अरविंद जैन की तीन कहानियाँ जो शायद तीन होकर भी जैसे एक हैं । मानो ज़िंदगी के कई रंगों को जीती एक स्त्री को तलाशती अनुभव जन्य लेखकीय क़लम
1. झरना 
उसने हैरान-परेशान
सा होते हुए कहा "मैं झरना ('वाटर फॉल') देखने आई थी, मगर यहाँ तो
दूर-दूर तक पत्थर की विशाल चट्टानें हैं। अलग-अलग आकार और रंग की चट्टानों के
बीच गहरी खाईयों के तल में, छोटी-बड़ी झीलें नज़र
आ रही हैं"।
मैं उसे इतिहास
बताने-समझाने लगा "मैडम! बरसात के मौसम में आती तो निश्चित ही यहाँ 'झरना' दिखाई देता, मगर तब ये चट्टानें
पानी में डूबी होती और यहाँ नदी में पानी ही पानी दिखाई देता। जानती हैं मैम! इन
चट्टानों के गर्भ से कभी-कभी लावा निकलता है, जिसकी वजह से कुछ
चट्टानों का रंग स्याह काला या भूरा पड़ गया है"। वह बहुत देर तक
चट्टानों की फोटो-फ़िल्म बनाती रही और बीच-बीच में सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए, बड़बड़ाती रही
"अद्भुत....आश्चर्यजनक...झरना... बरसात में"।
अनुभव ने बताया कि
जीन्स टॉप में 'मेम साहब' की उम्र का सही-सही
अंदाज़ लगाना मुश्किल है, मगर फिर भी मुझसे दस-पंद्रह साल बड़ी, यानी 40-45 से कम तो नहीं ही
हैं। ना जाने ऐसा क्यों लग रहा है कि मृगया सी नायिका, जीवन में
भटकते-भटकाते इस चंदन वन तक आ गई हैं! थोड़ा गौर से देखा तो वो होंठों पर जीभ फेर
रही हैं और रुमाल से पसीना पौंछ रही हैं। अचानक याद आया कि उसने रजिस्टर में अपना
नाम कादम्बरी... लिखा था। ढलते सूरज ने सावधान किया कि अब यहाँ से चलना चाहिए, वरना होटल
पहुँचते-पहुँचते रात हो जाएगी।
रास्ते भर सदियों
पुराने किलों के खंडहर, हवा में शुगर मीलों से उठती-फैलती सड़ांध, ऊबड़-खाबड़ अनदेखे
पुलों के नीचे, सूखी नदी में पेड़-पत्थर और कचरा ही कचरा। होटल पहुँचे तो कार की
पिछली सीट पर, अतीत के मेले में खोई अबोध सी गुड़िया अँगुलियों से ही बाल सुलझा
रही है। बाहर हल्की सी ठंड घुली हवा, चक्कर काट रही है।
गाड़ी से उतरने और
सामान कमरे तक पहुँचने के बाद मैंने कहा " अब मैं चलूँ.... गुड नाईट!.. सुबह
हाज़िर होता हूँ"। गुड़िया बोली "संभव है सुबह होने से पहले
मैं......!"। मैं समझ ही नहीं पाया कि चुप रहूँ या कुछ कहूँ। बेहोश हो गिरने
से पहले ही, पास रखी कुर्सी पर बैठ गया। नहीं जानता सामने अँधेरा था या रोशनी
का सैलाब। होश आया तो आईने में सफेद नाइटी पहनें चाँदनी मुस्करा रही है और
कमरे में रजनीगंधा महक रही है। मेरी गोदी में तौलिया और कुर्ता-पायजामा रखते हुए, उसने वाशरूम की ओर
इशारा किया और कोने में रखे सोफे पर जा बैठी।
मैं भीतर ही भीतर, अनहोनी आशंकाओं से
घिरता जा रहा हूँ। विवेक ने इतिहास का नया अध्याय पढ़ने की सलाह दी, तो मन थोड़ा शांत हो
पाया। नहा-धो कर लौटा तो देखा मेज पर करीने से खूबसूरत 'डिंपल' (बोतल) के साथ शीशे
के दो कटोरे, सोडा, बर्फ, छुरी-काँटे और सुनहरी तश्तरी में
भुनी हुई मछलियाँ सजी है। नैपथ्य में शहनाई बज रही है और बाहर आकाश में रह-रह कर
बिजली कड़क रही है या बाराती पटाखे चला रहे हैं।
'चियर्स..चियर्स' करने के बाद, दोनों ने प्याले
होंठो तक बढ़ाये और लंबी सी घूँट भर एक-दूसरे की तरफ निहारते हुए कहा 'धन्यवाद'। खिड़की से चाँद
झाँकता रहा, कमरे में चाँदनी टहलती रही और अमृत सी घूँट भरते-भरते मछलियाँ गायब हो
गई।आँख खुली तो ऐसा महसूस हुआ जैसे बिस्तर पर गुलाब की पंखुरियों की चादर बिछी हैं, कमरे में उषा नृत्य
कर रही है और सुबह के मेहंदी रचे हाथों में, हीरे की चूड़ियाँ और
माथे पर सिंदूरी सूरज चमक रहे हैं।
मुँह-हाथ धोकर बाहर
आया तो पता लगा कादम्बरी इधर-उधर फैला सामान समेट, 'सुटकेस' में डाल रही है।
नाश्ते में दोनों ने मौसमी का ताज़ा जूस पिया और सेब की एक -दो फांख खाई, होटल के बिल का
भुगतान किया और बाहर निकले। कार हवाई अड्डे की तरफ भागी जा रही है और मैं सड़क
किनारे पेड़ के पत्तों सा झूल रहा हूँ।
हवाई अड्डे पर विदा
होते समय कादम्बरी ने हाथ मिलाया, गले लगाया और यह
कहते-कहते ओझल हो गई "श्रावण ऋतु में फिर आऊँगी....यहीं मिलोगे ना
वरुण!"
बिछुड़ते समय उसके
चट्टान से चहरे और गहरी नीली झील सी आँखों में, लावा उफन रहा था।
२. घेराबंदी
सुश्री कामना उसके
(पाठक क्षमा करें! नायक का नाम-अनाम 'गोपनीय' रखना कानूनी
अनिवार्यता है) पड़ोस में रहती थी और उम्र में उससे चार-पाँच साल छोटी थी। जब वह
पाँचवीं कक्षा में था, तो कामना ने स्कूल जाना शुरू किया था।स्कूल जाते-आते समय वह कामना
को जब भी खट्टी-मीठी गोली, टॉफी, लॉलीपॉप या चॉकलेट
देने लगता, तो वह 'नहीं, मुझे पसंद नहीं' कह कर लेने से मना
कर देती। इस तरह मना करना, उसे कभी अच्छा नहीं
लगता था।
कामना जब सातवीं
क्लास तक पहुँची, तो वह बारहवीं के बाद कॉलेज जाने लायक हो गया। कामना 'ब्वाय कट' बालों के बावजूद, 'लड़की' सी दिखने-लगने लगी
थी। एक बार उसने कामना को जन्मदिन पर देने के लिए, 'पारकर गोल्ड' खरीदा मगर कामना ने
'धन्यवाद सहित' लौटा दिया।
जब युवा नायक
इंजीनियर बन गया तो 'बार्बी डॉल' सी कामना ने कॉलेज
में दाखिला लिया था। इंजीनियर बाबू कमाने लगे, तो एक हीरे की
अँगूठी खरीदी और जेब में रख कर घूमने लगे। कई बार कामना के साथ एकांत में बैठ, चाय-कॉफ़ी पीने की कोशिश
की, मगर हर बार वह 'आज नहीं' कह कर भाग जाती।
चार-पाँच साल बाद
इंजीनियर बाबू को किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने अमेरिका आने की पेशकश की, तो उसे 'सपनों का स्वर्ग' दिखाई देने लगा।
उसने सोचा कि जाने से पहले हीरे की अंगूठी, नायिका की अँगुली
में पहना दे तो अच्छा। तमाम कोशिशों के बावजूद सुंदरी ने 'धर्मपत्नी' बनने से, 'अभी नहीं' कह कर टाल दिया।
इसके बाद वह हर साल आता और बैरंग लौट जाता।
उन दिनों उसके
सपनों में देसी-विदेशी फिल्मी हीरोइनों के नाप-तोल, दिमाग में रंगीन-चिकने पन्नों
पर छपे न्यूड'स का बवंडर और फ्लैट में मादक संगीत बजबजाता रहता। सन्नाटे से समय में
वह कभी 'ब्लू चिप शेयर' या 'मर्सेडीज' खरीदता, कभी 'रोलेक्स' या 'ओमेगा' और कभी लिमिटेड
एडिशन के 'मोंट ब्लां'। 'जॉय' की महक उसकी नाक
में रच-बस गई थी, 'रॉयल सैलूट' का स्वाद जीभ पर और
हर साँस में कामना थी। छुट्टियों में वह समुद्र किनारे कामना की तलाश में भटकता
रहता और उसके (अव)चेतन में सब बिकनी वाली स्त्रियाँ, कामना का रूप धारण
कर उसे चूमने लगती।होश आता तो पता लगता कि हवा में मरी हुई मछलियों की गंध बढ़ती जा
रही है और सूरज कब का डूब चुका है।
कामना ने कॉलेज की
पढ़ाई (एम. ए. अर्थशास्त्र) के बाद हार्वर्ड से एम.बी.ए और पीएच.डी किया और
नामी-गिरामी पूँजी-पुत्रों को सलाह देते-देते, अपनी बीमा और म्यूचअल
फण्ड कंपनी की मालकिन बन गई। उसने अलग-अलग नस्ल के, कई कुत्ते पाल रखे
थे। उसके 'ब्रेन' में हर 'ब्रांड' का बाज़ार, रात को खुलता और
सुबह बंद हो जाता। मिलियन-बिलियन डॉलर-पाउंड-यूरो-येन उसके इशारों पर, सीढियाँ चढ़ने-उतरने
लगे। कामना को सूँघते ही पता चल जाता कि कौन सा (महंगा या सस्ता) 'परफ्यूम' छिड़क कर, 'मिस वर्ल्ड' को आकर्षित किया जा
रहा है।
खैर....समय अपनी
रफ्तार से भागता रहा और नायक-नायिका अपनी रफ्तार से। दुनिया घूमते-घूमाते दोनों 'ओरली एयरपोर्ट' पर मिले। इस बार
नायक ने हीरे की अँगूठी के साथ-साथ, अपनी नई कंपनी में
साँझीदार बनने का प्रस्ताव, यह सोचते हुए आगे
बढ़ा दिया कि 'भाग कर जाएगी कहाँ'! कामना सुनती रही,सोचती रही 'मैं इसे कभी समझ
नहीं आऊंगी' और सिगरेट ऐशट्रे में बुझाती हुई बोली "धन्यवाद...पर अब तो
आपकी कंपनी के 55% शेयर मेरे नाम हो गए हैं। देखो.... अभी कुछ देर पहले ही मेल
आया"। कॉफ़ी का कप उसके हाथ से छूट कर फर्श पर जा गिरा और वह कामना सुनो..सुनो
ना! का म ना....कहता-बड़बड़ाता रहा।
देखते-देखते सुश्री
कामना ने अपना 'लैपटॉप' उठाया और आकाश में उड़ गई। सामने लगे 'स्क्रीन' पर,धुंधली सी परछाइयाँ
बन-बिगड़ रही थी।
३. हाईब्रीड
फिलहाल मैं अस्पताल
के 'आई सी यू' के बाहर बेंच पर
बैठे हुए, सुनसान दिमाग में बयां सा घोंसला बुन रहा हूँ। चारों ओर डॉक्टर, नर्स, एक्सरे, खून है और फिनायल या दवाइयों
की तीखी गंध।
संरचना को कार
दुर्घटना में गंभीर चोट आई है और अभी तक बेहोश है। ऐसा लग रहा है, जैसे किसी ने मेरे
चेहरे पर तेज़ाब छिड़क दिया हो। ध्यान आया कि दो-तीन महीनें पहले ही संरचना और उसकी
माँ के साथ उनकी वसीयत बनवाने गया था। माँ ने बताया था "यह मेरी इकलौती वारिस
है। मेरे मरने के बाद सब इसका। घर, कंपनी, खेत, जमीन, जेवर, सोना-चांदी, हीरे, बैंक, नगद, शेयर सब कुछ..ये
रही लिस्ट।" कानूनी सलाहकार ने दबी जुबान में कहा "अगर आपसे पहले
बेटी....?" माँ थोड़ा घूरते हुए बोली "ऐसा ना कहें सर!...सोचें भी ना
सर!"
कल उनके पारिवारिक
सलाहकार को फोन किया था "सर! मैं संरचना के घर से शाश्वत बोल रहा हूँ। कुछ महीनें
पहले आपसे वसीयत लिखवानें आई थी।" उन्होंने पूछा "हाँ!
क्या हुआ? क्या संरचना की माँ...!" मैंने आशंका दूर करते हुए कहा
"नहीं सर ! माँ ठीक हैं, पर शहर से बाहर
हैं। कल रात पार्टी से लौटते हुए, संरचना को कार
दुर्घटना में गंभीर चोट आई है और वो संजीवनी अस्पताल में है। आप समय निकाल कर एक
बार आ जाएं तो...!" वो बोले "ओह! मैं थोड़ी देर में बात करता हूँ।"
देखते-देखते शाम हो गई।
वो आये डॉक्टर से
मिले और चले गए। पूछने पर मैंने भी बता दिया " सर! संरचना मेरे साथ शुरू से
एक ही स्कूल में पढ़ती रही है। वो मेरी सहपाठी, दोस्त, सहेली ही नहीं, जीवन साथी भी बनने
वाली है। अक्सर हम दोनों साथ ही रहते हैं। कल वो अकेली ही गई थी और लौटते समय किसी
साईकल वाले को बचाने के चक्कर में एक्सीडेंट कर बैठी। सर! आपके घर के पास ही जो नई
कोठी बन रही है ना, वो मैं संरचना और अपने के लिए ही बनवा रहा हूँ।" सुनते ही
कहने लगे "अरे! वो तो अभी आधी भी नहीं बनी।"
उनके जाने के बाद
नर्स ने आकर कहा "बधाई! आपकी वो 'आस' से है और शायद इसी
वजह से कार चलाते हुए 'चक्कर-वक्कर' आ गया हो...!"
मेरे लिए संरचना का 'आस' से होना अप्रत्याशित नहीं, लेकिन पिता बनने की
उम्मीद ने थोड़ा उलझा जरूर दिया है। 'एबॉर्शन'!...हाँ... पर वह नहीं
मानी तो?। विवाह करने का दबाव बढ़ेगा और कोठी अभी आधी भी नहीं बनी। शादी से
मना करने का मतलब है जेल और जमानत तक होगी नहीं। पिता जी विधर्मी बहू को घर में
घुसने तक नहीं देंगे और ज़हर खा लेने की धमकियाँ देंगे सो अलग।
सोचते-सोचते सपनों
का शिल्प और देह की परिभाषा ही बदलने लगी। दुनिया भर की अनब्याही माँओं और उनके
बच्चों का ऐतिहासिक अतीत, घूम-फिर कर सामने
आने-सताने लगा। अचानक 'रश्मिरथ' की पंक्तियाँ मन में गूँजने लगी- "बेटे का मस्तक सूँघ, बड़े ही दुख से, कुन्ती लौटी कुछ
कहे बिना ही मुख से।" अवचेतन में दुबकी किताबों, कहानियों और फ़िल्म
के नायक-नायिका के नाम, रंग, रूप और परछाइयाँ, तेज़ी से
उमड़ने-घुमड़ने लगी। देसी-विदेशी (वैध-अवैध) बच्चों के बीच छिड़ी अकादमिक बहस शालीनता
छोड़, गाली-गलौज से होती हुई हिंसक मारपीट तक पहुँचने लगी। कचरे के ढेर
में कभी नवजात बच्चों (ज्यादातर बच्चियों) के रोने की आवाज़ और कभी लाश बिना 'कफ़न' हैं या अखबार की
कतरनें!
मैं अपने आपको
समझाने लगा कि संरचना के तो जन्म प्रमाण पत्र से लेकर पासपोर्ट तक में, सिर्फ माँ का ही
नाम लिखा-लिखवाया गया है। माँ-बेटी जानती थी पिता का नाम और अता-पता, लेकिन उन्होंने उसे
ढूँढने की कभी कोई जरूरत नहीं समझी। कभी कोशिश भी नहीं की। ना गुजारा-भत्ता पाने
के लिए और ना विमान दुर्घटना के बाद मुआवज़ा के लिए। खैर...अब वो खूँखार समय नहीं, जब 'अनब्याही माँ' होना कोई 'अभिशाप' हो। सदियों से
सफलता, अपनी-अपनी संघर्ष-गाथा भी लिखती रही है। वैसे हम तो अस्पताल से
छूट्टी मिलते ही शादी कर लेंगे..'कोर्ट मैरिज' करना पड़ेगा।
कई अँधियारी रातों
के बाद, सुबह सूरज निकला तो डॉक्टर ने बताया "संरचना बिल्कुल ठीक है, तुम चाहो तो घर ले
जा सकते हो। दवा देते रहना, जल्द ही घाव भर
जाएंगे।" कागजी कार्यवाही के बाद, संरचना घर लौट आई।
मैंने शादी के बारे में कहा तो बोली "ऐसी क्या जल्दी है?" मैंने नर्स द्वारा
बताई 'आस' का हवाला दिया, तो बर्फ़ से ठंडे
स्वर में कहने लगी "मेरे प्यारे दोस्त शाश्वत! आपको बेचैन होने की कतई जरूरत
नहीं। विवाह मैं कभी करूंगी नहीं और बुरा मत मानना यह 'आस'आपका नहीं, मेरा चुनाव है।
विश्वास करना कि अजन्मे शिशु के पिता आप नहीं बन सके। अब आप मुझे जो भी भला-बुरा
कहना चाहें, कह सकते हैं।" मैंने सिर्फ इतना कहा "संरचना के हर फैसले
का, शाश्वत सम्मान करता है" फिर अधूरा बुना घोसला कूड़ेदान में
डाला और दवाइयाँ ढूढ़नें लगा।