‘तरसेम कौर’ की तीन कविताएँ

तरसेम कौर 7 2018-11-18

कविता लिखी नहीं जाती शायद वह बनती है, सजती है भीतर कहीं गहरे मन के अंतस में, और रिस पड़ती है शब्दों की बुनावट लेकर, कुछ ऐसे ही एहसास से भरतीं हैं ‘तररसेम कौर’ की कविताएँ ………………….

१-  

तरसेम कौर

तरसेम कौर

आजकल बचाने वाले कम हैं
मारने वाले ज़्यादा हो गए हैं
हर कोई नज़र गड़ाए बैठा है
कोई किसी के शरीर पर
कोई किसी के पैसे पर
किसी को है किसी की कुर्सी की चाह
तो किसी को है किसी की ज़िन्दगी की चाह
घर की दीवारें
और धरती की सीमाएं
बढ़ रही हैं दिन ब दिन
पत्थर मार के की जाती हैं बातें
प्यार मोहब्बत और ईमान को
बन्द करके रख दिया है एक तिजोरी में
जिसकी चाबी फेंक दी गई है
हंसी और कहकहे भाप बनकर खो गए हैं
बन गए हैं बादल न बरसने वाले
ले रही तोहफ़ा हमसे अगली पीढ़ी
खोखली इंसानियत का
पैबन्द लगे फ़टे पुराने रीति रिवाजों का..!!

२-

बड़ी कोशिश होती है मुझे मारने की
पर मैं मरता नहीं हूँ
मैं प्रेम हूँ
मैं अमर हूँ
अभी चाँद की मद्धम चांदनी फैलती है
अभी नदी मिलती है समन्दर में

साभार google से

साभार google से

अभी एक प्रेयसी सजती है
अपने पिया के लिए
अभी एक माँ करती है दुलार अपने जने को
अभी उतरता है पानी आँखों से
अभी होती है तेज़ धड़कनें दिल की
अभी आती हैं अच्छी खबरें जो देती हैं सुकून
अभी भी मनाए जाते हैं प्यार के त्यौहार
अभी भी हवाओं को बाँधा नहीं गया है
सूरज की रौशनी
चन्दा की चांदनी
तारों की बारात
अभी भी किसी एक के लिए नहीं है..!!

३-

खाली ठंडा चूल्हा
और
खाली ठंडे पड़े पेट
की भूख की गर्मी
औंधी पड़ी थी
काले तवे के नीचे
चूल्हे की ठंडी राख भी
कब की हवा हो चुकी थी
और छा गई थी बादल बनकर
टीन की छत के ऊपर
टपकेगा अभी पानी
और टनटन बोलेगी
खाली ठंडी टीन की छत
और भी इकठ्ठे हो जाएँगे
नीचे बैठे
खाली ठंडे पड़े पेट
आंतड़ियों की आवाज़ें
करती हैं कभी बजकर मौन को भंग
टकराती हैं आँखें और
फिर जाने कब बंद हो जाती हैं
ठंडे पेट की भूख की गर्मी से ही शायद..!!

तरसेम कौर द्वारा लिखित

तरसेम कौर बायोग्राफी !

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जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

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