अनीश कुमार के सभी लेख

वो हत्या जिसने सोवियत संघ को हिला दिया : समीक्षा (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

सर्गेई मिसनोविज किरोव का हत्यारा निकोलायेव एक अकेला इंसान था। किरोव की हत्या के पीछे साजिश न थी, कोई गुप्त आतंकवादी नेटवर्क सक्रिय नहीं था, जैसा कि तीस के दशक समझा जा रहा था। तीनों इस राय से एकमत हैं कि स्टालिन ने किरोव की हत्या का इस्तेमाल अपने राजनैतिक विरोधियों को समाप्त करने के लिए किया था। किरोव की हत्या के बहाने स्टालिन ने बोल्शेविक नेताओं जिनोवियेव, कामानेव, बुखारिन और जेनरल तुखाचेव्स्की को झूठे मुकदमें में फॅंसाया, उनपर दबाव डालकर , यातना देकर, जबरन अपना गुनाह कबूल करने पर मजबूर किया। अंततः उन सबों को सजा-ए-मौत दी गयी।……

दुनिया बदल गई: कविता (अनीश कुमार) http://humrang.com/

क्रूर भूख के अट्टाहास के बीच रोटी के लिए मानवीय संघर्षों के रास्ते इंसानी बेवशी को बयाँ करतीं ‘अनीश कुमार’ की दो कवितायेँ …….

समकालीन साहित्य में मुस्लिम महिला साहित्यकार: आलेख (अनीश कुमार) http://humrang.com/

स्त्री को अपनी परंपरा, अपना संघर्ष और अपनी भागीदारी का इतिहास खुद लिखना होगा । स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गों, वर्णों और जातियों के बीच नए-नए समीकरणों के साथ उसे अपने लिए लड़ना होगा । पूंजीवादी पितृसत्ता ऊपर से चाहे जितनी उदार और सरल लगे, पर भीतर-भीतर जटिल है। दोष उसकी संरचना में ही है । अगर ऐसा नहीं होता तो आजादी के आंदोलन से लेकर अभी तक के मुस्लिम स्त्री संघर्ष को इतिहास में कहीं तो जगह मिली होती । “जब हमें मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे को उठाने हों तो पहले इनकी स्थिति को जानना जरूरी हो जाता है । यूं भी यदि किसी समाज या धर्म के बारे में जानना है तो सबसे पहले वहाँ की स्त्रियों को देखना चाहिए ।”[1] इधर समाज का एक हिस्सा अपने आपको को उत्तरआधुनिक होने का दंभ भरता है वहीं एक ऐसा तबका है जो अभी तक ठीक से आधुनिक भी नहीं हो पाया है । जिसे हाशिये पर धकेल दिया गया है । हालांकि इतिहास में जाकर देखें तो महिलाएं हमेशा से हाशिये पर रही हैं । धार्मिक शोषण उनका बहुत पहले से होता रहा है, और आज भी जारी है । मसलन, मुस्लिम समाज में तलाक का जो वीभत्स रूप 100 वर्ष पहले था आज भी वैसा ही दिखाई देता है । क्या ये किसी आश्चर्य से कम है कि तीन बार तलाक बोल दो और हो गया तलाक । सामाजिक राजनैतिक रूप से अक्सर ही पेश आते मुस्लिम महिलाओं के हक और अधिकार के मुद्दों पर साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे – ‘मंजू आर्या’ की किताब के संदर्भ में समीक्षात्मक चर्चा कर रहे हैं ‘शोध छात्र ‘अनीश कुमार’ …..

नवें दसकोत्तर हिंदी उपन्यास और भूमंडलीकरण: आलेख (अनीश कुमार) http://humrang.com/

सांस्कृतिक तर्क के सहारे पूंजीवाद के साम्राज्यवाद का उत्कर्ष ही भूमंडलीकरण है। भारत में भूमंडलीकरण की शुरुआत नब्बे (1990) के दशक से होती है। इस भूमंडलीकरण के दौर में सबसे ज्यादा कोई परास्त और निराश हुआ हो तो वे हैं आदिवासी, दलित और स्त्री। नब्बे के दसक के बाद इन सभी विमर्शों के केंद्र में रखकर साहित्य लिखे जा रहे हैं। दमित अस्मिताएं और उनकी लोकतान्त्रिक मांगों, उपभोक्तावादी अपसंस्कृति, मध्यवर्गीय जीवन की विद्रूपता जनजीवन की तबाही उत्पीड़न आदि को रेखांकित किया जा सकता है। यूं भी जब भारत मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक नेतृत्व व भूमंडलीकरण के समक्ष समर्पण की नीति पर चल रहा हो उस समय प्रतिरोधी संस्कृति और साहित्य से ही आशा की जा सकती है। हिंदी में भूमंडलीकरण के प्रभाव में अनेक उपन्यास लिखे जा रहे हैं तो दूसरी तरफ उसके सम्पूर्ण प्रतिरोध और विकल्प के रूप में बहुत से उपन्यास प्रतिरोध का सही नजरिया अपनाकर भूमंडलीकरण के विरुद्ध जन प्रतिरोध की सही अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर साहित्य के जनतंत्र की रचना कर रहा है। भूमंडलीकरण की मानवीय विभीषिका को साहित्यिक जड़ों में खोजने का प्रयास करता शोधार्थी ‘अनीश कुमार’ का आलेख ……

समय के साथ संवाद करतीं ‘भीष्म साहनी’ की कहानी: आलेख (अनीश कुमार) http://humrang.com/

मानवीय संवेदनाओं और मानव मूल्यों के निरतंर क्षरण होते समय में सामाजिक दृष्टि से मानवीय धरातल से जुड़े साहित्यकारों का स्मरण हो आना सहज और स्वाभाविक ही है | वस्तुतः इनकी कहानियों और उपन्यासों से गुज़रते हुए वर्तमान अपने स्वरुप और घटनाओं के साथ जीवंत होना, लेखकीय समझ और सामाजिक साहित्यिक दृष्टि से उनकी लेखनी की ताज़ा संदर्भों में प्रासंगिकता स्पष्ट करता है | ‘भीष्म साहनी’ उन्हीं साहित्यकारों में से हैं जिनकी कहानी को लेकर साफ़ समझ थी कि “परिवेश बदल भी जाए तो भी कहानी पुरानी नहीं पड़ती। कहानी पुरानी तब भी नहीं पड़ती जब जीवन मूल्य बादल जाएँ, जीवन को देखने का नजरिया बादल जाए, क्योंकि तब भी वह किसी विशिष्ट कालखंड के जीवन यापन का चित्र अपने में सुरक्षित रखे होती है। समकालीन न रहते हुए भी किन्हीं पुराने रिश्तों कि कहानी कहती रहती है, कहानी पुरानी तब पड़ती है जब कहानी के भीतर पाया जाने वाला संवेदन अपना प्रभाव खो बैठे, असंगत पड़ जाए, जब कहानी कहने का ढंग भी रोचक न रहे, जब पाठक वर्ग कि साहित्यिक रूचियां तथा अपेक्षाएँ बादल जाएँ।” (आलेख से) हालांकि भीष्म जी का रचना संसार खूब चर्चित भी हुआ और उसकी सामाजिक व्याख्याएं भी कम नहीं हुईं बावजूद इसके उनके विपुल साहित्य में अनेक ऐसी कहानियां भी रहीं हैं जिन पर अपेक्षित रूप से कम ही लिखा जा सका है ‘फैसला’ और ‘लीला नंदलाल की’ आपकी ऐसी ही कहानियाँ हैं | इन्हीं दोनों कहानियों के संदर्भ में वर्तमान समय में उनकी सामाजिक और मानवीय प्रासंगिकता को व्याख्यायित करता हिंदी शोधार्थी ‘अनीश कुमार’ का आलेख | – संपादक

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 296 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 206 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 314 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 274 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

नोट-

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