'चमन बहार' : (अभिषेक प्रकाश)

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अभिषेक प्रकाश 1153 6/22/2020 12:00:00 AM

दिलजले दीवारों पर दिल बनाकर अपने नाम के साथ प्रेमिका का नाम ऐसे लिखते थे जैसे कि वह दीवार ही शादी का मण्डप हो।

चमन बहार

चमन बहार' सिनेमा 'पान बहार' की तरह है। फ़िल्म की शुरुआत एक मीठे पान की तरह होती है और बीच मे जैसे नौसिखिए को ज़र्दा खाने की आदत पड़ जाए वैसी स्थिति बनी रहती है लेकिन उसका अंत होता है तम्बाकू के डिब्बे पर लिखे इस नसीहत के साथ कि "तम्बाकू खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है!"
फ़िल्म की शुरुआत में ऐसा लगता है कि कुछ बहुत मनोरंजक मिलने वाला है लेकिन शुरुआत एक नैतिक रूप से गलत और लिजलिजापन लिए हुए होती है।लेकिन जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है यह हमें इंटरनेट की दुनिया से पहले के छिछोरे समाज की ओर ले चलती है, ऐसा समाज जिसका हिस्सा हम हैं भी और रह भी चुके हैं! हालांकि बहुत कुछ देखने मे अच्छा और मनोरंजक भी है लेकिन अंतिम रूप से वह वही बात करता है जो एक सभ्य समाज करने से बचता है।
कहानी में एक छोटे से बी क्लास टाउन में एक नौकरीशुदा आदमी अपने छोटे से परिवार के साथ  ट्रांसफर आता है।उसकी एक छोटी बेटी भी है, हां यह अलग बात है कि वह पूरे कस्बे के लिए छोटी नही है!
यह अपना पूर्वाग्रह हो सकता है लेकिन तमाम निर्भया और बलात्कार संस्कृति के आलोक में जब पर्दे पर हम लाखों-करोड़ों लगाकर वही छिछोरापन देखते हैं तो मन परेशान होता है।फिर यह भी लगता है कि यह सब तो अपने अगल बगल का ही कहानी-किस्सा है।इसके वाहक तो हम सब ही हैं।और फिर जब अपना नैतिक दृष्टि छोड़ चमन चमचों का हिस्सा बन जाते हैं तो सिनेमा गुदगुदाने लगती है।ऐसे ही लोगो के लिए 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के निर्देशक ने रामाधीर सिंह से कहलवाया था कि "जब तक भारत मे सिनेमा रहेगा लोग चूतिया बनते रहेंगे!"
खैर इस फोर जी दुनिया से पहले अपने प्यार को भी पाना सरकारी नौकरी पाने जैसा था।घर-परिवार से लेकर पूरा मुहल्ला यहां तक कि कस्बा भी प्यार का कुरुक्षेत्र हुआ करता था, जहां सारे के सारे विरोधी खेमे के लोग हुआ करते थे।और तब मुहब्बत की जंग के लिए भी चाणक्य होना पड़ता था।
वह कागज़ी ज़माना था जहां प्यार को समय की धीमी आंच पर पकाता कोई और था और ले जाता कोई और।एक तरफा प्यार में हमेशा से ही जीत गुट निरपेक्ष वाली की होती रही है !  साल-साल भर लोगो को लग जाता था एक कलम और नोट्स मांगने में और फिर जब प्रेमी कोई पनेरी हो तो अंत मे असलियत में वह डेरी मिल्क  बन कर रह जाता था।
हां कुछ तीसमार खां होते थे जो फन्ने खां बनने में प्रेमी गैंग को फाइनेंस किया करते थे।और बाकि दिलजले दीवारों पर दिल बनाकर अपने नाम के साथ प्रेमिका का नाम ऐसे लिखते थे जैसे कि वह दीवार ही शादी का मण्डप हो।
इस फ़िल्म में एक छोटे से कस्बे की एक ऐसी ही छिछोरी कहानी है।जो हंसाती है लेकिन तभी जब आप मर्यादा के भीतर आचरण की ना सोचे !  
वास्तविकता यह है भी कि समय जरूर बदला है लेकिन महिला को लेकर सोच अभी भी वही है।अभी भी समूह की भाषा स्त्री को लेकर इसी फंतासी को गढ़ता है! 
लेकिन फ़िल्म जब आगे बढ़ती है तो अपने पात्रों के माध्यम से एक छोटे कस्बे की युवा उनकी दिनचर्या वहां की राजनीति, आपसी संबंधों दोस्ती-यारी का प्यार भरा रिश्ता सब कुछ थोड़ा-थोड़ा दिखाते हुए झांकी दर्शन कराती है।साथ मे एक ऐसे कस्बे या समाज मे एक लड़की के बड़े होने के साथ-साथ जुड़ी, उसके और उसके मां-बाप की चुनौतियों को भी बखूबी फ़िल्म में दिखलाया गया है।
फिल्म के पात्र सब ज़बर है।सबने बहुत खूबसूरती से अपने किरदार को निभाया है।कोई भी पात्र रैपिडेक्स इंगलिश स्पीकिंग कोर्स की तरह फटाफट वाले नही बल्कि 'डैडी' की तरह भोकाली हैं! यहां डैडी आपको फ़िल्म देखकर ही समझ आएगी।
फ़िल्म की शुरुआत में ओपनिंग क्रेडिट्स उम्दा है, नाम लिखते समय ही मानो ऐसे लगता है जैसे हम रिक्शे पर बैठकर शहर घूम रहे हो वह भी तब जब वहां छात्रसंघ का चुनाव होने वाला हो!
सब कुछ बहार है और मजेदार भी ! उतना ही मजेदार है इस फ़िल्म के गीत और संगीत।दोनो मंगेश धाकड़े और अंशुमान मुखर्जी बधाई के पात्र हैं। निर्देशक और लेखक अपूर्व धर हैं।निर्देशक की अपनी मेहनत और अपनी सोच है।तकनीकी रूप से फ़िल्म बढ़िया है लेकिन स्क्रिप्ट को लेकर हम सबके विचार अलग अलग हो सकते हैं।
हां यह जरूर है कि एक सभ्य और संवेदनशील समाज के हिस्सा होने की वजह से यह फ़िल्म आपको परेशान करेगी और शायद इसको देखकर आपको अपने छिछोरेपन का अहसास हो जाए !

अभिषेक प्रकाश द्वारा लिखित

अभिषेक प्रकाश बायोग्राफी !

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लेखक, फ़िल्म समीक्षक

पूर्व में आकाशवाणी वाराणसी में कार्यरत ।

वर्तमान में-  डिप्टी सुपरटैंडेंट ऑफ़ पुलिस , उत्तर प्रदेश 

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