किस्‍से किताबों के: “पहली क़िस्त” (सूरज प्रकाश)

बहुरंग किस्से ‘सूरज प्रकाश’ के

सूरज प्रकाश 154 2018-11-17

“किस्से किताबों के” की पहली क़िस्त में ‘सूरज प्रकाश जी’ के कुछ नोट्स (भूमिका) के साथ आज प्रस्तुत हैं दो किस्से ….. (हिंदी के वरिष्ठ कथाकार ‘सूरज प्रकाश’ की साहित्यिक अनुभव की कलम से निकले ‘किस्से किताबों के’ और ‘किस्से लेखकों के’ विषयक सैकड़ों छोटे बड़े आलेख जो न केवल प्रासंगिक ही हैं बल्कि बेहद रोचकता लिए हैं | आपके इन आलेखों की कुछ किस्तें आपकी फेसबुक वाल के अलावा प्रिंट मीडिया पर भी चर्चित रही हैं. सूरज प्रकाश के लिखे वे सभी लेख किस्तों के रूप में humrang पर हर हफ्ते प्रकाशित होते रहेंगे | हमरंग के पाठकों के लिए सूरज प्रकाश के ये नोट्स साहित्यिक चर्चा के लिए नई उर्जा के वायस तो होंगे ही साथ ही यह उम्मीद भी रहेगी कि साहित्येत्तर विधाओं से भी हिंदी जन-मानस रूबरू हो………….संपादक)

हम कौन सी किताबें पढ़ते हैं- कुछ नोट्स

सबसे ज्‍यादा वे किताबें पढ़ी जाती हैं जो पाठक कहीं से चुरा कर लाता है। किताब चुराने का जोखिम तभी उठाया जायेगा जब किताब नजर तो आ रही हो लेकिन हमारे पास न हो। कई बड़े लेखक किताब चोर रहे हैं। ये एक कला है।
फिर उन किताबों का नम्‍बर आता है जिन्‍हें हम उधार मांग कर तो लाते हैं लेकिन वापिस नहीं करते। करना ही नहीं चाहते। जिसके यहां से उधार लाये थे, उसके घर आने पर छुपा देते हैं।
फुटपाथ पर बिक रही अचानक नज़र आ गयी वे किताबें भी खूब पढ़ी जाती हैं जिनकी हम कब से तलाश कर रहे थे।
पूरे पैसे दे कर खरीदी गयी किताबें भी अपना नम्‍बर आने पर आधी अधूरी पढ़ ही ली जाती हैं।
लाइब्रेरी से लायी गयी किताबें पूरी नहीं पढ़ी जातीं और उन्‍हें वापिस करने का वक्‍त आ जाता है।
रोज़ाना डाक में उपहार में आने वाली या किसी आयोजन में अचानक लेखक के सामने पड़ जाने पर भेंट कर दी गयी किताबें कभी नहीं पढ़ी जातीं। कई बार तो भेंट की गयी किताबें भेंटकर्ता के जाते ही किसी और पाठक के पास ठेल दी जाती हैं। वह आगे ठेलने की सोचता रहे या बिन पढ़े एक कोने में रखे रहे।
कोर्स की किताबें पढ़ने में हमारी नानी मरती है और समीक्षा के लिए आयी किताबें भी तब तक पढ़े जाने का इंतज़ार करती रहती हैं जब तक संपादक की तरफ से चार बार अल्‍टीमेटम न मिल जाये। तब भी वे कितनी पढ़ी जाती हैं। हम जानते हैं।
पुस्‍तक मेलों में खरीदी गयी किताबें भी पूरे पढ़े जाने का इंतज़ार करते करते थक जाती हैं और अगला पुस्‍तक मेला सिर पर आ खड़ा होता है।
यात्रा में टाइम पास करने के लिए स्‍टेशन, बस अड्डे या एयरपोर्ट पर खरीदी गयी किताबें यात्रा में जितनी पढ़ ली जायें, उतना ही, बाकी वे कहीं कोने में या बैग ही में पड़े-पड़े अपनी कहानी का अंत बताने के लिए बेचैन अपने इकलौते पाठक को वक्‍त मिलने का इंतज़ार करती रहती हैं।
हर व्‍यक्‍तिगत लाइब्रेरी में लगातार कम से कम 40 प्रतिशत ऐसी अनचाही किताबें जुड़ती जाती हैं, जो एक बार भी नहीं खुलती। इनमें किताबों का कोई कसूर नहीं होता जितना उनका गलती से वहां पहुंच जाने का होता है।
ये मेरे नोट्स हैं। आपके अनुभव निश्‍चित रूप से अलग हो सकते हैं। जानना रुचिकर होगा….

किस्‍से किताबों के – किस्‍सा एक

imagesGeorge Bernard Shaw

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ एक दिन फुटपाथ पर लगे किताबों के ठीये के पास से गुज़र रहे थे तो उन्‍हें सामने पुरानी किताबों के ढेर में अपनी एक किताब नज़र आयी। उनकी यह देखने की उत्‍सुकता स्वाभाविक थी कि इस किताब का फुटपाथ तक पहुंचने का रूट क्‍या रहा होगा। उन्‍होंने किताब उठायी तो देखा कि अरे, ये प्रति तो वे अरसा पहले एक मित्र को भेंट कर चुके थे और उस पर उनका खुद का लिखा सप्रेम भेंट और उनके हस्ताक्षर भी हैं। उन्‍होंने किताब वाले से पूछा कि कितने में दी ये किताब तो उसने बताया एक पाउंड। बर्नार्ड शॉ बिगड़े – लूट मचा रखी है क्‍या, ये मेरी लिखी किताब है और तू एक पाउंड मांग रहा है, ला दे बीस पेंस में। और वे उसे रेजगारी थमा के किताब घर ले आये। आराम से बैठ कर किताब साफ की। पहली भेंट के नीचे लिखा, तुम्‍हें पुनः भेंट प्रिय मित्र, उस पर हस्ताक्षर किये, तारीख डाली और नौकर के हाथ किताब उस अभागे मित्र के पास दोबारा भिजवा दी।

किस्‍से किताबों के – किस्‍सा  दो

 

45 बरस बाद मिला किताब को उसका पहला पाठक लेकिन उसे किताब नहीं दी गयी

बात 2008 की है। तब मैं पुणे में था और मेरे कथाकार मित्र राज कुमार राकेश शिमला में थे। संयोग से हम दोनों ही उस समय (एक दूसरे की जानकारी के बिना) बर्ट्रेंड रसेल की आत्‍म कथा पढ़ रहे थे। किताब की भूमिका लिखी है माइकल फुट ने। 95 वर्षीय फुट इंगलैंड के जाने माने लेखक, पत्रकार और सुदीर्घजीवी एमपी रहे हैं। बर्ट्रेंड रसेल को 1950 में नोबेल पुरस्‍कार मिला था। 
अब जी, राकेश जी को तलब लगी कि बर्ट्रेंड रसेल साहब की लिखी किताब अन्‍आर्मड विक्‍टरी पढ़ें। ये किताब बहुत कुछ समेटे हुए है। चीन युद्ध को ले कर नेहरू, चाऊ एन लाई और बर्ट्रेंड रसेल के बीच हुई खतो-किताबत, क्‍यूबा मसले पर कमेंटरी और अमेरिका और रूस की दादागिरी के भीतरी किस्‍से। 1963 में छपी ये किताब भारत में आयी लेकिन तुरंत बैन कर दी गयी थी। किताब मिली नहीं कहीं भी उन्‍हें। दिल्‍ली तक पूछ के देख लिया। मुझसे कहा तो मैंने अपनी लाइब्रेरी, ब्रिटिश लाइब्रेरी और लैंड मार्क सब जगह तलाशी, किताब नहीं ही मिली। भला 1963 में छपी और प्रतिबंधित किताब इतनी आसानी से थोड़े ही मिलेगी।
अचानक उन्‍हें सूझा और वे गाड़ी उठा कर सीधे शिमला स्थित इंस्‍टीट्यूट ऑफ एडवांस स्‍टडीज में जा पहुंचे। किताब वहां थी। निकलवायी गयी। राकेश जी खुश लेकिन लाइब्रेरियन जी खुश नहीं। उन्‍होंने किताब देने से मना कर दिया कि नहीं दे सकते। डाइरेक्‍टर, कोई फैकल्‍टी, रिसर्च स्‍कालर, फैलो या स्‍टाफ ही इस किताब की कभी भी मांग कर सकता है। हम उनकी अनदेखी करके बाहर वाले को किताब कैसे दे सकते हैं। झगड़े और मारपीट की नौबत आ गयी। आखिर एक संकाय सदस्‍य के बीच बचाव करने पर राकेश को किताब दिखायी गयी। किताब देखते ही सब के मुंह पर ताला लग गया। यह किताब संस्थान द्वारा 1963 में खरीदी गयी थी और इस घटना के दिन तक यानी पिछले 45 बरस में एक बार भी जारी नहीं करायी गयी थी।
बेचारे बर्ट्रेंड रसेल और बेचारी उनकी किताब ‘अन्‍आर्मड विक्‍टरी’। लेकिन हमारे राकेश जी भी कम नहीं। किसी तरह से स्‍टाफ के नाम से किताब जारी करवायी और रातों रात उसकी फोटो कॉपी करके अपनी जिद पूरी की। किताब उनके अनमोल खजाने में है।

सूरज प्रकाश द्वारा लिखित

सूरज प्रकाश बायोग्राफी !

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सूरज प्रकाश का जन्म उत्‍तराखंड (तब के उत्तर प्रदेश) के देहरादून में हुआ था। सूरज प्रकाश ने मेरठ विश्‍व विद्यालय से बी॰ए॰ की डिग्री प्राप्त की और बाद में उस्‍मानिया विश्‍वविद्यालय से एम ए किया। तुकबंदी बेशक तेरह बरस की उम्र से ही शुरू कर दी थी लेकिन पहली कहानी लिखने के लिए उन्‍हें पैंतीस बरस की उम्र तक इंतजार करना पड़ा। उन्होंने शुरू में कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं और फिर 1981 में भारतीय रिज़र्व बैंक की सेवा में बंबई आ गए और वहीं से 2012 में महाप्रबंधक के पद से रिटायर हुए। सूरज प्रकाश कहानीकार, उपन्यासकार और सजग अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं। 1989 में वे नौकरी में सज़ा के रूप में अहमदाबाद भेजे गये थे लेकिन उन्‍होंने इस सज़ा को भी अपने पक्ष में मोड़ लिया। तब उन्‍होंने लिखना शुरू ही किया था और उनकी कुल जमा तीन ही कहानियाँ प्रकाशित हुई थीं। अहमदाबाद में बिताए 75 महीनों में उन्‍होंने अपने व्‍यक्‍तित्‍व और लेखन को संवारा और कहानी लेखन में अपनी जगह बनानी शुरू की। खूब पढ़ा और खूब यात्राएं कीं। एक चुनौती के रूप में गुजराती सीखी और पंजाबी भाषी होते हुए भी गुजराती से कई किताबों के अनुवाद किए। इनमें व्‍यंग्य लेखक विनोद भट्ट की कुछ पुस्‍तकों, हसमुख बराड़ी के नाटक ’राई नो दर्पण’ राय और दिनकर जोशी के बेहद प्रसिद्ध उपन्‍यास ’प्रकाशनो पडछायो’ के अनुवाद शामिल हैं। वहीं रहते हुए जॉर्ज आर्वेल के उपन्‍यास ’एनिमल फॉर्म’ का अनुवाद किया। गुजरात हिंदी साहित्‍य अकादमी का पहला सम्‍मान 1993 में सूरज प्रकाश को मिला था। वे इन दिनों मुंबई में रहते हैं। सूरज प्रकाश जी हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी भाषाएं जानते हैं। उनके परिवार में उनकी पत्‍नी मधु अरोड़ा और दो बेटे अभिजित और अभिज्ञान हैं। मधु जी समर्थ लेखिका हैं।


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