‘विभीषण’ केवल ‘घर का भेदिया’…? आलेख (अभिषेक प्रकाश)

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अभिषेक 68 2018-11-15

आज हम देख सकते हैं कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ किस तरह चाटुकारिता, स्वार्थलोलुपता व परिवारवाद के शिकार है।बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सच बोलने का साहस रखते है।हर युग मे ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने हितों से ऊपर उठकर सत्य का साथ दिया। सुकरात को जहर दिया गया, ब्रूनो को जिन्दा जलाया गया ।न जाने ऐसे ही कितने इंसान हुए है जिन्होंने सत्य के लिए अपनी आहुति दी।और जिस परंपरा को पीढी दर पीढी इंसानों ने आगे बढ़ाया।परन्तु इतिहास मे सभी के साथ न्याय हुआ हो जरूरी नही! विभीषण के साथ भी हमारे समाज ने कुछ ऐसा ही किया। ….. ‘अभिषेक प्रकाश’ का आलेख

‘विभीषण’ केवल ‘घर का भेदिया’…? 

अभिषेक प्रकाश

अभिषेक प्रकाश

‘विभीषण’ रामायण का एक ऐसा पात्र है जो मुझे भारतीय समाज की सत्यनिष्ठा मापने का एक मानक प्रतीत होता है।
वह उस राज्य का वासी है जहां के निवासी का जीवनस्तर समकालीन किसी भी राज्य के निवासियों की तुलना मे बेहतर है।जहां लोग सोने की लंका मे रहते है, औऱ उस राज्य की सीमाएं लगभग अभेद हैं।इतना ही नही विभीषण उस राज्य के महापराक्रमी,महविद्वान राजा का भाई भी है।इस नाते उसे दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं चुटकियों मे उपलब्ध है।

फिर भी विभीषण अपने भाई रावण का विरोध करता है यह जानते हुए कि उसके भाई ने अपनी बहन सूर्पणेखा के अपमान का बदला लेने के लिए राम की पत्नी सीता का अपहरण किया है।औऱ यह भी जानता है कि रावण ने सीता के साथ कोई जबरदस्ती नही किया है।आप कल्पना कीजिए कि आप दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान है और आपकी बहन का कोई अपमान करें तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? सामान्यतः आपके अन्दर का रावण जग सकता है!औऱ इसकी बहुत ही कम संभावना है कि आप इस पर तर्क करें कि आखिर गलती किसकी है? और गलती है भी तो उसके लिए न्यायोचित्त दण्ड क्या होना चाहिए।

विभीषण ने शायद अपने ऊपर भावुकता के अतिरेक को हावी नही होने दिया।रावण के निर्णय के विरोध के क्रम मे उसके मस्तिष्क ने राज्य की नीतियों को परिवार के हित से ऊपर रखा।उसने राजा या अपने भाई की चाटुकारिता नहीं की ,सत्य का पक्ष लिया। और एक विवेकशील सहयोगी की भूमिका निभाई।इस सत्यनिष्ठा के फलस्वरूप उसे अपने घर-परिवार अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा।अपने ही लोगों का कोपभाजन का शिकार होना पड़ा। आखिरकार जब उसे राज्य से निकाल दिया जाता है तब वह रावण की मृत्यु का भेद बताता है।वह अधर्म, असत्य औऱ बुराई के खिलाफ डटकर खड़ा होता है। लेकिन इसका ईनाम उसे मिलता है एक विश्वासघाती भाई, घर का भेदी एवं कुटिल सहयोगी के रूप मे।

साभार google

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विभीषण को मिला ईनाम ही हमारे समाज की ‘दृष्टि’ को परिभाषित करता है।हर विश्वासघाती हमारे लिए विभीषण है यह जानते हुए भी कि विभीषण का पक्ष सत्य का था। हमारे समाज ने विभीषण के तर्कशीलता,संवेदनशीलता एवं सत्यनिष्ठा की किस तरह हत्या की यह हमारे सामने है।बचपन से आज तक मैने किसी का नाम विभीषण नहीं सुना ।कारण बताने की जरूरत नहीं!
हमें कुम्भकर्ण स्वीकार्य है क्योंकि उसके विवेक और तर्कशीलता की सीमा भाई-भतीजावाद की दहलीज पार नही करता।वह बर्षो से निद्रा मे है और समाज मे चल रहे हलचल से अनजान है।वह प्रश्न जरूर खड़े करता है पर उसके प्रश्न धूल तो उड़ाती है लेकिन कोई परिवर्तन नही करती।अन्ततः वह फॉलो करता है।किसी को कुम्भकर्ण कहना मनोविनोद हो सकता है लेकिन विभीषण कहना उसकी निष्ठा पर प्रश्न खड़े करने जैसा है! निष्ठा जो आज भी हमारे समाज मे परिवारवाद के रूप मे दिखाई देती है।आज भी हम बिना सही-गलत के तर्क खड़े किए अपने निकटतम लोगों का बचाव करते है।वहां हम साधन की पवित्रता पर बात करने से बचते हैं।हम विभीषण नहीं बनना चाहते! शायद इतनी नैतिक ताकत हमारे पास नहीं है।

विभीषण राजा का भाई ही नही एक बुद्धिमान व तर्कवान सहयोगी भी था।वह आज की तरह ‘बॉस ईज अॉलवेज राईट’ वाला भाव नहीं रखता था क्योंकि वैभव,सुख,समृद्धि की लालच से हटकर उसके अपने नैतिक मूल्य कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण थे।एक स्त्री की पीड़ा के प्रति वह ज्यादा संवेदनशील था। वह राज्य के व्यापक हित को अन्य की अपेक्षा ज्यादा समझ रहा था।
आज हम देख सकते हैं कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ किस तरह चाटुकारिता, स्वार्थलोलुपता व परिवारवाद के शिकार है।बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सच बोलने का साहस रखते है।हर युग मे ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने हितों से ऊपर उठकर सत्य का साथ दिया। सुकरात को जहर दिया गया, ब्रूनो को जिन्दा जलाया गया ।न जाने ऐसे ही कितने इंसान हुए है जिन्होंने सत्य के लिए अपनी आहुति दी।और जिस परंपरा को पीढी दर पीढी इंसानों ने आगे बढ़ाया।परन्तु इतिहास मे सभी के साथ न्याय हुआ हो जरूरी नही! विभीषण के साथ भी हमारे समाज ने कुछ ऐसा ही किया।

सोचता हूं कि क्या होता अगर आज हम विभीषण होते ? मुझे लगता है कि हमारा लोकतंत्र ज्यादा मजबूत होता! हम ज्यादा मानवीय होते।यहां हर तीसरा जनप्रतिनिधि आपराधिक पृष्ठभूमि से नही होते औऱ ना ही माफियाओं के पीछे सैकड़ों गाड़ियों का काफिला होता।ना ही किसी भ्रष्टाचार मे लिप्त व्यक्ति को मंत्री बनाने का दबाव होता।और न ही स्त्री के प्रति हो रहे अमानवीय व्यवहार हमारे आचार-व्यवहार मे इस तरह शामिल होते।

क्योंकि तब हम अपनों से प्रश्न खड़े करने का साहस रखते।अन्याय के खिलाफ एकजुट हो पाते।पिता अपने पुत्र से पूछता कि तुमने यह गलती क्यों की।या पुत्र/पुत्री ये साहस रखते कि अपने माता-पिता की गलतियों पर अंगुली उठाते।लेकिन हममें से अधिकांश अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं।हमको भौतिकता ने इस कदर घेर रखा है कि हम विवेकशून्य होकर समझौते करते रहते है।ताकि हमारी सुख-सुविधा मे कोई अड़चन ना आ पाए।
लेकिन जिस समाज मे सच्चाई कमजोर होगी वहां ‘विभीषण’ केवल ‘घर के भेदिया’ के रुप मे ही याद किया जाएगा!

अभिषेक द्वारा लिखित

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