महापंचायत…: कहानी (अभिषेक प्रकाश)

कथा-कहानी कहानी

अभिषेक 52 2018-11-15

अभिषेक की कलम खासकर साहित्यिक विधा के तौर पर पूर्व नियोजित होकर लिखने की आदी नहीं है | हाँ बस वे मानव जीवन की घटना परिघटनाओं पर वौद्धिक क्रिया-या प्रतिक्रिया पर अपनी कलम न घसीटकर, अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को उन्मुक्त छोड़ते हैं…. बस कहानी लेख आलेख के दायरे से आज़ाद….. ‘महापंचायत’ उसी लेखकीय उन्मुक्तता से निकली रचना है जो मुझे कहानी लगी…. बाकी आप भी पढ़ें और तय करें …..

महापंचायत… 

अभिषेक प्रकाश

कल रात को घूमते हुए शहर के सबसे बाहरी चौराहे पर मेरी नज़र पड़ी तो मेरे होश ही उड़ गए। वहां खड़ी एक आदमकद गांधी की प्रतिमा ही गायब थी। अब तक तो अम्बेडकर का यह हाल मैं देखते ही आ रहा था कि कभी किसी ने मूर्ति चोरी कर ली तो कभी किसी ने हाथ ही तोड़ दिया ! इससे पहले कि कोई हड़कंप मचता मैंने ही उनके छानबीन में दौड़ना शुरू किया। सामने कुछ दूरी पर एक ताल था जो गर्मी की वजह से फिलहाल सूखा था। मैं भी मूर्ति की तलाश में उधर ही निकल पड़ा। थोड़ी ही दूर गया था कि वहां किसी के कदमो की आहट सुनाई पड़ी। मैं उधर की ओर तेजी से दौड़ा। और फिर मैं क्या देखता हूं कि गांधीजी चले जा रहें हैं। मुझे तो समझ नहीं आया तो पूछ ही लिया कि “आप यहां क्या कर रहें है ?!” खैर मै बापू को जानता था कि जरूर कोई खास वजह होगी यहाँ आने की। ऐसा तमाम बार हुआ है कि वे जनता की नब्ज़ टटोलने घटना स्थल पर स्वयं पंहुच जाते थे चाहे वह चंपारण हो या नोआखली! तभी बापू अचानक से पीछे पलटे और हाथ जोड़ते हुए कहने लगे – “मेरे बेटे तू मुझे गोली मार दे! पिछली बार गोडसे ने मुझे गोली मारी थी लेकिन मै बच गया था केवल मेरा शरीर नष्ट हुआ था ! बस मेरी साँसे ही रुकी थी ! लेकिन अब मैं मरना चाहता हूं। समाप्त होना चाहता हूं !”

मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। एक विचित्र बेचैनी में मेरे होंठ सूख गए थे और आवाज़ भी नहीं निकल पा रही थी। मैंने सहमते हुए बापू से कहा कि ”बापू हम आप से प्रेम करते हैं और आप के प्रति हमारी अगाध आस्था है।’ तब बापू की आवाज़ में मैंने एक अजीब तरह की भरभारहट महसूस किया जैसे कोई चीज अंदर ही अंदर धीरे- धीरे पिघल रही हो ! बापू धीरे -धीरे आगे बढ़ चले और मैं उनके पीछे हो लिया । कुछ दूर चलने के बाद मुझे हलचल सी सुनाई दी चूकि रात होने की वजह से वह स्पष्ट नहीं हो सकी । अमूमन शांत और वीरान रहने वाली जगह में ऐसी हलचल सुनकर मन में कुछ अनिष्ट होने की आशंका जाग ही जाती है | इसलिए बापू से पूछ लिया कि आखिर माज़रा क्या है ।
बापू ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ बोला कि “आज महापंचायत है, आत्माओं की महापंचायत ! और आज महापंडित जी मामले की सुनवाई करेंगे।”
“महापंडित यानि कि राहुल सांकृत्यायन” उत्सुकतावश मैंने कहा।
बापू ने मेरे कंधे को धीरे से दबाते हुए कहा “हां राहुल जी।”
अब हमलोग ताल के मध्य में पहुँच चुके थे जहाँ राहुल जी थोड़े से ऊँचे जगह पर बैठे हुए थे।तभी उनकी नज़र बापू पर पड़ी और वह उठ खड़े हुए,और अभिवादन करते हुए बोला आइए महात्मा आपका ही इंतज़ार था।मैंने भी अभिवादन किया और चारों तरफ नज़रे दौड़ाई तो उस महापंचायत में केवल गाय ही गाय दिखाई दी।गायों ने भी अभिवादन कर अपनी- अपनी जगह पकड़ ली और मै भी बिना कुछ पूछे एक कोने में जा कर बैठ गया।
तभी एक गाय ने उठकर कहा पंडितजी हम “अघन्या है ऋग्वेद में लिखा है। हमको मारने वाला अपराधी है। उसको मृत्युदंड मिलना ही चाहिए।” और फिर पीछे मुड़कर अन्य साथी गायों से सहमति लेना चाहा।
तभी वहां बैठे एक बछड़े ने खड़े होकर राहुल जी से पूछा “क्यों पंडितजी आपका क्या मानना है ?”
पंडितजी तो ठहरे महाज्ञानी उनको किसी से कोई लाग लपेट भी नहीं था तो वो कहां चुप रहते! और मुस्कुराते हुए बोले “इसका फैसला मैं नहीं कर सकता क्योंकि मैंने तो अपनी किताब ‘वोल्गा से गंगा’ में हिन्दी-ईरानी जातियों के 2500 वर्ष पूर्व बछड़े खाने की बात लिखी है। तो मुझे लगता है कि बापू ही इसके बारे में कुछ बोले।” इतना कहना ही था कि सभी की नज़रे बापू पर आकर टिक गई। बापू स्वयं ही ठहरे वैष्णव जन, अहिंसा के पुजारी ! वह क्या बोलते!लेकिन गाहे-बेगाहे वह अपनी खरी-खरी सुनाने में भी नहीं हिचकिचाते थे।

अबकी बापू खड़े हुए, आँखों के ऐनक को ठीक करते हुए बापू ने अपने खादी के झोले में से एक पुरानी सी किताब निकाली । और वहां उपस्थित लोगों की ओर देखते हुए कहने लगे “क्या करूं ऐसा ज़माना ही आ गया है कि खुद का लिखा स्वयं ही पढ़ना पढ़ रहा है। मैं तो खुद ही गोभक्त हिन्दू हूं। और मै गाय की सेवा करता हूं। मेरे लिए गाय अघन्या है, लेकिन अगर कोई दूसरा मारे तो मृत्युदंड ! यह मेरी समझ से बाहर है। मै इंसान की हत्या की वकालत नहीं करता । हां एक बात और, गाय इस कृषिप्रधान देश की रक्षा करने वाली है इसके बावजूद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश में विभिन्न धर्मों के लोग रहते है, तो दूसरे धर्मों के अनुसार गाय इतनी पवित्र और पूजनीय शायद न हो ।”

तभी उस गाय ने तिलमिलाए हुए अपनी स्थान से ही चिल्लाना शुरू कर दिया कि, “तो इसका क्या मतलब है उनके धर्म में हम पूजनीय नहीं हैं तो क्या वे लोग हमें काटेंगे और हमारा गोश्त खाएंगे ?”
एक गाय जो सबसे पीछे की कतार में बैठी थी उठ खड़ी हुई और कहने लगी ”बापू मरना किसे पसंद है ! मैं भी मरना नहीं चाहती थी। लेकिन मुझे भी मरना पड़ा। मैं चाहती थी कि किसी ब्राह्मण के यहाँ मरूं ताकि मरते समय वह मुझे गंगा और तुलसीजल पिला देता। ताकि मुझे भी मुक्ति मिल जाती। पंडितजी और बापू आप दोनों हैं तो मैं अपने मन की कह भी लेती हूं नहीं तो कौन सुनेगा मेरी ! सभी मुझे विधर्मी कहते हैं। आप जानते हैं मेरे साथ क्या हुआ ?”

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दोनों लोगों ने इशारों में ही उस गाय को अपनी बात रखने की सहमति दे दी । आगे गाय ने अपना दुखड़ा सुनाना शुरू किया और कहा कि “बापू यह केवल मेरी निजी समस्या नहीं है। यहाँ खड़े गौ समाज के तमाम लोगो की समस्या है। बापू मैं एक ग्वाला के यहां थी और खूब दूध देती थी। वहां भी मेरे दुलार में कोई कमी नहीं थी। लेकिन कुछ दिनों बाद जब मैंने दूध देना कम कर दिया तो उसने मुझे एक ब्राह्मण के हाथों बेच दिया । वह ब्राह्मण तो मेरी पूजा भी किया करता था। लेकिन इस प्यार की भी एक उम्र थी, प्रेम अब बुढ़ापे की ओर प्रवेश कर रहा था अब मेरे यौवन में कोई आकर्षण नहीं रह गया था। लेकिन ऐसा नहीं था कि मुझे कोई पूछने वाला नहीं था, कम से कम माँ मानने वाले लोग तो थे ही | उस बार मैं किसी क्षत्रिय के हाथों खरीदी गई । मां की उम्र तो ढल रही थी सो अबकी मां की कीमत भी थोड़ी कम लगी । नांद में भी अब पहले जैसा व्यंजन नहीं होता था । वही रुखा सूखा खा रही थी । धीरे-धीरे शरीर भी कमजोर होता जा रहा था। कुछ दिनों बाद मैं वहां खुद को उपेक्षित महसूस करने लगी। लेकिन मैं मरना इज़्ज़त से ही चाहती थी। जानते हैं मेरी ही एक पुरखी थी जो कुछ साल पहले पंडिताइन के यहाँ मरी थी और उस गांव के। दलित लोगो ने अम्बेडकर के प्रभाव से उसके घर से लाश हटाने से मना कर दिया था। ऐसी मौत नहीं चाहिए मुझे! मैं भी डर रही थी। अंततः मुझे एक ऐसे आदमी के हाथों बेच दिया गया जो मुझसे दूध नहीं निकाल सकता था। वह पीढ़ी दर पीढ़ी इसे व्यापार में लगा था जिसमें मेरे मालिक जैसे ही लोगों के यहाँ से गैर फ़ायदेमंद पशुओं को सस्ते दाम में खरीद लेता था, फिर उसे बूचड़खाने की सैर कराता था। कुछ दिनों बाद मेरा भी क़तल कर दिया गया। बापू सबने मुझसे अपने अपने हित साधे। किसी ने मुफ़्त में मुझे माँ नहीं माना। जब तक फायदेमंद रही लोगों ने मेरे गोबर से भी फायदा उठाया । बापू मुझे लगता है कि हम अघन्या कभी नहीं थे। हाँ जब संपत्ति के रूप में पशु ही सबकुछ हुआ करते थे ,तब की अलग बात है कि हम उस समय व् समाज में पूजे जाने लगे। लेकिन अब हम केवल जानवर बनकर रह गए है ।”
तभी वह पहली गाय उठ खड़ी हुई और कहने लगी कि “इसका क्या मतलब हुआ की हम जानवर हैं…. तो कोई हमें काटेगा ?”

तभी राहुल जी बीच में उठ खड़े हुए और टोकते हुए बोले “यह मारने- काटने का काम तुम जानवरों का नहीं बल्कि हम मनुष्यों का है ,वह भी सभी मनुष्यों का नहीं | और हां, यह खानपान संस्कृति से जुड़ा मसला है। तुम जानवरों की क्या संस्कृति है, ये तो हम मनुष्य है जो किसी की भी रसोई में झांक कर देखते है कि वहां क्या पक रहा है। और अगर ऐसी वैसी कोई चीज़ का संदेह भी हो जाता है तो हम दूसरे की जान लेने से भी नहीं चूकते ! और हां, दूसरी ओर भी कुछ लोग ऐसे हैं कि किसी की भावना आहत करने में चंद मिनट की देरी नहीं लगाते ! मुझे तो लगता है कि ‘मज़हब ही आपस में बैर करना सिखाता है’। हमे तो धर्म के प्रतीक ही समाप्त कर देना चाहिए । क्योंकि हिंदुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी बल्कि मजहबों की चिता पर होगी ।”

तभी बापू ने महापंडित सांकृत्यायन को बीच में ही टोकते हुए कहा कि “ऐसा नहीं है कि धर्म मिटा देने से नफरत समाप्त हो जाएगी। इस देश में तमाम लोग ऐसे भी हुए है जिन्होंने जनता की धार्मिक मान्यताओं को राजकाज में बेहद संवेदनशीलता के साथ समाहित किया ताकि विवाद की गुंजाइश कम से कम रहे। कइयों ने तो गोवध पर अपने शासन काल में रोक भी लगवाई थी।” अब बापू लगातार बोलते जा रहे थे। बापू ने यह भी कहा कि “कभी मै भी गो-रक्षा शब्द का प्रयोग करता था बाद में गो-सेवा कहने लगा और अब पशु सेवा। हां एक बात और बता दूं कि मुस्लिम राजा बाबर ने हुमायूँ को यह कहा थी कि गाय का वध बंद करा देना | यह कोई एक उदाहरण नहीं है जब यहाँ के लोगो ने बंधुता की मिसाल कायम की हो। आज भी कइयों गोशालाएं है जो मुस्लिमों द्वारा संचालित की जाती है।”

राहुल जी ने तभी हाथ उठाकर बापू से अपनी सहमति जताई और गायों की ओर उन्मुख होकर कहा कि “जिस समस्या पर हम बात कर रहे हैं वह समूची मानवता से जुड़ा मसला है। जरूरत है कि चाहे कोई किसी भी धर्म और पंथ को मानने वाला हो, या आपस में चाहे कोई भी वैचारिक असहमति रखने वाला हो वह कम से कम एक-दूसरे से सहिष्णुता से पेश आए। कट्टरता, अन्धविश्वास और जड़ता से बाहर आए। मारना काटना नफरत फैलाना कोई हल नहीं है यह तो सत्ता पाने का हथियार हो चुका है ।”

तभी एक गाय ने कहा कि “हमारा क्या होगा, हम कैसे बचेंगे ?” चूकि बहस काफी लंबी हो चुकी थी और अब भोर होने ही वाली थी तो इस महापंचायत को समेटना जरुरी था। इसलिए पंडितजी ने एक बीमार सी दिखने वाली लेकिन वहां उपस्थित तमाम गायों में से सबसे अनुभवी गाय को अंतिम टिप्पणी करने के लिए निवेदन किया। वह गाय तमाम राजदरबारों और पंडित-पुरोहितों के यहां जीवन बिताते हुए अपने अंतिम दिनों में एक बूचड़खाने में काट दी गयी थी। वह बोलने के लिए खड़ी हुई और सबको अभिवादन करते हुए अपनी बात रखना आरम्भ किया ‘मैंने इस देश में गाय होने पर विशेष सम्मान पाया है, विशेष इसलिए की जहाँ के लोगों को दो जून की रोटी भी भरपेट उपलब्ध न होती हो वहां मै पूजी गई। कभी-कभी तो लोगों के चमड़ी से भी ज्यादा शुद्ध मेरा गोबर माना गया। लेकिन यह सभी के साथ नहीं था, मेरे ही साथ की तमाम गाय सड़क किनारे, बाज़ारो में पेट भरने के लिए कचड़ा, प्लास्टिक की थैलिया और न जाने क्या क्या खाती रही है, जिसकी वजह से उन्हें तमाम रोग हुए और वो मर भी गई। तमाम गो-भक्त बगल से गुजर जाते थे लेकिन कोई पूछने वाला नहीं था। सभी का प्रेम वस्तुतः उपयोगितावादी था। जो आजीवन हमसे दूध पीता था वही हमको अंत समय में काटने वाले के हाथों में बेच देता था। चूँकि मेरा यह मानना है कि वह इतना अबोध तो नहीं था कि कम दाम में जब कोई मुझे खरीद कर ले जाता था और वो भी तब जब मैं दूध नहीं देती थी और निर्बल हो चुकी होती थी, तो वह यह सोचता हो कि खरीदने वाला मुझे मां मानकर बुढ़ापे में मेरी सेवा करेगा…!…… अनुभवी गाय लगातार बोल रही थी….
“सच यह है कि सबने हमारा दोहन किया और बुरा मत मानिएगा, ये पूरी मानव जाति जो है न वह प्रकृति का इसके घटकों का किसी न किसी रूप में शोषण करती ही रहती है! हमारी आपसे यही गुजारिश है कि मरना तो हमारी नियति में है और किस तरह मरना होगा यह मानव सभ्यता निर्धारित करेगी । लेकिन अगर हमे कुछ देना है तो बाकी देश के अन्य लोंगो की तरह ही हमारा भी पेट भर दीजिए ताकि हमें चारे के आभाव में कचड़ा न खाना पड़े ।”
अब वह गाय सीधे गाँधी बाबा और पंडित राहुल जी से मुखातिब थी “और…. आपके साथ, आपकी तरह दूसरे लोग भी, जो समाज में इसी तरह का महत्व रखते है से भी एक निवेदन है कि आप सभी चौराहों पर लगी अपनी मूर्तियों में से बाहर निकलिए, लाइब्रेरी के पन्नो से बाहर निकलिए और गांव-शहर, गली-मुहल्लों में जाइए । वहां बच्चे-बूढ़ो के मन में उतरिए । लोगों तक पहुँचिए उन्हें समझाइए….. यदि आपने यह किया तो… इन चौराहों पर हमारी मूर्तियां स्थापित होने लगेंगी जिस पर यह अंकित होगा कि फलाने बूचड़खाने में इस महान देशभक्त गाय को काटा गया, या फिर लिखा होगा, कि इस गाय को बचाने में दो निर्दोष लोगों की चौराहों पर सरेआम पीट-पीट कर हत्या कर दी गई ….| इसलिए अंत में हम सब की और से सिर्फ एक बात कि ‘हम पशु हैं आप सब हमें पशु ही रहने दे। हमें इंसान की तरह धर्म की ज़ंजीरो में न बाँधे ।’

अचानक मुझे लगने लगा कि मेरा चेहरा बहुत जोर से ताप रहा है…. मैं हडबडाया और मेरी आँख खुली, सूरज बहुत ऊपर तक चढा था और उसकी एक तीखी सी किरण मेरे चहरे पर सीढ़ी पढ़ रही थी |

अभिषेक द्वारा लिखित

अभिषेक बायोग्राफी !

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

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