“शास्त्र से संवाद” : समीक्षा (अभिषेक कुमार उपाध्याय)

कथा-कहानी समीक्षा

अभिषेक कुमार 56 2018-11-15

प्रस्तुत पुस्तक ‘नामवर के नोट्स’ संपूर्ण व्याख्यान नहीं बल्कि सिर्फ नोट्स हैं जो कि स्मृति के ज्ञानात्मक आधार का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कुल दस अध्यायों में संकलित व्याख्यान ‘संस्कृत काव्यशास्त्र के स्वरुप निर्धारण’ से लेकर ‘सृजनशीलता में स्वतंत्रता की स्थापना’ यानी भरतमुनि से अभिनव गुप्त तक का सफ़र है। ……


“शास्त्र से संवाद”

 

पहले ही स्पष्ट कर देना उचित है कि इस पुस्तक का महत्त्व आलोचना के रूप में नहीं बल्कि नामवर सिंह के अध्यापकीय स्वरुप में ज्यादा है। आलोचक के रूप में नामवर जी को किनारे रखकर शिक्षक के किरदार में उनकी आवाज़ को ‘नामवर के नोट्स’ में सुना जा सकता है, जिसके लिए नामवर जी की ख्याति हमेशा से रही है। गुरु के रूप में नामवर जी के आख़िरी साल में दिए गए कक्षा व्याख्यानों की प्रस्तुति है ‘नामवर के नोट्स’। इसमें प्रस्तुत व्याख्यान आज के विमर्शवादी दौर में शास्त्र-निर्माण की भारतीय परंपरा के चिह्न की तरह है, जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता। चूँकि इसमें संकलित व्याख्यान संस्कृत काव्यशास्त्र की समूची परंपरा पर आधारित है, जो कि भारतीय काव्यशास्त्र का आधार है। भरतमुनि से लेकर अभिनव गुप्त तक रस की विकास यात्रा बोधगम्यता के साथ है, जिसका अध्ययन किसी भी पुस्तकीय संदर्भ से ज्यादा महत्व का है, क्योंकि इस पुस्तक में संस्कृत काव्यशास्त्र के निर्माण के परिदृश्य को सामने रखते हुए आचार्यों की साधना को काव्य की अश्ववाद-प्रक्रिया और रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में रखकर देखने का प्रयास किया गया है। इस वज़ह से काव्यशास्त्र जैसा नीरस विषय भी बेहद सहज और आस्वादपरक बन पड़ा है। यह सहजता अनायास नहीं है बल्कि मधुप जी ने भूमिका में जो लिखा है, वो इस संदर्भ में सटीक है कि ‘नामवर जी की सहज मुस्कान भी अर्थपूर्ण होती है और अर्थपूर्ण मुस्कान सहजता की नई व्याख्या।’

जैसा कि पुस्तक में ही विदित है कि प्रस्तुत पुस्तक ‘नामवर के नोट्स’ संपूर्ण व्याख्यान नहीं बल्कि सिर्फ नोट्स हैं जो कि स्मृति के ज्ञानात्मक आधार का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कुल दस अध्यायों में संकलित व्याख्यान ‘संस्कृत काव्यशास्त्र के स्वरुप निर्धारण’ से लेकर ‘सृजनशीलता में स्वतंत्रता की स्थापना’ यानी भरतमुनि से अभिनव गुप्त तक का सफ़र है। इसके पहले अध्याय ‘संस्कृत काव्यशास्त्र का स्वरुप एवं अध्ययन की समस्याएँ’ में काव्यशास्त्र के स्वरुप का निर्धारण संस्कृत से लेकर अंग्रेजी तक किस प्रकार होता रहा है, इसकी विस्तृत चर्चा है। शास्त्र के प्रयोजन पर संस्कृत में भरतमुनि, वामन, आनंदवर्धन, अभिनव गुप्त और विश्वनाथ के मत तो पाश्चात्य में सास्यूर, रोलांड बार्थस, टी.एस. इलियट और चॉमस्की के अध्ययन से परिचित होते हैं तो दूसरी ओर काव्यशास्त्र के विकास के ऐतिहासिक पहलुओं से भी रूबरू होते हैं। और अंततः पाते है कि संस्कृत काव्यशास्त्र का विकास क्रमिक-विकास था -होरिजेंटल था- जिसका समापन रस एवं ध्वनि की पूर्णता में होता है।

दूसरे अध्याय ‘काव्य की विशिष्ट संकल्पना का विकास’ में काव्य या साहित्य कि संकल्पना के विस्तार में काव्य की व्याख्या को सैद्धांतिक रूप देने वाले पहले आचार्य भामह, शब्द और अर्थ के विशिष्ट संबंध की पहचान, इसकी स्पष्ट और सूक्ष्म व्याख्या का श्रेय पाने वाले आचार्य कुंतक और विवेचनात्मक दृष्टि और सौंदर्य विशेष की ओर संकेत करने वाले वामन का संदर्भ कथानक की तरह एक अविरल प्रवाह के साथ जुड़ता है।
अगला अध्याय कुंतक द्वारा वक्रता का सौंदर्य और काव्य के अखंड स्वरुप की खोज पर आधारित है, जिसमें कुंतक को एक सिद्धान्तकार के रूप में वक्रोक्ति तक सीमित न रखकर उनकी मूल चिंता यानी ‘किस प्रकार प्रबंध, नाटक, मुक्तक, खंडकाव्य सुंदर रचा जा सके’ पर भी विस्तार से विचार किया गया है। इसी क्रम में कुंतक के दूसरे रूप यानी व्यावहारिक समीक्षक के रूप में अध्ययन उल्लेखनीय है। जिसके अंतर्गत मेघदूत की समीक्षा, कुमारसंभवम की समीक्षा और अभिज्ञानशाकुंतलम की समीक्षा के साथ-साथ कालिदास जैसे समर्थ कवि के दोषों की ओर संकेत कुंतक की दृष्टि की सूक्ष्मता एवं आलोचना के सामर्थ्य को प्रकट करते हैं।

पुस्तक: अभिनव संस्कृत काव्यशास्त्र
‘नामवर के नोट्स’
प्रस्तुति- शैलेष कुमार
मधुप कुमार
नीलम सिंह
राजकमल प्रकाशन
मूल्य- ₹ 350

अगले अध्याय ‘आनन्दवर्धन : मौलिकता एवं सहृदयता का मणिकांचन योग’ में विशेष रूप से दो बिंदुओं – “पहला सौंदर्य क्या है? इसकी व्याख्या के लिए ‘प्रतीयमान’ शब्द का प्रयोग और दूसरा ‘ध्वनि का अंतर्भाव संभव नहीं’ अर्थात ध्वनि का अंतर्भाव अभिधा, लक्षणा, तातपर्य, अनुमान आदि में नहीं हो सकता।” पर विशेष दृष्टि है। आनंदवर्धन ने अपनी इस मौलिकता के बल पर सबका खंडन किया और कहा कि ‘अस्ति ध्वनिः’। इसप्रकार निष्कर्ष निकला कि व्यंजना एवं ध्वनि पर्याय नहीं है। यह समझना भ्रम है कि जिस काव्य में व्यंग्य है वहाँ ध्वनि भी होगी। और फिर इसी क्रम में उत्तम काव्य का प्रश्न, ध्वनि सिद्धान्त और गुणीभूत व्यंग्य की समीक्षा का प्रश्न सामने आता है, जिसकी मुकम्मल व्याख्या मिलती है। इस तरह ध्वनि संबंधी चर्चा इस बात पर समाप्त होती है कि ध्वनि के माध्यम से ही व्यंजना संभव है।

आख़िरी के अध्यायों में नाट्योत्पत्ति का प्रसंग और रस का आरंभिक स्वरुप, रस का स्वरुप : द्वंद्व और वस्तुनिष्ठता का प्रश्न और फिर रस चर्चा का दूसरा चरण नाट्यरस से काव्यरस तक का सफ़र है। जिसमें रस को ठेठ भारतीय अवधारणा बताते हुए इसकी उत्पत्ति की परंपरा बताई गई है। फिर अभिनय का जिक्र जो कि आर्येत्तर देन है, और जिसकी परंपरा भी पहले से थी। ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से संगीत एवं अथर्ववेद से रस आदि लेकर ही जो पाँचवा वेद बना। इस प्रकार नाट्योत्पत्ति के क्रम में भरतमुनि ने अनुकरण सिद्धान्त द्वारा नाटक की व्युत्पत्ति की चर्चा की है। भरतमुनि ने इसे अनुकरण नहीं ‘अनुकीर्तन’ कहा है, जिसे अभिनव गुप्त ने न्याय के अध्यवसाय से परिभाषित किया। इससे आगे के विकास में भरतमुनि का ‘नाट्यरस’ आनंदवर्धन के यहाँ ‘काव्यरस’ बना एवं इसके लिए ध्वनि की उत्पत्ति हुई।

‘अभिनव गुप्त : सृजनशक्ति में स्वतंत्रता की स्थापना’ शीर्षक वाले अध्याय में नामवर जी अभिनव गुप्त को काव्यशास्त्र के सुमेरु मानते हैं। वे कहते हैं कि सहृदयता की जो परंपरा कुंतक से प्रारंभ हुई थी उसे चर्मोत्कर्ष तक पहुँचाने का श्रेय इन्हें ही है। इस अध्याय में अभिनव गुप्त द्वारा भावानुकीर्तन की व्याख्या करके रस की अलौकिक बनाने एवं तमाम विवादों का अंत करके रस की सर्वोच्चता स्थापित करने का अभूतपूर्व योगदान शामिल है। इस प्रकार ‘नामवर के नोट्स’ पुस्तक में भरतमुनि से लेकर अभिनव गुप्त रस की विकास यात्रा के साथ हम संस्कृत काव्यशास्त्र का सरलता से अध्ययन कर पाते हैं, जो इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

अभिषेक कुमार द्वारा लिखित

अभिषेक कुमार बायोग्राफी !

नाम : अभिषेक कुमार
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 133 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 87 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 148 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 168 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 273 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.