हनीफ मदार

हनीफ मदार बायोग्राफी !

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नाम : हनीफ मदार
जन्म : 1 मार्च 1972, मथुरा, उत्तर प्रदेश |
कार्य स्थली : मथुरा, उत्तर प्रदेश |
लेखन : कहानी- 6 कहानियां ‘हंस’ 4 ‘वर्तमान साहित्य’ 6 ‘परिकथा’ 2 ‘उद्भावना’ 2 ‘वागर्थ, के अलावा ‘समरलोक, अभिव्यक्ति, सुखनवर, लोकगंगा, युगतेवर, वाड.म्य, लोक संवाद और दैनिक जागरण में एक-एक कहानी प्रकाशित।
मंचन : 'पदचाप' 'चरित्रहीन' 'ईदा' 'उदघाटन' मेरी कहानियों का नाट्य मंचन | (कोवलेन्ट ग्रुप व् संकेत रंग टोली द्वारा )
कहानी संग्रह : ‘बंद कमरे की रोशनी’ । (प्रकाशित) 'मैं भी आती हूँ' (प्रकाशाधीन)
लेख संग्रह : विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक मुद्दों पर 25 लेखों का संग्रह (प्रकाशाधीन, सभी लेख हमरंग पर प्रकाशित)
हनीफ मदार के बारे में :- http://humrang.com/Hanif-Madar
समीक्षा : सर्वश्री मनोहर श्याम जोशी, 'बुनियाद' 'कुरु-कुरु स्वाहा', कथाकार संजीव, 'रह गईं दिशाएं इस और', नासिरा शर्मा, 'कुइंयांजान' 'खुदा की बापसी' 'जीरो रोड़', मीराकान्त, 'हुमा को उड़ जाने दो', शुषम वेदी, 'ज़लाक' डा0 नमिता सिंह, 'मिशन जंगल और गिनी पिग' 'लेडी क्लब' 'राजा का चौक' आदि अनेक लेखकों की महत्वपूर्ण कृतियों की दर्जनों समीक्षाओं के अलावा नाट्य समीक्षाऐं उक्त सभी पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित।
साक्षात्कार : नमिता सिंह (संपादक- वर्तमान साहित्य) डा0 के0 पी0 सिंह (आलोचक, मार्क्सवादी लेखक) जितेन्द्र रघुवंशी (राष्ट्रीय सचिव 'इप्टा') संदीपन नागर (रंगकर्मी, फिल्मकार) जितेन साहू (चित्रकार) के अलावा देश भर के अन्य अनेक (जो अब याद नहीं आ पा रहे) साहित्यकारों, कलाकारों, रंगकर्मियों के साथ विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मुद्दों पर विस्तृत बात-चीत साक्षात्कार के रुप में अमर उजाला, दैनिक जागरण, परिकथा, वर्तमान साहित्य, सहारा समय, नटरंग के अलावा अन्य विषेशांकों में प्रकाशित।
पत्रिकारिता : सहारा समय साप्ताहिक के लिए दो वर्ष सांस्कृतिक आलेख लेखन |
नाटक एवं नाट्य रुपान्तरण : प्रेमचन्द, (कफ़न, ईदगाह, पंच परमेश्वर) मंटो, (टोबा टेकसिंह) ज्ञानप्रकाश विवेक, (शिकारगाह) ओ हेनरी, (गिफ्ट ऑफ़ मेज़ाई) आदि की कई कहानियों का नाट्य रुपान्तरण ‘संकेत रंग टोली द्वारा मंचित।
सिनेमा : ‘जन सिनेमा द्वारा निर्मित एवं ‘ज्ञानप्रकाश विवेक’ की कहानी ‘कैद’ पर आधारित हिन्दी फिल्म के लिए पटकथा एवं संवाद लेखन।
‘न्यूज क्लिक’ : ‘न्यूज क्लिक’ इंटरनैट चैनल के लिए हिन्दी आलेख तथा ‘जनमन ई-पत्रिका’ के लिए निरंतर लेखन।
अन्य : व्यंग्य, यदाकदा कविताऐं ‘डी0 एल0 ए0, दैनिक जागरण, और वर्तमान साहित्य में प्रकाशित।
सम्मान : ‘सविता भार्गव स्मृति सम्मान’ 2013 । विशम्भर नाथ चतुर्वेदी ‘शास्त्री’ साहित्य सम्मान २०१५
जुड़ाव : सदस्य जनवादी लेखक सघं, उत्तर प्रदेश, उपसचिव- जनवादी लेखक, संघ, मथुरा, सचिव- संकेत रंग टोली, मथुरा।
संप्रति : स्वतन्त्र लेखन और पत्रकारिता।
संपादन : www.humrang.com वेब पत्रिका, एवं ‘हमरंग’ प्रिंट पत्रिका)
सम्पर्क : 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा बल्देव रोड़, यमुनापार, मथुरा, उ0 प्र0
फ़ोन : 08439244335, 07417177177
email : hanifmadar@gmail.com

हाल ही में प्रकाशित

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता 12 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

विजय शर्मा 26 2018-12-04

‘सृजन संवाद’ की नवंबर मास की गोष्ठी में रांची से आये 'दक्खिन टोला' जैसी चर्चित कहानी संग्रह के कथाकार कमलेश ने अपनी कहानी 'पत्थलगड़ी' का पाठ किया। कमलेश को सुनने स्थानीय लेखक, साहित्यकार व साहित्यप्रेमी एकत्र हुए। 'पत्थलगड़ी' जल, जंगल और जमीन बचाने की कहानी है। यह आदिवासियों के अंदर के उनके प्रकृति प्रेम और उसके प्रति समर्पण को दर्शाती कहानी है। इस कहानी में इस बात का जिक्र है कि किस प्रकार एक आदिवासी परिवार की तीन पीढ़ी जंगल और पहाड़ को बचाने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देती है। आज भी यह आम धारणा बनी हुई है कि जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले को पुलिस और सरकार माओवादी मानती है। पिछले दिनों खूंटी में हुए पत्थलगड़ी प्रकरण को संदर्भ कर लिखी गयी यह अदभुत कहानी है।

नोट-

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संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
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