हमारे समय में कविता: रिपोर्ट (अन्तरिक्ष शर्मा)

रंगमंच साहित्यक गतिविधिया

अंतरिक्ष शर्मा 102 2018-11-16

हर वर्ष की भांति एक जनवरी २०१६ को कोवैलैंट ग्रुप ने अपना स्थापना दिवस अनूठे तथा रचनात्मक ढंग से उन युवा और किशोर प्रतिभाओं के साथ मनाया |जिनकी सामाजिक, साहित्यिक और कलात्मक प्रतिभाएं किसी मंच के अभाव में मुखर नहीं हो रहीं हैं | साथ ही ऐसे युवा और किशोर भी जो देश-दुनिया, समाज, साहित्य, कला और सामाजिक सरोकारों और जिम्मेदारियों से दूर महज़ किताबी शिक्षा को ही मनोरंजन और जिन्दगी मान कर जी रहे हैं | ‘रमाशंकर विद्रोही‘ और ‘सफदर हाशमी‘ को समर्पित कार्यक्रम ‘हमारे समय में कविता‘ की एक रिपोर्ट ‘अन्तरिक्ष शर्मा‘ की कलम से …|

हमारे समय में कविता  

अन्तरिक्ष शर्मा

1 जनवरी 2012 को कोवलेंट ग्रुप की स्थापना हुई थी। इसलिए हर वर्ष की 1 जनवरी कोवलेंट अपने स्थापना दिवस के रूप में मनाता है। कुछ युवा तथा किशोरों ने बच्चों के भीतर छुपी प्रतिभा को और निखारने हेतु मंच के अभाव के कारण और अपने में खोयी हुई, देश, विदेश, समाज, साहित्य, आर्ट, और समाज में अपनी जिम्मेदारियों से दूर, किताबी शिक्षा, मनोरंजन से भरी जिंदगी जी रहे युवा तथा किशोरों को एक मंच अथवा मार्गदर्शन प्रदान करने के विचार से इस ग्रुप का गठन किया। तो अपने चौथे स्थापना दिवस पर कल 1 जनवरी 2016 को एक बार फिर कोवलेंट ग्रुप ने हर बार की तरह नव वर्ष का आगमन एक नए ढंग से किया।
जी हाँ, कवि रमाशंकर विद्रोही जी को आज हमारे बीच कितने ही लोग नहीं जानते होंगे लेकिन कोवलेंट ग्रुप ने अपने स्थापना दिवस पर लोगों को उनके व्यक्तित्व, कविताओं और समाज में उनके योगदान को जानने की पहल की। कल कोवलेंट ग्रुप ने कवि ‘रमाशंकर विद्रोही’ और ‘सफदर हाशमी’ को समर्पित कार्यक्रम ‘हमारे समय में कविता’ का आयोजान हाइब्रिड सभागार में किया। सबसे पहले कार्यक्रम की शरुआत में कोवलेंट ग्रुप के उपाध्यक्ष अनिरुद्ध गुप्ता ने कोवलेंट ग्रुप का परिचय विस्तार से दिया और उसके तत्पश्चात संरक्षक अंतरिक्ष शर्मा ने कोवलेंट के विस्तृत इतहास और गतिविधियों से अवगत कराया और बताया कि कोवलेंट ने पिछले 4 वर्षों में जो कुछ भी किया वो सराहनीय इसलिए है क्योंकि कोवलेंट युवा तथा किशोरों का संगठन है, वो युवा जो तमाम अवरोधकों से घिरे हैं, जैसे- स्कूल, ट्यूशन, हर महीने परीक्षाएं, अभिभावकों की पाबन्दी आदि। जिन्हें कुछ रचनात्मक व साहित्यिक करने के लिए भी काफी सोचना पड़ जाये। तो ऐसी व्यवस्था में वो जितना कुछ भी कर पाएं हैं वो काबिल-ए-तारीफ़ है। 
उसके बाद रंगकर्मी एम. सनीफ मदार ने विद्रोही जी और सफ़दर हाशमी जी का संक्षिप्त परिचय दिया।

लगभग 2 घंटे के इस कार्यक्रम में कोवलेंट ग्रुप के कुछ साथी जैसे आशिका शिवांगी सिंह, देव सारस्वत, अंतरिक्ष शर्मा, किशन सिंह, कपिल कुमार, नीरज कुमार, अरबाज़ खान ने मात्र दो दिनों में कलीम जफ़र के संरक्षक में कविताओं को तैयार कर, उनका सचरित्र मंचन किया।
कविताओं के इस मंचन में ‘रमाशंकर विद्रोही’ की कविता ‘एक औरत की जली हुई लाश’ ,’औरतें’, और ‘नूर मियाँ’, ‘वीरेन डंगवाल’ की ‘मैं मारा गया’, ‘इतने भले न बनना साथी’ और ‘रामसिंह’, ‘मज़कूर आलम’ की ‘ये चुप्पी’, ‘जिजीविषा रजनी’ की ‘सदाशयता’, ‘देव सारस्वत’ की ‘अफज़ल काका’, ‘आशिका सिंह’ की ‘लाइट स्टैंड’, ‘पाश’ की ‘सबसे खतरनाक’ और ‘हम लड़ेंगे साथी’, ‘जोस दी दयागो’ की ‘मैं मारा गया’ आदि कविताएँ शामिल थीं।

मंचन के बाद कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लेखक व हमरंग.कॉम के संपादक ‘एम. हनीफ मदार’ ने रमाशंकर विद्रोही जी की कविताओं का सही मूल्यांकन कर लोगों को उनके व्यक्तित्व के बारे में परिचित कराया। और कहा कि “किसी भी शब्द को बोलने से पहले हमे उस हर शब्द का सही अर्थ पता होना चाहिए जो हम यहाँ बोलने जा रहे हैं तभी हम उसको पूरे हाव-भाव के साथ बोल सकते हैं, जो कि यहाँ मंचन में शामिल हर एक बच्चे ने किया”। और अंत में उन्होंने कुछ ग़ज़ल व कविताएं दर्शकों को पढ़ के सुनायीं जो भले ही लिखी गयी सालों साल पहले हों लेकिन आज भी वो व्यवस्था पर उतनी ही चोट और सत्य को उजागर करती हैं। जैसे ‘दुष्यंत कुमार’ की ग़ज़ल ‘साये में धूप’-

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की,
ये एहतियात ज़रुरी है इस बहर के लिए।

एवं अदम गोंडवी व नागार्जुन की कविता के साथ अपनी बातों को विराम दिया।
उसके बाद कवियत्री और हमरंग.कॉम की सहसंपादक ‘अनीता चौधरी’ ने अपनी दो कविताओं का पाठ किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कोवलेंट ग्रुप की अध्यक्ष आशिका सिंह ने दर्शकों का आभार प्रकट कर धन्यवाद यापन करके कार्यक्रम का समापन किया और इसी के साथ अंत में चाय की चुस्की के साथ कोवलेंट के साथी दीपक निषाद की कविता ‘इस्क्रा’ का पाठ किया गया। कार्यक्रम का संचालन अभीप्सा शर्मा और आशिका सिंह ने किया।
कार्यक्रम में कलीम ज़फर, पुलकित फिलिप, अयान मदार, आशिया मदार, जफर अंसारी, नंदिनी, कृतांशु, अखिलेश, सोनवीर, दीपक, तनु, पूनम, एम0 सनीफ मदार, अनीता चौधरी, एम0 गनी आदि ने अपना योगदान रहा |

अंतरिक्ष शर्मा द्वारा लिखित

अंतरिक्ष शर्मा बायोग्राफी !

नाम : अंतरिक्ष शर्मा
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 135 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 95 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 153 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 172 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 273 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.