मेरे समय में नेहरू: आलेख (अभिषेक प्रकाश)

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अभिषेक 36 2018-11-15

नेहरू को हमने किताबों के माध्यम से जाना जरूर पर सबसे शिद्दत से मोदी युग में ही महसूस किया। एक घटना याद आ रही है मुझे जब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं आपका प्रधानसेवक हूं। तभी मुझे त्रिमूर्ति की याद आई जिसके पास ही एक स्मारक में मैंने नेहरू द्वारा कहे गए इसी शब्द ‘प्रधानसेवक’ को लिखा पाया था। खैर सेवक तो सभी है कॉपीराइट केवल नेहरू का ही थोड़ी ही है। ….. अपने समय में नेहरु को समझने का प्रयास कर रहे हैं ‘अभिषेक प्रकाश’


मेरे समय में नेहरू 

अभिषेक प्रकाश

अभिषेक प्रकाश

नेहरू का नाम मत लीजिए! नेहरू एक असफल नेता थे। उन्होंने देश को बहुत नुकसान पहुँचाया। चीन और कश्मीर मामले को ही देखिए इस आदमी के कारण ही देश को आज तक नुकसान झेलना पड़ता है। आज कश्मीर जल रहा है आखिर क्यों? सीधा सा जवाब है नेहरू के कारण। यह व्यक्ति सत्ता का लालची था ! नहीं तो कोई और नहीं था क्या प्रधानमंत्री बनने लायक! लेकिन इसने गांधीजी को फाँस लिया था। नहीं तो सरदार पटेल इस देश के पहले प्रधानमंत्री हुए होते! और फिर क्या ये सारी समस्याएं ऐविंग सॉल्व हो गयी होती। पेरिस से तो इसके कपड़े धुल कर आते थे और नहीं तो ये रंगीन मिज़ाज़ का आदमी था। लेडी मॉन्टबेटन से इसके अंतरंग सम्बन्ध थे !जी हां! सेक्युलरिज्म के नाम पर इस आदमी ने हिन्दू धर्म के साथ जो खिलवाड़ किया न ,बिलकुल अक्षम्य है । अरे यह आदमी खुद तो नास्तिक था ही औरों को भी यह अपने जैसा बनाना चाहता था। ये नहीं होता तो भारत कब का सिक्योरिटी कौंसिल का स्थायी मेंबर हो गया होता!

ऊपर लिखी पंक्तियां ही आज की बहुसंख्य आबादी के बीच नेहरू की पहचान है। २०१४ की बात है। लोकसभा चुनाव होने वाले थे। पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बमुश्किल दो सौ मीटर की दूरी पर एक स्टूडेंट लॉज में, मैं भी ठिकाना लिए हुआ था। वही इलाहबाद जिसके कभी मेयर रहे थे जवाहर लाल! विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज थी। तत्कालीन केंद्र सरकार के समय में हुए घोटालों से लोगो में सिस्टम के ख़िलाफ़ गुस्सा भरा पड़ा था। साइंस फैकल्टी हो या आर्ट हर जगह राजनीति पसरी हुई थी। राजू के चाय की दुकान हो या यादव जी का होटल चाहे अपना रसोई चावल-दाल, नमक-तेल सभी में राजनीति का तड़का था। यूँ समझिए राजनीति पुदीन हरा की गोली थी! मेरे कमरे के नज़दीक ही आनंद भवन था। हां वही आनंद भवन। जो नेहरू परिवार के वैभव का प्रतीक था! मैंने लोगों को तर्क देते सुना था कि अंग्रेज़ो की दलाली और मोतीलाल नेहरू की वकालत की कमाई की बदौलत था ये सबकुछ। हां एक बात और जो मैंने गौर किया था कि वहां दक्षिण भारत से भी लोग आते थे। कई-कई बसों में एकसाथ सैकड़ो के समूह में संगम नगरी में अपने पाप को धोने के लिए तब वह आनंद भवन भी जरूर घूमने आते थे। मैंने उनके भाव को भी महसूस किया था जब वो ख़ाली पैर सीढ़ियों पर चढ़ा करते थे मानो की कोई मंदिर हो। एक भक्त जैसा भाव लिए! अंध भक्ति बुरी ही होती है चाहे वो किसी की भी हो। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे जो नेहरू के नाम से ही मुग्ध हो जाते थे।उनके लिए नेहरू महान थे। उनके पास इसके पक्ष में राजनीतिक तर्क भी होते थे।

imagesउसी दौरान मैं नेहरू की एक छोटी सी तस्वीर लाया, जिसको मैंने अपने कमरे की एक दीवार पर चस्पा कर दिया। नेहरू के साथ कई और तस्वीरें भी थी उस कोलाज में। पर उस बौद्धिक नगरी में नेहरु ही ज्यादा चुभते थे! कमरे पर आने वाले अधिकतर लोगों को यह लगता था कि कैसे मैं नेहरू को पसंद कर सकता हूं। उन्हें मेरे इतिहासबोध पर हमेशा ही शक़ रहा। हां और मुझे उनलोगों पर! क्योंकि प्रायः नेहरू की आलोचना में वह कुछ भी कह जाया करते थे। कुछ भी मतलब कुछ भी। नेहरू की माँ-बहन को हमारे दौर में नेहरू से भी ज्यादा झेलना पड़ा! नारी को सशक्त करने के सबके अपने अलग तरीके हैं। नेहरू ने अपने बेटी को पढ़ाया लिखाया । समयाभाव में जेल से ही चिठ्ठियां लिखकर अपने पिता होने की भूमिका को बखूबी निभाया! आज का तरीका अलग है ! पर जो भी है अजीब है। लगता ही नहीं कि भारत के डीएनए में ये कुछ नया सा है। गालियां बकते ये लोग देश व् धर्म के प्रति पब्लिक प्लेटफॉर्म में हमसे ज्यादा संवेदनशील नज़र आते हैं।

नेहरू को हमने किताबों के माध्यम से जाना जरूर पर सबसे शिद्दत से मोदी युग में ही महसूस किया। एक घटना याद आ रही है मुझे जब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं आपका प्रधानसेवक हूं। तभी मुझे त्रिमूर्ति की याद आई जिसके पास ही एक स्मारक में मैंने नेहरू द्वारा कहे गए इसी शब्द ‘प्रधानसेवक’ को लिखा पाया था। खैर सेवक तो सभी है कॉपीराइट केवल नेहरू का ही थोड़ी ही है।

हां नेहरू मेरी स्मृति में जगह बना पाए उसमें ‘बुश’ कम्पनी के एक रेडियो का भी छोटा सा योगदान रहा। छोटी वाली टीवी से थोड़ा ही छोटा उस रेडियो को मेरे बाबा ने कलकत्ता में ख़रीदा था। नेहरू के भाषण को सुनने के वास्ते। तब पूरब के लोग की रोज़ी-रोटी का पनाहगार कलकत्ता ही हुआ करता था! बाबा अपने पूरे कुनबे के साथ कई दशकों से वही डेरा-डंडा डाले हुए थे। हां बाबा के ही एक चाचा भी वहीं थे , जिन्होंने नेताजी बोष के ऊपर एक काव्यात्मक शैली में पुस्तक लिखी थी। जिसकी प्रेरणा में बाबा का अहम् रोल था। ऐसे व्यक्ति द्वारा केवल नेहरू के भाषण सुनने के लिए उस गरीबी और संघर्ष के दौर में रेडियो खरीदना उनके राजनीतिक समझ को प्रदर्शित करता था। उन्होंने मेरा नेहरू से परिचय ऐसे कराया कि मुझे अपनी सोच मे वैज्ञानिकता को समावेशित करने में कोई अलग से एफर्ट नहीं करना पड़ा। वह रेडियो चलता नहीं था। और बाबा की इच्छा थी कि उसे किसी तरह ठीक करवा दूँ मैं। अभी ग्लोबलिज़ाएशन को पनाएं बमुश्किल एक दशक भी नहीं हुए थे लेकिन उसका प्रभाव बाजार में साफ़ दिखने लगा था। मैं उस रेडियो को अपने साथ लाया था कि अबकी बनवाऊंगा और बाबा को दूंगा! मेरे एक दोस्त की रेडियो की दुकान थी । वहां मै रेडियो लेकर गया पर मिस्त्री ने कहा कि इसको बनाना संभव नहीं। उसने इसके बदले और कुछ पैसे लगाने पर एक ‘टू ईन वन’ मतलब रेडियो और टेप जिसमे दोनों हो देने को कहां। और जिसके बदले में मैंने उस रेडियो को बदल ली, जो बाबा के लिए अपना अतीत का एक सुनहरा अध्याय था। जो मेरे लिए एक इतिहास का शानदार पन्ना था।जो उनके मेहनत-मजदूरी का छोटा सा प्रतीक था। आज नेहरू, बाबा और रेडियो तीनों नहीं हैं। बाज़ार, मध्यवर्ग और उससे उपजा एक लालच है। जो फ़ायदा पर टिका हुआ है। जहां हर चीज़ एक प्रोडक्ट है। इमोशन का एक लंबा-चौड़ा बाजार है।जिसमे हर चीज बिकती है। बाबा का रेडियो हो या नेहरू के विचार! नेहरू अब ज्यादा बिकते है लेकिन अपने मूल रूप में नहीं! नेहरू को कमतर दिखाने के लिए हर तरतीबे अपनाई जा रही है।
बचपन में १४ नवंबर का दिन बहुत खास होता था जब मैं अपने स्कूल में बाल दिवस को एक उत्सव की तरह मनाता था। नेहरू के विचारो को समझने-समझाने का खास दिन होता था। बाद के दिनों में इस पर तमाम प्रश्न उठने लगे कि क्यों नेहरू के जन्मदिन को ही बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है? बुरा नहीं है उठने ही चाहिए ऐसे प्रश्न! अंधानुकरण जितना कम हो उतना ही सही है। पर यह सभी के लिए होना चाहिए ना कि किसी खास उद्देश्य से किसी को टॉरगेट बनाकर।

नेल्सन मंडेला ने नेहरू को अपना हीरो बताया था। मिखाईल गोर्बाचोव ने लिखा था कि नेहरू के भाषण को सुनने के लिए उन्होंने कितना प्रयास किया था। ऐसे तमाम लोग हुए हैं इतिहास में जिन्होंने नेहरू का अनुकरण किया। लेकिन केवल इसी आधार पर हम भी नेहरू का अनुकरण करें सही नहीं हैं। हर पक्ष को सुनकर उसे तर्क की कसौटियों पर कसना बिलकुल जरुरी है। नेहरू ऐसा करते थे इसलिए ही उन्होंने अपने पिता मोतीलाल द्वारा तैयार नेहरू रिपोर्ट का विरोध किया था। इसीलिए ही वह कभी गांधी का अंधानुकरण नहीं किए। उनके अपने विचार थे और उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता थी।

मैं यहां उनके निर्णयों को सही नहीं ठहरा रहा। उनके अपने निर्णय थे जिस पर तत्कालीक परिस्थितियों का दबाव भी रहा होगा। और उनसे भी अच्छे निर्णय लिए जा सकते थे। लेकिन बात बहुत छोटी सी है की हमारी आलोचनाओं का स्तर क्या होना चाहिए। कई बार हम किसी का ‘चारित्रिक हत्या’ कर डालते है और हमे पता भी नहीं चलता। किसी के भी निजता का सम्मान भी किया जाना जरुरी है। नेहरू ही नहीं ऐसे तमाम लोग है जो भारत के निर्माताओं में से एक है। उनकी अच्छी चीज़ों को समझने की आवश्यकता है, और उनकी कमियों को भी जानलेना जरुरी है। और तभी हमारी इतिहासदृष्टि मज़बूत भी होगी।

भारतीय संस्कृति में समा लेने की ताकत है। न जाने कितनी ही विचारधाराओं को यह अपने अंदर समाहित कर बैठी है। नेहरू जैसे लोग उसी के उपज हैं। नेहरू पहले प्रधानमंत्री थे इसलिए उनके द्वारा जो भी किया गया सब पहली बार ही था। लेकिन एक चुनौती भी उन्हीं के साथ थी कि उनके पास कुछ भी पहले से कलमबद्ध नहीं था। अनुभव भी ऐसा नहीं था। दुनिया में विचारधाराओं का बोलबाला था। दुनिया बाज़ार से अलग थी। तब आर्थिक हित विदेश नीति को तय करें आवश्यक नहीं होता था। हां दबाव इसका भी था कि जो बीज बोवा जाएगा पेड़ उसका ही तो होगा। हम सौभाग्यशाली थे कि हमारी पूर्व की पीढ़ी वैचारिक रूप से समृद्ध थी और उससे भी ज्यादा कर्मठ थी।

अभिषेक द्वारा लिखित

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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