर किसी परिचित की नज़र पड़ जाएगी तो क्या जबाब दूँगा? कोई कुछ कहे या न कहे खुद सोचना चाहिए कि जो कर रहा हूँ – क्या वह ठीक है?

दोपहर की चिलचिलाती धूप में इंतज़ार करते-करते खुद पर गुस्सा आने लगा| कैसा आवारा हूँ? जो पढाई छोड़ यहाँ उसके इंतज़ार में समय बर्बाद कर रहा
हूँ? क्या जरुरी है कि वो मुझसे प्रेम करती भी होगी? हंसकर बोलना और मजाक करना तो उसकी आदत है| फोन पर वह कुछ कही नहीं – यही क्या कम है? मुझ जैसे से कोई दिल लगाने की बात कैसे कोई सोच सकती है? क्या है मेरे पास? 4 G के ज़माने में 2 G का साधारण – सा मोबाइल जो कि अपने नेटवर्क की ही तरह कभी–कभी आउट ऑफ सर्विस भी हो जाता है, जैसे आज| अभी मोबाइल ठीक होता तो कॉल नहीं भी करता, तो कम से कम फेसबुक से तो संपर्क कर ही सकता था? एक से बढ़ एक नए फैशनेबल माडल वाले बाइक के ज़माने में पुरानी स्कूटर चला रहा हूँ| किसी बड़े होटल में जाने की बात आ जाए तो बगलें झांकने लगूं| उस दिन दफ्तर में बात बात में वो बोली – “आप अपने लिए एक लड़की खोज लीजिए|” उसने ये बात क्यों कही? आज तक ठीक से समझ नहीं पाया| पर अपने मुंहफट आदत के कारण कहा –“आप ही खोज दीजिए न! वर्ना मुझे तो मिलेगी ही नहीं|” बोलने को तो बोल दिया पर मन ने कहा –“आप को छोड़ मैं किसे खोजने जाऊँ?” खुद को हंसी का पात्र बना उससे रोज पूछने लगा –“कोई मिली क्या?” और वह

रोज खोजने का बहाना बना टाल जाती थी| गोया रोज बातचीत शुरू करने का एक मंत्र मिल गया| एक दिन बोली –“कल आपको उसका नाम बताउंगी|” दिल में खुशी के गुब्बार फूटने लगे| बस इसी कल्पना में दिन बीत गया कि कल जब वो मुझसे अपने प्रेम का इजहार करेगी तो क्या होगा ? कैसे वो अपने झिझक को तोड़ कर पहली बार कहेगी? मैं क्या करूँगा? उसके हाथों को कसके थाम लूँगा? नहीं, बिल्कुल नहीं| थोडा मजा तो उसे भी जरुर चखाऊंगा| बहुत मुझे परेशान की| थोडा तो उसे जरूर तडपाउंगा| हाँ, इतना तो मुझे भी हक है| …… अरे उसे तो किसी और लड़की का नाम बता कर जलाऊंगा भी| मैं कोई कम हूँ| बहुत नखरे दिखाई अब थोडा मुझे भी झेले|

अहले सुबह दफ्तर में काफी पहले ही पहुँच गया| थोडा माहौल में खुद को ढालने की कोशिश करने लगा| कुछ भी नया नही था| वही टेबल, कुर्सी, कंप्यूटर, और ताजे समाचारों की झलक दिखलाती टेलीविजन | लोग भी तो वही थे| लेकिन पता नही क्योंकर तो सबकुछ नया नया लग रहा था| उसका इंतज़ार करता रहा| और जब आयी तो उसके पीछे ही पड़ गया| लेकिन ढलते दिन के साथ दिल बैठता ही चला गया| मेरे सारे सपने एक एक कर टूटते चले गए| वो किसी का नाम नही बतायी| समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ? फेसबुक से भी सवाल पूछ लेने की इच्छा हुई लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया? जब वो लिफ्ट में चढ गयी तो मन के वशीभूत हो बाबला की तरह उसके पीछे चला गया| और अपने दारुण स्वर में पूछ बैठा –“नाम बताने में कितना समय लीजिएगा?” और वो गर्दन हिलाते हुए बोली – “अभी मिली ही नहीं है|” होठों पर हलकी सी हंसी नाच गयी और दिल से आवाज आयी –“किसको इतना बड़ा बेबकूफ समझ रही हो| मैं तुम्हारे हामी के इंतज़ार में तड़प रहा हूँ और तुम हो कि …….” फिर मन को संयमित कर सख्त स्वर में बोला –“आप जाइये| कल मैं आपको उसका नाम बताऊंगा|” – शायद इसके सिवा कोई चारा भी न था| शायद उसे भी मेरे मुँह से हाँ सुनने का इंतज़ार था|
लेकिन अंदर से एक आवाज आयी – “खुद पर हंसना बुरा नहीं है, लेकिन किसी को अपनी भावनाओं से खेलने देना समझदारी का काम नहीं है|” फिर इन सारी बातों से दूर रह अपने काम पर ध्यान देना ही अच्छा लगा|

अगली सुबह इन सब बातों से बेपरवाह हो मैं अपने कागजों में उलझा था| तभी पीछे से आकार मेरे हाथ से कलम छीन कर बोली –“क्या बात है? बहुत व्यस्त हैं?” उसके चेहरे पर नजर पड़ी तो उसकी भाव – भंगिमा देखकर मन अंदर तक गुदगुदा गया| इच्छा हुई कि कहूँ – “तडपाने के सिवा कुछ आता भी है या बस ……? लेकिन कहा कुछ नहीं| चुपचाप अपने काम में फिर लग गया| “बहुत नाराज हैं क्या?” – कान से उसकी आवाज टकरायी| झटके से उसके चेहरे पर नज़र पड़ी और उसके आँखों में देखने लगा| मन में बुदबुदाने लगा – “तो क्या आपको मेरी भी चिंता है| यदि हाँ तो फिर क्यों नहीं खोल रहें हैं अपने दिल के दरवाजे? सिर्फ जले पर नमक छिडकने आयी है? कमाल पर कमाल किये जा रही हो| अपने मजनू से उसके लैला का नाम पूछ रही हो? आखिर क्यों?” “आप बोल रहे थे कि आज आप अपने प्रेमिका का नाम बताएँगे| मैं कब से आपके मुँह से उसका नाम सुनने को बैठी हूँ और आप हैं कि ….” उसकी पतली सी आवाज उसके होठों से निकली| जी में तो आया कि उसे तड़पने को छोड़ दूँ| लेकिन मुझसे संभव ही कहाँ था| खुद तो खुजली हो रही थी| और पता नहीं कहाँ से तो हिम्मत आ गयी? और मैंने एक कागज पर लिख दिया – “एन.आर”| देखते ही देखते उसके चेहरे पर खुशी की एक हल्की-सी छाया दिख गयी – मतलब नंदिता रानी | परंतु जिसका मुझे डर था वही हुआ| वह तुरंत हंस कर नंदिनी और रजनी का नाम लेने लगी, जिसका कोई मतलब न था| फिर भी मैंने कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा| इंतज़ार करता रहा कि शायद कभी वह सीरियस होगी| लेकिन उसके लिए यह सब, शायद मजाक से ज्यादे कुछ था ही नहीं| हंसी मजाक का यह दौर कुछ और खींचता उससे पहले ही एक मीटिंग की खबर आ गयी| यह मीटिंग नहीं एक वज्रपात था, जिसकी उम्मीद हममें से किसी को नहीं थी| महज पांच मिनट में हमलोग समझ गए कि तत्काल प्रभाव से कंपनी बंद हो रही है| जिस बड़ी कम्पनी ने इसे ख़रीदा है वे अपने अनुसार लोगों को काम पर रखेंगें| फिर तो सबके चेहरे का रंग ही उड़ गया| कोई नयी नौकरी की तलाश में जुट गया तो कोई फिर से आगे की पढाई करने कॉलेज की ओर चल पड़ा|

जीवन में आगे बढते रहने के सिवाय कुछ है नहीं और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हमेशा कुछ न कुछ डिग्री या अनुभव हासिल कर सबसे अलग दिखने की कोशिश न की तो बेरोजगारों के लाइन में आ कर सरकार और सिस्टम को गाली देकर भड़ास निकालते रहिए| उससे मिलेगा तो कुछ नहीं बस अपनी जिंदगी को बर्बाद करते रहिए. खैर कुछ दिनों तक, लोग मोबाइल और फेसबुक से संपर्क में रहे, लेकिन धीरे – धीरे दूरी बढ़ती ही चली गई| फुर्सत नहीं है भैया| रोजी –रोटी है तो हँसी-मजाक, प्रेम सब अच्छा लगता है और लोग भी मिल जाते हैं वर्ना…. वैसे निठ्ठलों की जमात चाहिए तो बात अलग है| अरसे बाद यूँ ही एक बार उससे फेसबुक पर बात – बात में पूछ लिया – “मुझे क्योंकर कोई याद रखेगा?” झट से जबाब दी –“अपनों को भी कोई भूलता है क्या?” दिल को सुकून मिला| चलो कम से कम अपनेपन का एहसास तो है| फिर भी दिल के एक कोने में कुछ कचोटते रहता था| और एक बार यह सोचकर फोन किया कि अब बेबजह में उसे क्यों तंग करूँ? अंतिम बार साफ़ – साफ़ बता देता हूँ कि -“मैं आपको पसंद करने लगा इसलिए बात कर लेता था| फिर न कभी फोन करूँगा न ही दिखूंगा और न ही फेसबुक पर मैसेज करूँगा|” अंतिम बार मिलने के इरादे से हिम्मत कर मिलने की बात कहीं तो पटना कॉलेज में ही आ जाने की बात कही| पर शायद वो मुझसे वास्तव में मिलना ही नहीं चाहती हो| फेसबुक पर प्यार के इजहार और और इंकार में वक्त ही कितना लगता है? शब्दों में थोड़ी सख्ती आयी नहीं कि कब आपका परवान चढ़ता प्रेम ब्लाक हो जाय कहा नहीं जा सकता| इसके चक्कर में कम लोगों ने जान गँवाई है जो इस पर विश्वास किया जाय? क्या पता? उसकी नज़र मुझ पर पड़ी हो और चुपके से घर चली गयी हो? या फिर आयी ही न
हो?

.दिल में एक ही इच्छा बार – बार हो रही थी – काश! एक बार दिख जाती| दिल को मनाने की हर संभव कोशिश करता रहा| पर दिल उसे देखने को बेक़रार था| दिन के दो बज चुके| दरवाजे में तालें लटकने लगे| फिर भी आँख और पैर कॉलेज की ओर ही बढे जा रहे थे| मिलने की सारी उम्मीदें समाप्त हो रही थी| कंठ भर आया| आंसू निकलने को ही थे, तभी आंसू को पीछे धकेल मन से धिक्कार की एक लपट उठी– “कैसा बदनसीब हूँ कि किसी से मिलने के लिए इतना बेक़रार हूँ| और वो है कि दिख ही नहीं रही है| मन बार – बार ईश्वर से प्रार्थना करने लगा – “हे भगवान! आज तक मैंने यदि एक भी अच्छा काम किया है तो उससे मिलवा दे| मैं कुछ अनुचित तो नहीं मांग रहा? दूर से ही सही उसकी एक झलक दिखला दे|” निराशा में भाषा भवन के कोरिडोर के पास वाली पायदान पर बैठकर क्रिकेट देखने लगा| लेकिन क्रिकेट का कोलाहल भी मन को अपनी ओर नहीं खीच पा रहा था| कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कौन आउट हुआ और किसने बौलर की छक्के –चौके से बखिया उधेड़ दी| अचानक एक विचार दिमाग में आते ही होठों पर थिरकन होने लगी| यही वह कॉरिडोर है जहाँ फ़िल्मकार सत्यजीत रॉय ने अपने फिल्म “अभियान” की शूटिंग की थी| जहाँ मैं बैठा हूँ, यहीं कहीं पर नायक की मुलाकात नायिका से हुई थी| कितना विचित्र है न? फिल्म में नायक एवं नायिका की मुलाकात हो जाती है, लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा कुछ नहीं होता है|

तभी एक आवाज ने ध्यान भंग किया| लगा किसी के सैंडिल के चलने की खट – खट की आवाज है, शायद पीछे से कोई गुजर रही थी| आवाज धीरे धीरे तेज होती जा रही थी, और उस आवाज के साथ बढती जा रही थी मेरी धडकन| खुद को रोक न सका तो पीछे मुड़ा, एक लड़की जा रही थी| लगा शायद नंदिता ही जा रही है| आवाज देना चाहा पर डर गया कि कहीं कोई दूसरी लड़की हुई तो बेमतलब का बबाल हो जाएगा| पर ज्यों – ज्यों वह आगे बढती जा रही थी त्यों – त्यों दिल भारी होता जा रहा था| ऐसा लगा जैसे कि नंदिता पास होकर भी दूर होती जा रही थी| यदि इसे रोका नहीं तो शायद बहुत देर हो जाएगी| खुद को बहुत जब्त करते हुए बोला – “हल्लो!” पर वह लड़की मेरी आवाज से अनजानी आगे बढती रही| कोई उपाय नहीं सूझ रहा था| इच्छा हुई दौड कर उसे रोक लूँ लेकिन हाथ मलने और आँख भीचने के सिवा कुछ न कर पा रहा था| हमेशा भागने को तैयार रहने वाले पैर हिलने को तैयार नहीं थे| अचानक मेरे मुँह से एक जोर की आवाज निकली – “नंदिता”| समझ में नहीं आया क्या हो गया? अंदर तक डर गया| इस बार वो लड़की रुक गयी, और अपने लंबे बालों को झटकते हुए पीछे मुड गई| मैं अवाक् रह गया, काटो तो खून नहीं| गुलाबी सलवार सूट में खुले बालों वाली वो लड़की कोई और नहीं नंदिता ही थी| वो सिर्फ मुस्कुराये जा रही थी| वह मेरे पास आ गयी| मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ?

मैं पागल की तरह उसे सिर्फ एक टक देखता रहा| उसके कहने पर फिर मैं वहीं पायदान पर उसके साथ बैठ गया, और वह इधर उधर के सवाल मुझसे पूछे जा रही थी| मैं उत्तर दिए जा रहा था लेकिन मेरी नज़रें उसके चेहरे पर जमी हुई थी| उसके चेहरे पर छाई खुशी को तलाशने की कोशिश करता रहा ताकि यह जान सकूँ कि दोनों तरफ एक ही भावना संचारित हो रही है या बस यूँ ही ….. | लेकिन मेरा ध्यान तभी भंग हुआ जब हाथ मुझे किसी चीज के छुअन का एहसास हुआ| नंदिता मेरे हाथों को अपनी हथेली से कसने की कोशिश कर रही थी| थोड़ी देर के बाद एहसास हुआ कि लोगों की निगाहें हमलोगों पर जमनी शुरू हो गई| तो खुद को संभालते हुए वहां से हटने के इरादे से बोला – “आपको देर हो रही होगी चलिए, आपको आगे तक छोड़ आता हूँ| इधर – उधर देखने के बाद वह अपनी हाथ पीछे खीच ली, नज़रें नीची की ओर झुकी हुई थी| फिर हम लोग बाहर कि ओर चल पड़े| गप्प करते हुए लोगों के कारण अलग – अलग चलने की कोशिश कर रहे थे| लेकिन बार बार नजदीक आ ही जा रहे थे| चलते चलते मेरे मुँह से निकला- “आपके शादी की तैयारी चल रही होगी ना?” वह झटके से मेरी ओर देखने लगी| मैं थोडा डर गया| थोड़ी देर बाद वह कुछ बोले बगैर चुपचाप चलने लगी| ऑटो के आते ही वह उसमें मुस्कुराते हुए बैठकर गई और मैं उसे जाते हुए देखता रह गया| उसके मुस्कुराहट में इजहार था या इंतज़ार करने का जबाब|

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

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