“हमरंग” की टीम से एक खुशनुमा भेंट: (सीमा आरिफ़)

बहुरंग टिप्पणियां

सीमा आरिफ 85 2018-11-17

हमरंग का एक वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्रयास को लेकर हो सकता है आपकी भी कोई दृष्टि बनी हो तो नि-संकोच आप लिख भेजिए हम उसे भी जस का तस हमरंग पर प्रकाशित करेंगे | इस क्रम में आज ‘सीमा आरिफ़ … | – संपादक

“हमरंग” की टीम से एक खुशनुमा भेंट  

सीमा आरिफ़

सीमा आरिफ़
जन्म-10 दिसम्बर 1986 उत्तर प्रदेश ( ज़िला बिजनौर)
जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन एवं जर्नलिज्म में डिप्लोमा PSBT की डॉक्यूमेंट्री फिल्म -“There is something in the Air” में अभिनय ( फिल्म 2011 में केरल फिल्म और कोरियन फिल्म फेस्टिवल द्वारा राष्ट्रीय फिल्म पुस्कार से सम्मानित)
तीन वर्ष तक नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में लेखन
विभिन्न मैगज़ीन,न्यूज़ पेपर्,पोर्टल में लेखक के रूप में सक्रीयहिंदी एडिटर के रूप में दिल्ली में कार्यरत
D 94/ 10 प्लाट नंबर 44 ,ज़ाकिर नगर,
दिल्ली 110025

मैं पिछले दो तीन वर्षों से विभिन्न समाचार पत्रों, मैगज़ीन में अलग अलग तरह के विषयों पर आर्टिकल-लेख लिख रही थी, काफ़ी वक़्त तक ब्लॉगर के तौर पर भी एक दो हिंदी समाचार पत्रों के ऑनलाइन संस्करण के लिए लिखा.

लेखन में गहरी दिलचस्पी कॉलेज के वक़्त से थी यदि किसी अख़बार के छोटे से कोने में एक “लेटर तो एडिटर” भी छप जाता था तो एक अजीब सी आत्मसंतुष्टि का भाव मन में गोते लगाने लगता था और आगे और बेहतर लिखने के लिए प्रेरणा मिलती थी.

पिछले कुछ समय से मेरी कलम के मूड ने एक नया रास्ता पकड़ा है और वो रास्ता है कविताओं के माध्यम से अपनी भावनाओं, ख़्यालों का इज़हार करने का,  तो सोशल मीडिया आप को अभिव्यक्ति की फुल आज़ादी देने के साथ साथ ढेर सारे फ्रेंड्स-फोल्लोवेर्स और एक पहचान भी देता है, लेकिन किसी भी लेखक के लिए सबसे ज़्यादा ख़ुशी का पल होता है जब किसी अच्छी वेबसाइट, पेज, एवं अन्य ऑनलाइन साइट्स पर उसका लेख, रचना प्रकाशित हो, उसके लिए यह पल “Wow-ohh my God” जैसा होता है.

सो हमरंग.कॉम पर प्रथम बार मेरी कविता का प्रकाशित होना मेरे लिए बेहद ख़ुशी वाला लम्हा  था, उससे जुड़ा वाकया भी बड़ा दिलचस्प है, हुआ यूँ कि किसी एक फेसबुक दोस्त ने बातों बातों में ही ज़िक्र करते हुए बताया कि आपकी एक वेबसाइट पर फलां-फलां कविताएँ पढ़ी, बहुत अच्छा लिखा है आपने, मेरे लिए उस दोस्त से यह सवाल करना कि कब, कहाँ छपी ? थोड़ा सा अटपटा होता, सो मैंने खुद ही ढूँढना शुरू किया, जब देखा कि हमरंग.कॉम पर मेरी रचनाओं को जगह मिली तो, यकीन मानिए मैं उस समय ख़ुशी से झूम उठी, इस वेबसाइट पर लिखने के बाद तो फेसबुक पेज पर फ्रेंड रिक्वेस्ट की जैसे बाड़ सी आ गई, लोगों ने मेरी कविताओं को काफ़ी सराहा फ़िर क्या था मुझे भी और बेहतर, अच्छा लिखने का जोश मिलने लगा, मेरी कविता लिखने की कला में थोड़ी और गहराई-अर्थ पैदा होने लगे | पहले से और परिपक्वता आयी | उसके बाद कई बार हमरंग.कॉम ने मेरी रचनाओं को अपनी वेबसाइट पर जगह दी, जिसके लिए मैं हमरंग की पूरी टीम को अपने इस लेख के माध्यम से शुक्रिया कहना चाहूंगी |

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हमरंग.कॉम की जो बात मुझे सबसे ज़्यादा अपनी ओर खींचती है वो है कि यहाँ पर आप को साहित्य-कला से सम्बंधित बेहद उम्दा और अच्छा पढ़ने को मिलता है | मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि साहित्य-कला में अच्छे-बुरे जैसा कोई मापदंड भी है पर इन्टरनेट क्रांति के आने के उपरांत सोशल मीडिया, विभिन्न वेबसाइट पर हर तरह का साहित्य आप के सामने परोसा जा रहा है |

मैंने नोटिस किया कि हमरंग.कॉम हमेशा ही ज्ञानवर्धक, सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेख, कविताएँ, ड्रामे, समीक्षाएं, साक्षात्कार, ग़ज़लें, लघु कहानियां आदि आदि पढ़ने का अवसर पाठकों को प्रदान करता है | यह पाठक पर भी उतना ही निर्भर करता है कि वो कौन से टाइप के लेखन को पढ़ कर आगे बढ़ना चाहता है |

खैर तो, हमरंग.कॉम के संपादक हनीफ़ मदार और अनीता चौधरी जी से फेसबुक पर ही कभी कभी काम से सम्बंधित बातें होती थी | बातों का सिलसिला आगे बढ़ा तो मैंने एक दिन सम्पादक हनीफ़ मदार जी से मज़ाक़-मज़ाक़ में मथुरा आने की इच्छा ज़ाहिर की, जिस पर उन्होंने सहर्ष मुहर लगाते हुए मथुरा आने का न्योता दे दिया | मैं इससे पहले कई वर्ष पूर्व एक बार कॉलेज की तरफ़ से मथुरा जा चुकी थी और मथुरा को लेकर हम लोगों ने एक इमेज सेट की हुई थी जिसका ज़िक्र मौक़ा मिला तो फ़िर कभी करुँगी | हाँ, लेकिन यह भी इल्म नहीं था कि कब जाना होगा, बस मन में था कि हाँ कभी मौक़ा मिला तो एक दफ़ा हमरंग.कॉम की टीम से ज़रूर मिलूंगी |

अगर आपका इरादा पक्का हो तो हर चीज़ मुमकिन हो जाती है | इतेफाक़ से, मेरा अगले ही माह मथुरा जाना हुआ | मैं हनीफ़ जी, अनीता जी तथा अन्य साथियों से मिली | मुझे एक लम्हे को भी यह एहसास नहीं हुआ कि मैं इन सब लोगों से पहली बार मिल रही हूँ, या यूँ कहें कि ऐसा लगा जैसे मैं रोज़ ही हमरंग के इस छोटे से, पर बेहद खुशनुमा दफ़्तर में आकर बतियाती हूँ | घंटों यहाँ पर होने वाली गतिविधियों, संगोष्ठियों में हिस्सा लेती हूँ |

20150927_152008हमरंग.कॉम का दफ़्तर, अपने लफ़्ज़ों में कहूँ तो किसी भी प्रकार की शोबाज़ी से कोसों दूर बेहद सादा और नार्मल था | हम दिल्ली वालों के लिए ऑफिस का अर्थ एक प्रॉपर सेटअप के साथ साझी-धजी बड़ी सी बिल्डिंग, ऑफिस होती है पर यहाँ आकार देखा और समझा कि अगर इन्सान में कुछ करने की लगन और दिलचस्पी हो तो उसके लिए किसी तामझाम की कोई ज़रुरत नहीं है | बस काम को करने के लिए दिल में जज़्बा और नेक नियत होनी चाहिए.

हनीफ़ मदार जी के मन में कला-साहित्य-रंगमंच को लेकर एक ख़ास कोना है जिसे वो अपने इस प्रयास के ज़रिए हमेशा कायम रख सकें ऐसी मेरी कामना है.

हमरंग के संपादकों का यह प्रयास रहता है कि ज़्यादा से ज़्यादा नव-लेखकों, युवा रचनाकारों को इस प्लेटफार्म पे अपनी बात कहने, अपने भावों को अभिव्यक्त करने का मौक़ा मिले, बशर्त कि उनकी रचनाएँ, लेख भेड़-चाल की दौड़ से परे हों, उनकी रचनाएं किसी जल्दी में न लिखी गयी हों, उसमें कुछ अलग बात हो कुछ ऐसा हो जिसमें समाज के यथार्थ की झलक निकलकर आए.

साहित्य-कला, रंगमंच को लेकर हमरंग.कॉम की टीम का जो एक साफ़ नज़रिया और निश्छल प्रेम का भाव है उसे देखकर सुखद एहसास होता है, यह एक सकारात्मक संकेत है कि साहित्य ख़ासकर हिंदी साहित्य के सुस्त पड़ चुके क़दम और मध्यम गति से साँस लेती धडकनें कुछ चुनिंदा ही सही व्यक्तियों के हाथों में तो हैं.

उम्मीद के साथ साथ दुआ करती हूँ कि हमरंग.कॉम की टीम द्वारा जो सार्थक कदम उठाया गया है वो आगे भी ऐसे ही कामयाबी के साथ बढ़ता जाए ताकि हिंदी भाषा से जुड़े हर शख्स को उम्दा साहित्य-कला रंगमंच पढने-देखने का मौक़ा बदस्तूर मिलता रहे….

सीमा आरिफ द्वारा लिखित

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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सम्पर्क सूत्र

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संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
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