रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स, सवालों में ! आलेख (अभिषेक प्रकाश)

विमर्श-और-आलेख विमर्श-और-आलेख

अभिषेक 40 2018-11-15

तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों के खोखलेपन से उत्पन्न रिक्तता में पाँव पसारते वर्तमान में शेक्सपीयर का वह वाक्य याद आता है जिसमे वह कहतें है कि– ‘अगर आप उसे पराजित करना चाहते हैं तो आपको उसकी यादाश्त को मिटा देना होगा, उसके भूत को नष्ट कर देना होगा, उसकी कहानियों को समाप्त कर देना होगा”। ऐसे में नेल्सन मंडेला की अभिव्यक्ति “स्वशासन की नींव में महत्वपूर्ण है कि सभी लोग अपने मतों को रख सके और नागरिक के रूप में उनकी वैल्यू समान हो।” को समझना ही होगा और एक बेहतर समाज, राष्ट्र और लोकतंत्र के लिए सवालों और तर्कों की इंसानी परम्परा को बचाए रखना ही होगा इसके लिए जरूरत है तो बस चुप्पी तोड़ने की …..| वर्तमान में सवाल और सवालों की लोकतांत्रिक महत्ता पर प्रकाश डालता “अभिषेक प्रकाश’ का आलेख ….

रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स, सवालों में ! 

अभिषेक प्रकाश

अभिषेक प्रकाश

राजा राम मोहन रॉय की एक कविता है जिसमे वह लिखते हैं कि–
‘जरा विचार कीजिये 
वह दिन कितना भयानक होगा जब आपकी मृत्यु होगी।
दूसरे बोलेंगे और आप चुप होने को अभिशप्त होंगे।’

सोचिए उन्नीसवीं शताब्दी में बैठा एक व्यक्ति अभिव्यक्ति के महत्व की बात कर रहा है।और आज हम प्रश्न से ही डरने लगे हैं।जबकि लोकतंत्र सार्वजनिक बहसों और पारस्परिक तर्कों के सहारे ही वयस्क होता है।लेकिन प्रश्न पूछना हमारे समाज में गुनाह होता जा रहा है। कॉपरनिकस याद हैं न, उस समय राजतन्त्र था जब उसने यह बात उठायी थी कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है।और इसके कारण उसे धर्मगुरुओं का भारी विरोध झेलना पड़ा था ।लेकिन तर्क करने की यह परम्परा क़ैद नहीं की जा सकी।और मानव सभ्यता आज जहाँ तक पहुँची है उसके पीछे ऐसे तर्कशील लोगों द्वारा प्रश्न उठाने की इस निर्भीक परम्परा का महत्वपूर्ण योगदान है।
आज जो भी प्रश्न उठाए जाते है निश्चित ही कोई न कोई व्यक्ति, समुदाय या व्यवस्था उससे आहत होता है ।पर क्या हमें चुप रहना चाहिए या प्रश्न का जवाब देना चाहिए।बात लोकतंत्र की हो तो हम यह पाते है कि नागरिक इन प्रश्नों के बहाने राजनीतिक बहसों में शामिल होते हैं और इन बहसों से वह अपनी एक राय बनाते हैं।इस क्रम में उन्हें नई नई सूचनाएं मिलती हैं।जो हमारी प्राथमिकताओं को तय करती हैं।और हमारे निर्णय में काफी सहयोगी होती है।बात भारत की हो तो यह वाद-विवाद की परम्परा काफ़ी प्राचीन रही है।
नेल्सन मंडेला ने अपनी आत्मकथा ” लॉन्ग वॉक टू फ्रीडम” में लिखा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की यह शुरुआत मेरे घर से शुरू हुई।स्थानीय मीटिंग में मैं जाता था वहां चाहे कोई किसी भी तरह का काम करने वाला हो या किसी भी वर्ग का हो उसको अपनी बात रखने की स्वतंत्रता थी।स्वशासन की नींव में महत्वपूर्ण है कि सभी लोग अपने मतों को रख सके और नागरिक के रूप में उनकी वैल्यू समान हो।” इसको हमनें देखा कि जब वह दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने श्वेत-अश्वेत दोनों को अपने साथ रखा।उनके प्रश्नों को उनकी चिंताओं को समझा और लोकतंत्र में उनकी सहभागिता को सुनिश्चित किया।वहीं हम आज देखते हैं कि बहुत सारे देशों ने अपने डेमोक्रेसी में सहभागिता को तवज़्ज़ो नहीं दिया जिसके परिणामस्वरूप उस देश को गृहयुद्ध से लेकर विभाजन तक का चक्र झेलना पड़ा।

साभार google से

साभार google से

आज हमारे देश में जो प्रश्न उठ रहें है उसको लेकर कुछ लोग शंका के शिकार हैं।वह प्रश्नों को सरकार के पक्ष-विपक्ष के रूप में देखने लगे हैं।जबकि मेरा मानना है कि हमें प्रश्नों के पीछे के वाज़िब तर्क को ढूढ़ना चाहिए, न कि प्रश्नों को वर्ग,जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्रीयता की राजनीतिक नाकाबंदी के रूप में।कुछ उदाहरण लीजिए जैसे पिछले दिनों हमारे प्रधानमंत्री ने ट्रिपल तलाक का मुद्दा उठाया।लेकिन शरीयत के नाम पर मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग उसका विरोध करते नज़र आया।तब इस मुद्दे पर उठे बहसों ने, याद कीजिए ,किस तरह तमाम सूचनाओं ने हमारे ज्ञान को बढ़ाया और हमारी कई भ्रांतियों को दूर किया।हमें यह भी मालूम चला कि यह कई देशों में वैध नहीं है।
हिना सिद्धू ने ईरान में चल रहे शूटिंग प्रतियोगिता में हिज़ाब पहनने से मना किया और इस मुद्दे ने हमारा ध्यान खिंचा।इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रोपगैंडा रचने के लिए किया जा रहा है।हमने देखा कि ईरान में भी ऐसे सुधारवादी लोगों की कमी नहीं है जो अपने समाज की अज्ञानता दूर करने का लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
पिछले दिनों हजारीबाग में कुछ किसान मारे गए, छत्तीसगढ़ में भी कुछ लोग(कुछ के लिए आदिवासी तो कुछ लोगों के लिए नक्सली) मारे गए।दोनों जगहों पर पुलिस व् राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाया गया। इस पर भी काफी ऐतराज किया गया।हालांकि एक अन्य उदहारण में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में यह बयान दिया कि आदिवासियों के गांव को जलाने में पुलिस का हाथ था।नया बवाल सर्जिकल स्ट्राइक और मध्य प्रदेश में कैदियों के एनकाउंटर पर उठा।
इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में हम जब लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे गंभीर मुद्दों की पड़ताल करे तो हमें उस शंकालु वर्ग जो प्रश्नों को सरकार या व्यवस्था की आलोचना के रूप में देखते हैं या जो प्रश्नों को सपाट रूप में देखते हैं कि ओर से कुछ ऐसे प्रश्न सुनने को मिलते हैं–
क्या सेना व् पुलिस के लोगों का मानवाधिकार नहीं होता।
क्या केवल आतंकवादियों व् नक्सलियों के लिए ही मानवाधिकार हैं।
आतंकवादियों को बैठा कर खिलाने की जरुरत क्या है।उन्हें मार देने में क्या बुराई है।
अगर आपको राष्ट्र की चिंता है तो आपको इनलोगों के मरने पर इतना दुःख क्यों होता हैं।
ऐसे तमाम प्रश्न आज हमारे सामने तैर रहें हैं।आज प्रश्न न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को प्रमाणित करता हैं।हां यह जरूर है कि ये प्रश्न भी एक प्रतिक्रिया की पैदाइश है।जिसकी जड़ों में तुष्टिकरण,छद्म पंथनिरपेक्षता, व् तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों का खोखलापन है।लेकिन क्या यह देश, यहाँ के लोग वाम-दक्षिणपंथी विचारधारा के गुलाम हैं। आज इन राजनीतिक दंगल के बीच हम कुछ संकल्पनाओं को छोड़ते जा रहे हैं।जो इस इंडियन रिपब्लिक के लिए प्राणवायु की तरह है।जैसे कि–
सर्वोच्च क्या है ‘संविधान’ कि सत्ता में पदासीन लोग?
क्या हम क़ानून के प्रति प्रतिबद्ध है और क्या विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया हमारे कार्य व्यवहार और समाज को गतिमान करनी चाहिए या कि धर्म, जाति ही निर्णायक होना चाहिए।
क्या इक्कीसवीं सदीं का भारत वैज्ञानिकता की नींव पर नहीं टिका होना चाहिए।
न्यायपालिका और सेना को क्या पवित्रता के चश्मे से ही देखना चाहिए?
लोकतंत्र के लिए व्यक्तिवादी राजनीति क्या भयावह नहीं हैं?
इन प्रश्नों को हमें विश्लेषण करना होगा यदि हम चाहते है कि भारत एक महान राष्ट्र के रूप में उभरे तो हमें इन संदेह के बादलों को घनीभूत नहीं करना चाहिए।उसके समाधान की ओर बढ़ना चाहिए।हमें यह समझना होगा कि इन प्रश्नों से उन घटनाओं पर क्या असर पड़ा।उदाहरण के लिए आप कैदियों के एनकाउंटर को ही लीजिए अगर इस पर प्रश्न नहीं उठाए जाते तो हमको अपनी कमियां दिखाई ही ना देती। जेल का सीसीटीवी कैमरा ख़राब था और उतने कैदियों की निगरानी में केवल एक सिपाही था।और कि हमारे जेल से निकलने के लिए एक दातून और चादर की जरुरत पड़ती है!और भी बहुत कुछ जिसकी जानकारी आपको मिल चुकी होगी। आप इससे पहले भी देख चुके होंगे की लोग बीसियों साल बाद जेल से बेगुनाह साबित होकर निकलते हैं जब उनकी ज़िन्दगी पूरी तरह तबाह हो चुकी होती है।क्या इन प्रश्नों से हमें यह नहीं मालूम होता कि हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम उतना प्रभावकारी नहीं है जितना होना चाहिए।क्या हमारा इन्वेस्टीगेशन सिस्टम इतना सक्षम है जो मामलो का समय से निस्तारण कर सके। व्यवस्था के हर पाये में आपको दक्षता, कार्यकुशलता,पारदर्शिता का अभाव मिलेगा ,नौकरशाही में कई लूपहोल आपको दिखेगा।
अंत में एक बात और जिस सिपाही की जेल में हत्या हुई क्या वह बच नहीं सकता था! शायद बच सकता था या बचाया जा सकता था अगर ऐसे प्रश्न पहले किए जाते! ऐसे तमाम लोग जो हमारे बीच है चाहे वह क़र्ज़ से पीड़ित किसान हो या बॉर्डर पर बैठा सैनिक या पुलिस का कोई जवान या आदिवासी या कि कोई मजदूर या कोई स्त्री या कोई भी जिसके साथ अन्याय हो रहा है अगर हम समय से अपनी आवाज़ बुलंद करते तो हम हर साल हज़ारों लोगों को बचा सकते हैं।आज वह सिपाही भी बच सकता था अगर पुलिस रिफार्म होता, वो तमाम लोग जो फ़र्ज़ी मामलों में जेलों में क़ैद है अगर न्याय प्रणाली में सुधार हुआ होता तो निर्दोष लोग बाहर होते और दोषी को सजा हो सकती थी।पर ऐसा नहीं है।क्योंकि हम आवाज़ उठाना नहीं चाहते। और कुछ ताकतें है जो यह नहीं चाहती की आपके लब आज़ाद हों।हम अपनी प्राचीन भारतीय परम्परा जो वाद- विवाद से समृद्ध है उसको भूलते जा रहे हैं। ऐसे में मुझे शेक्सपीयर का वह वाक्य याद आता है जिसमे वह कहतें है कि– ‘अगर आप उसे पराजित करना चाहते हैं तो आपको उसकी यादाश्त को मिटा देना होगा, उसके भूत को नष्ट कर देना होगा, उसकी कहानियों को समाप्त कर देना होगा”।
तो हमें इस परम्परा को बचाना ही होगा क्योंकि पार्टनर यही पॉलिटिक्स है! रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स।

अभिषेक द्वारा लिखित

अभिषेक बायोग्राफी !

नाम : अभिषेक
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 198 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 371 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.