समाज का विद्रूप चेहरा है ‘चांद के पार एक चाभी’ समीक्षा (कहानी संग्रह)
समाज का विद्रूप चेहरा है ‘चांद के पार एक चाभी’

कहानी संग्रह – चांद के पार एक चाभी
लेखक – अवधेश प्रीत
मूल्य – 199/- (पेपरबैक)
प्रकाशक– राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.
वरिष्ठ कथाकार अवधेश प्रीत का नया कथासंग्रह है- “चांद के पार एक चाभी”. अवधेश प्रीत उन गंभीर रचनाकारों में से एक हैं जो नृशंस, हस्क्षेप, हमजमीन, एवं कोहरे में कंदील, जैसी चर्चित कथासंग्रहों से लगातार सामाजिक समस्याओं पर प्रहार करते रहें हैं. जिनके यथार्थवादी रचनाओं में किस्सागोई एवं शिल्पगत विशेषताओं के कारण यह फर्क करना मुश्किल होने लगता है कि कहानी वास्तविक है या काल्पनिक. प्रस्तुत संग्रह की भी सभी आठ कहानियां उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए प्रगतिशील समाज में हो रहे सामाजिक, मानसिक, वैचारिक एवं आर्थिक बदलाव के बीच बौखलाहट, छटपटाहट, शोर एवं व्याप्त अराजकता को निरुपित करती हैं.
संग्रह की पहली कहानी “चांद के पार एक चाभी” की ही बात करें तो यह उस विकासशील समाज के ऊपर एक जोरदार तमाचा है जहाँ शिक्षा एवं तकनीक का विस्तार तो हो रहा है लेकिन जातिगत संरचना अभी भी परंपरागत रूप से अपनी गहरी जड़ें दूर अंधेरे में जमाए हुए है. जहां सामंतवादी विचारधारा के लोग अपनी सुविधा के अनुसार समाज के कायदे कानून इस प्रकार गढे जा रहें हैं कि उससे निकलना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर जान पड़ता है. जिसमें बेबस कानून व्यवस्था भी रक्षक की बजाय भक्षक की ही भूमिका में नज़र आती है.
“नयका पोखरा” को पहली ही कहानी का विस्तार माना जा सकता सकता है जिसमें सामंतवादी विचार के प्रतिकार के रूप में जिस पिंटू कुमार का अंकुरण हुआ था वह सुमन के रूप में परिणत होते दिखता है. सुमन “चांद के पार एक चाभी” की राजकुमारी की तरह समाज के ठेकेदारों के समक्ष आत्मसमर्पण एवं अपमान सहने के बाद आत्महत्या करने की बजाय अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को मुखिया जी के सामने भरी सभा में रखती है और न्याय के लिए संघर्षरत दिखती है. साथ ही साथ इस बदलाव के कारण समाज के ठेकेदारों की कम होते प्रभुत्व का खींझ और बौखलाहट चेहरे और व्यवहार में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगती है. जहां स्त्री पितृसत्तात्मक समाज को दलित कानून और राजनीति के सहारे एक साथ चुनौती देते हुए उनकी चूलें हिलाने की कोशिश करती हैं.
अवधेश प्रीत जितनी साफगोई से समाजवाद पर कलम चलाते हैं उतनी ही बेबाकी से मार्क्सवाद और पूंजीवाद के टकराव को भी निशाने पर लेते हैं. उनकी अगली कहानी “999” समाजवाद से इतर मार्क्सवादी विचारधारा की कहानी है, जो कि बहुदेशीय कंपनियों में टारगेट बनते पेशेवर युवाओं के संघर्ष की पृष्ठभूमि में लिखी गई है. जहां बदले माहौल में बदलते जीवन शैली, मूल्य, एवं रिश्तों में पनप रहे भ्रष्टाचार, आर्थिक एवं भावनात्मक शोषण के बीच दिवाकर अंकल जैसे यूनियन लीडर की जरूरत महसूस की जाती है.

सुशील कुमार भारद्वाज
जन्म – 1 मार्च १९८६ , गाँव देवधा , जिला – समस्तीपुर विभिन्न कहानियाँ तथा लेख पटना से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सम्प्रति – मुस्लिम हाईस्कूल , बिहटा , पटना में कार्यरत पटना
फोन – 08809719400
जबकि अगली कहानी “एक मामूली आदमी का इन्टरव्यू” को हित टकराव की कहानी के रूप में भी देखा जा सकता है. जहां एक तरफ पूर्ण जड़, विकास के अंधे दौर से दूर आम आदमी को शक्ति का एहसास होता है वहीं पत्रकारिता में हो रहे आमूलचूल व्यवहारिक परिवर्तन को भी रेखांकित किया गया है. जहां इनोवेशन के काम में भी विज्ञापनदाताओं के हितों को आमजन के समस्याओं पर तरजीह दी जाती है. पत्रकारिता अब मिशन नहीं मुनाफा का वह जरिया है जहां हित टकराव की स्थिति में पत्रकार के रोजीरोटी पर भी बन आती है.
पत्रकारिता जगत की ही क्रूर सच्चाइयों की पृष्ठभूमि में लिखी गई है संग्रह की अगली कहानी “सपने”. इस कहानी में उन युवाओं के बनते-बिखरते अरमानों और बेबशी की झलक मिलती है जो बड़े बड़े सपनों के साथ पत्रकारिता संस्थानों में नामांकन तो लेते हैं लेकिन वस्तु स्थिति एवं मूल्यों के टकराव के बाद जीविकोपार्जन के लिए जिंदगी के सारे सपनों से समझौता करने को तैयार हो जाते हैं.
इस संग्रह की सबसे जुदा कहानी है –“सदमा”. जिसमें लेखक ने बदलते माहौल में क्षय होते नैतिक मूल्यों को ही न सिर्फ निशाने पर लिया है बल्कि जीवन के विविध स्वरूपों में समाये भ्रष्टाचार को भी रेखांकित किया है. जिसने भरोसा और विश्वास जैसे शब्दों को ही बेकार साबित कर दिया है. अब यह विश्वास कि हम गलत नहीं हैं इसलिए हमारे साथ गलत नहीं होगा, टूट कर बिखरता जा रहा है. कहानी में न तो उपदेश है न आदर्श की स्थापना, लेकिन घातक यथार्थवाद के सहारे सुसुप्त होते मानवता को झकझोरने की भरपूर कोशिश की गई है.
अवधेश प्रीत अपने कलम का प्रयोग अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को निभाने में भी करते हैं. आज जब हमारे चारो ओर का माहौल भयाक्रांत होता जा रहा है. सांप्रदायिक सद्भाव खतरे में है, धार्मिक कट्टरता एवं आतंकवाद एक दूसरे का पर्याय बनते जा रहे हैं तो अलगाव एवं वैमनष्यता के सायकी को भेदने की कोशिश करती है उनकी कहानी “अम्मी”. ताकि समाज के असंख्य निर्दोषों को होने वाले जुल्मों से बचाया जा सके. जबकि संग्रह की सबसे अंतिम कहानी “रैकेटवा” चोट करती है उस भ्रष्ट शासन व्यवस्था पर जहां न्याय पाने की बजाय प्रतिभा दलालों के चंगुल में फंस कर बर्बाद हो जाती है.

अवधेश प्रीत
अवधेश प्रीत की शिल्प-कला उनके शब्दों एवं प्रयोगों में साफ़ साफ़ परिलक्षित होती है जो न सिर्फ पाठकों को गुदगुदाती और रूलाती है बल्कि अपने आगोश में समा कर एक लम्बी सैर भी कराती है, जो सोचने समझने को मजबूर करती है कि एक मनुष्य के रूप में उसका क्या कर्तव्य बनता है? क्या होना चाहिए था और क्या हो रहा है?
साहित्य हमारे जीवन और समाज का आईना होता है जिसमें जीवन की विभिन्न विविधताएं साफ़ साफ़ झलकती हैं. साहित्य सिर्फ प्रतिरोध का एक जरिया ही नहीं होता है बल्कि जीवन जीने की कला और प्रेरणा का स्रोत भी होता है. जीवन के पथ पर नित-नित हो रहे सकारात्मक एवं नकारात्मक परिवर्तनों के बीच नई उम्मीद की किरणों में खुद को पहचानने और अपने अस्तित्व की जंग को जीत लेने की जीवटता अंदर तक झकझोर देती है. ऐसा तभी हो पता है जब कोई लेखक गंभीरता के साथ समय में जरूरी हस्तक्षेप करता है. सच्चाई को बेबाकी के साथ साहित्यिक लहजे में बिना किसी कलुषित भावना के सलीके से प्रस्तुत करता है. और निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि अवधेश प्रीत इसमें सफल रहे हैं.