अमृता के सभी लेख

बदनाम गलियों में सिसकती कहानियां: आलेख (अमृता ठाकुर) http://humrang.com/

रात के स्याह अँधेरे में कुचली हुई नागिन सी बिछी सड़कें जितनी काली दिखतीं हैं, दिन के उजाले में भी ये उस कालिख को नहीं छोड़ पातीं, मानो ये शर्मशार हों मानवीय दुनिया के उन कृत्यों और व्यवस्थाओं से जिनकी ये सड़कें न केवल साक्षी हैं बल्कि अनेक रूढ़ीवादी मान्यताओं में जकड़ी सामाजिकता से अभिशप्त ज़िंदा कहानियाँ, इनके भीतर आज भी सिसक रही हैं | दिल्ली में ‘श्रद्धानन्द या महात्मा गांधी रोड़’ नाम से जानी जाने वाली सड़क जिसे आमतौर पर लोग जी० बी० रोड़ के नाम से जानते हैं, भी इन्हीं सड़कों में से एक है | जहाँ एक तरफ सड़क के किनारे आकाश छूती इमारतों में गौरवशाली सभ्यता की खिलखिलाहटें हैं तो नीचे ठेले, रिक्शों पर भी आधुनिकता की रफ़्तार के शोर की परत है, विकास के नारे हैं, वादे हैं वहीँ दूसरी तरफ की पहली मंजिल तक इन नारों या वादों की आवाज़ भी जाने से कतराती है | वहाँ जिश्म की नुमाइश है, खिडकियों के झरोखों से झांकते कुछ मायूस और वेवस चेहरे हैं जिनसे खेलना तो मानसिक समझ है किन्तु स्वीकारोक्ति में बदनुमा दाग | वहाँ हर जिश्म की कीमत उम्र से है, पाने को भले ही शारीरिक सुकून है किन्तु देने को वही हिक़ारत, नफ़रत और घृणा | इन अँधेरी गलियों में कुछ ज़िंदा कहानियों से मुलाक़ात की “अमृता ठाकुर” ने …..| – संपादक

स्‍त्री मन के सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलतीं कहानियां : अमृता ठाकुर http://humrang.com/

पंखुरी की कहानियां स्त्री विमर्श का हिस्सा हैं, इस बयान को हालांकि खारिज नहीं किया जा सकता, क्यों कि वे स्‍त्री मन के अत्यंत सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलती चली जाती हैं। उनके मनोभावों में कहीं कोई जटिलता नहीं है, बहुत साधारण है, लेकिन लेखन की खासियत यह है कि उसे बहुत ही कोमलता से स्पर्श किया गया है। ‘कोई एक अभयारण्य’ की सरोज अपनी पहचान, अपने अस्तित्व को तलाशती हुई पति के हुकूमत की लक्ष्मण रेखा से पैर बाहर निकाल लेती है …|’ पंखुरी सिन्हा के कथा संग्रह ‘कोई भी दिन‘ पर ‘अमृता ठाकुर’ का पुर्नसमीक्षित आलेख …..| – संपादक

स्‍त्री मन के सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलतीं कहानियां: ‘कोई भी दिन’ ‘पंखुरी सिंहा’ :- http://humrang.com/

पंखुरी की कहानियां स्त्री विमर्श का हिस्सा हैं, इस बयान को हालांकि खारिज नहीं किया जा सकता, क्यों कि वे स्‍त्री मन के अत्यंत सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलती चली जाती हैं। उनके मनोभावों में कहीं कोई जटिलता नहीं है, बहुत साधारण है, लेकिन लेखन की खासियत यह है कि उसे बहुत ही कोमलता से स्पर्श किया गया है। ‘कोई एक अभयारण्य’ की सरोज अपनी पहचान, अपने अस्तित्व को तलाशती हुई पति के हुकूमत की लक्ष्मण रेखा से पैर बाहर निकाल लेती है …|’ पंखुरी सिन्हा के कथा संग्रह ‘कोई भी दिन‘ पर ‘अमृता ठाकुर’ का पुर्नसमीक्षित आलेख …..| – संपादक

मुट्ठी भर धूप : कविताएं (अमृता ठाकुर) http://humrang.com/

धूसर समय की विद्रूपताओं को देखती, समझती और मूर्त रूप में मानवीय कोमलता के साथ संघर्षशील स्त्री के समूचे वजूद का एहसास कराती दो कवितायें …..| सम्पादक

बुझव्वल: कहानी (अमृता ठाकुर) http://humrang.com/

सामाजिक ताने-बाने और उसके बितान में उलझी स्त्री, अबूझ मान्यताओं और परम्पराओं के नाम पर मानवीय शोषण के कितने ही आयामों से गुजरती है, उस गाँठ को खोलना, सुलझाना और एक सिरा पकड़कर सही और मुकम्मल दिशा दे पाना भले ही आसान न हो किन्तु स्त्री बखूबी जानती है कि मुक्त और सहज जीवन का स्पेस पाने के लिए समाज के बनाए वही अस्त्र सबसे ज्यादा कारगर हैं, जिन्हें व्यवस्थाओं ने स्त्री शोषण के निमित्त संभाल रखा है | आधुनिकता को धता बताकर अमूर्त से जूझती नई रोशनी तलाशती ‘अमृता ठाकुर’ की कहानी ……|– संपादक

लौट आओ वसीम !: कहानी (अमृता ठाकुर) http://humrang.com/

प्रेम, स्पंदन के साथ बाल मनो-भावों का शिद्दत से विश्लेष्ण करती ‘अमृता ठाकुर’ की बेहद संवेदनशील कहानी ….| – संपादकीय

अपने-अपने सच: कहानी (अमृता ठाकुर) http://humrang.com/

भावनात्मक संवेदनाओं से खेलना, गिरबी रखना या किसी भी कीमत पर खरीदना किसी वस्तु या खिलौने की तरह और तब तक खेलना जब तक खुद का जी चाहे फिर चाहे किसी लेस्बियन स्त्री की दमित इच्छाएं हों या किसी कामुक पुरुष की वासना कोई फर्क नहीं पड़ता | शोषित या कमजोर को हमेशा ही आर्थिक बराबरी का भरोसा ही मिला है आर्थिक बराबरी नहीं इसी वर्गीय चरित्र का खुला बयान है ‘अमृता ठाकुर’ की कहानी ….| – संपादक

हाल ही में प्रकाशित

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 44 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 58 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

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