किसी ईश्वर की तरह नहीं: एवं अन्य कवितायेँ (विमलेश त्रिपाठी)

विमलेश त्रिपाठी 17 2018-11-18

मानवीय प्रेम को रचनात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करतीं ‘विमलेश त्रिपाठी‘ की तीं कविताएँ …..

किसी ईश्वर की तरह नहीं 

विमलेश त्रिपाठी

विमलेश त्रिपाठी

मेरी देह में सूरज की पहली किरणों का ताप भरो
थोड़ा शाम का अंधेरा
रात का डर भरो मेरी हड्डियों में

हंसी का गुबार मेरे हिस्से की कालिख में
उदासी की काई मेरी उजली आत्मा पर

किसी ईश्वर की तरह नहीं
एक मामूली आदमी की तरह मुझे प्यार करो।

प्रेम करना अंततः

मैं प्रेम करता हूं
और एक नाम के आगे लिखता हूं एक नाम
नाम लिखना प्रेम नहीं
प्रेम का अर्थ है जो मेरे घर के अहाते पर छुपकर बैठा रहता है

मैं पत्नी को प्रेम करता हूं

कभी कहता नहीं कि प्रेम करता हूं तुम्हें
प्रेमिका को सैकड़ों बार कहता हूं
कि तुम्हें प्रेम करता हूं
जबकि सच यह कि मैं नहीं करता उससे प्रेम

कविता में प्रेम लिखता हूं बार-बार
बार बार मिटाता हूं
मुझे साबित करना है कविता के प्रेम को सबसे अलहदा
अद्वितीय

कविता के प्रेम और सचमुच के प्रेम को एक करने की कोशिश में
छिल जाती आत्मा की त्वचा
होते जाते मेरे शब्द लहुलुहान

प्रेम करना अंततः एक खूब पतली पगडंडी पर
घने अंधेरे के बीच चलना निरंतर
अंतहीन
कहीं पहुंचने को नहीं
बार-बार लौटने को
ऐन उसी जगह
जहां से चलने की शुरूआत।

दरअसल

हम गये अगर दूर
और फिर कभी लौटकर नहीं आय़े
तो यह कारण नहीं
कि अपने किसी सच से घबराकर हम गये

कि अपने सच को पराजित
नहीं देखना था हमें
कि हमारा जाना उस सच को
जिंदा रखने के लिए था बेहद जरूरी

दरअसल हम सच और सच के दो पाट थे
हमारे बीच झूठ की
एक गहरी खाई थी

और आखिर आखिर में
हमारे सच के सीने में लगा
जहर भरा एक ही तीर

दरअसल वह एक ऐसा समय था
जिसमें बाजार की सांस चलती थी

हम एक ऐसे समय में
यकीन की एक चिडिया सीने में लिए घर से निकले थे
जब यकीन शब्द बेमानी हो चुका था

यकीनन वह प्यार का नहीं
बाजार का समय था

दरअसल उस एक समय में ही
हमने एक दूसरे को चूमा था

और पूरी उम्र
अंधेर में छुप-छुप कर रोते रहे थे।

विमलेश त्रिपाठी द्वारा लिखित

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अनीता 51 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

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