उपेन्द्र परवाज़: की ग़ज़ल….

उपेन्द्र परवाज़ 4 2018-11-18

उपेन्द्र परवाज़: की ग़ज़ल….

उपेन्द्र परवाज़: की ग़ज़ल….

१-  

उपेन्द्र परवाज़

उपेन्द्र परवाज़

आँख के मौसम जो बरसे, ज़िस्म पत्थर हो गये
अब के सावन बारिशों से, बादल ही तर हो गये |
इस कदर थे मोजज़े, अपने जुनूने इश्क के
क़त्ल करने के बाद, खुद घायल ही ख़ंजर हो गये |
उनके दिल के रास्तों में , इतनी थी दश्त-ए- बे-करां
मंजिलों से भटके तो, रस्ते ही रहबर हो गये |
ख़त्म है आँगन, झरोखों के लिबादे ही बचे
घर कभी जो थे वही अब, आज पिंजर हो गये |
इतनी दस्त-ए-तलब बाद, सनम तुझे अब क्या मिले
लग गयी उनको दुआएं, बंदा-परवर हो गये |
बनने चले थे “परवाज़”,तुम अमीरे-ए- कारवाँ
इस कदर भटके हो, खुद तुम आज बेघर हो गये |

उपेन्द्र परवाज़ द्वारा लिखित

उपेन्द्र परवाज़ बायोग्राफी !

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जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

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