‘सबाहत आफ़रीन’ की कविताएँ ॰॰॰॰॰

‘सबाहत आफ़रीन’ की कविताएँ ॰॰॰॰॰

सबाहत आफरीन 91 2018-11-18

सचेतन मानवीय अभिव्यक्तियों को वर्गों में बाँटना और दायरों में क़ैद करना मुझे हमेशा ही ख़राब लगता रहा है। मेरे लिए ख़ासकर यह संकट तब और गहरा जाता है जब एक वर्ग विशेष, प्रेम और नैतिकता की दुहाई तो देता है किन्तु प्रेम अभिव्यंजना को सामाजिक रूप से ग़ैर ज़रूरी बताने से भी नहीं चूकता। शब्दों से रिसता प्रेम इंसानी संवेदना का जीवंत प्रतीक है। “सबाहत आफ़रीन” की रचनाओं से गुज़रते हुए मानवीय मन के उस कोने में कुछ अंकुरित सा होने लगता है जहाँ इंसानी ऊर्जा का श्रोत अदृश्य वक़्त के अंधियारों से ओझल है। हादसों के वक़्त की उठती चीख़-पुकारों से सहमे और असफलताओं की निराशा से भरते समय में इनकी कविताओं के शब्दों के संवेग में पिघलकर फूटती रचनात्मक प्रेम अभिव्यक्ति न केवल मानवीय संवेदना को झंकृत करती है बल्कि जिजीविषा के संघर्ष को ऊर्जा प्रदान करती है । कुछ इन्हीं एहसासों से भरना है “सबाहत” की रचनाओं से गुज़रना॰॰॰॰॰॰॰॰

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग तीन” (शक्ति प्रकाश)

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग तीन” (शक्ति प्रकाश)

शक्ति प्रकाश 163 2018-11-18

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृश्य दुनिया ज़हान में हर पल नज़र आते ही हैं | किन्तु सामाजिक रूप से गैर-जरूरी मानकर अनदेखी की जाने वाली इन उत्पत्तियों में, इंसानी ज़ज्बातों को झकझोर देने वाले इंसानी पहलुओं को पकड़ लेने की संवेदनशील दृष्टि ‘शक्ति प्रकाश’ के पास है | घटना या चरित्रों के अलावा सजीव भाषाई मौजूदगी के साथ, खूबसूरत रचनात्मक अंदाज़ में लेखकीय स्मृतियों की कोख से निकलती यह लघुकथाएं वर्तमान के लिए सम्पूर्ण सामाजिकता के सांस्कृतिक ताने-बाने का पुनर्पाठ हैं | – संपादक

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग दो” (शक्ति प्रकाश)

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग दो” (शक्ति प्रकाश)

शक्ति प्रकाश 142 2018-11-18

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृश्य दुनिया ज़हान में हर पल नज़र आते ही हैं | किन्तु सामाजिक रूप से गैर-जरूरी मानकर अनदेखी की जाने वाली इन उत्पत्तियों में, इंसानी ज़ज्बातों को झकझोर देने वाले इंसानी पहलुओं को पकड़ लेने की संवेदनशील दृष्टि ‘शक्ति प्रकाश’ के पास है | घटना या चरित्रों के अलावा सजीव भाषाई मौजूदगी के साथ, खूबसूरत रचनात्मक अंदाज़ में लेखकीय स्मृतियों की कोख से निकलती यह लघुकथाएं वर्तमान के लिए सम्पूर्ण सामाजिकता के सांस्कृतिक ताने-बाने का पुनर्पाठ हैं | – संपादक

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग एक” (शक्ति प्रकाश)

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग एक” (शक्ति प्रकाश)

शक्ति प्रकाश 136 2018-11-18

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृश्य दुनिया ज़हान में हर पल नज़र आते ही हैं | किन्तु सामाजिक रूप से गैर-जरूरी मानकर अनदेखी की जाने वाली इन उत्पत्तियों में, इंसानी ज़ज्बातों को झकझोर देने वाले इंसानी पहलुओं को पकड़ लेने की संवेदनशील दृष्टि ‘शक्ति प्रकाश’ के पास है | घटना या चरित्रों के अलावा सजीव भाषाई मौजूदगी के साथ, खूबसूरत रचनात्मक अंदाज़ में लेखकीय स्मृतियों की कोख से निकलती यह लघुकथाएं वर्तमान के लिए सम्पूर्ण सामाजिकता के सांस्कृतिक ताने-बाने का पुनर्पाठ हैं | – संपादक

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 369 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

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