अमृतसर टू कनेडा : लघुकहानी (अमिता महरौलिया)

कथा-कहानी लघुकथा

अमिता 153 11/17/2018 12:00:00 AM

‘‘मुंडा सिंगापुर दा है ओथे ही एक छोटा जिहालया होया है। मुंडा जाट्ट है, मैं देख लिया है तुसी बस हां करो जी!’’ मनप्रीत लस्सी का गिलास रखते बोली… ‘‘जी गीत ता एकदम गां वरगी है। बस तुसी भी हां करो जी।’’ …अरे भाई तुम हां कहो, डाॅलर में कमांदा है और की चाहिंदा।…….

अमृतसर टू कनेडाamita

अमृतसर में रहने वाले गुरदास सिंह और मनप्रीत की प्रबल इच्छा थी कि उसकी बेटी गीत की शादी किसी एनआरआई लड़के से हो। वैसे यह इच्छा प्रत्येक मां-बाप के लिए पंजाब में आम बात है। यहाँ प्रत्येक परिवार का एक सदस्य ज्यादातर विदेश में ही रहता है। एक दिन सुखबीर बिचैलिया (बचोला) गुरदास के पास आया … ओए मानवीर जी की हालचाल जी!
‘‘वदिया तुसी दसो … ओर गीत दी मां कुछ लस्सी-वस्सी का प्रबंध कर साडे घार सुखवीरा आया है।’’
गुरदास भाई ‘‘मैं गीत के लिए बहुत सोना रिश्ता लाया हूँ। हाँ बोलो ते आज ही गल वदाऊँ।… क्या देश है स्वर्ग है। हर किस्म की सुविधा, अनुशासन, कहीं निर्धनता नहीं बेहद सुंदर। बेटी विदेश जाएगी तो आप लोग भी इसी बहाने कभी घूम फिर आओगे।’’
बहुत चंगा, मुंडा रहंदा किथे है??
‘‘मुंडा सिंगापुर दा है ओथे ही एक छोटा जिहालया होया है। मुंडा जाट्ट है, मैं देख लिया है तुसी बस हां करो जी!’’
मनप्रीत लस्सी का गिलास रखते बोली… ‘‘जी गीत ता एकदम गां वरगी है। बस तुसी भी हां करो जी।’’
…अरे भाई तुम हां कहो, डाॅलर में कमांदा है और की चाहिंदा।
भाई फिर भी??
अरे! गुरदास वीर जी मुंडा बहुत वढ़िया है?
‘‘आज ड्राइवर है ते की होया, एक दिन उसका खुद दा गड्डिया का काम होएगा। और मुुंडा है ते एनआरआई… हुन दसो, तुसी ते गल आगे वदाऊँ।…’’
गुरदास सिंह ने हाथ जोड़ते हुए कहा ‘‘भाई कोई ओर रिश्ता बताओ।’’
हमारे समाज में एक मां-बाप के लिए बेटी के लिए लड़का ढूंढना, सच कहूँ तो किसी उपेेपवद से कम नहीं।
आखिरकार एक दिन बाबा जी ने उनकी सुन ही ली। मनप्रीत की बहन के पति के आॅफिस में एक सहकर्मी का बेटा कनेडा रहता था। उन्हें बहु भारतीय परिवेश की ठेठ पंजाबी लड़की चाहिए थी। एक दिन गुरदास सिंह, लड़के के पिता नूरसिंह से मिले। दोनों ने बात की, और बात ठीक लगी तो दोनों ने रिश्ता पक्का कर दिया।
दलजीत भी मां-बाप को खुश करने के लिए राजी हो गया। बेटे ने जल्दी जाना था। सो शादी भी जल्दी करनी पड़ी। गुरदास सिंह ने बेटी को हर संभव सामान दिया। सोचा बेटी तो पति के साथ विदेश निकल जाएगी, सामान तो लेके क्या जाएगी। कम से कम सास-ससुर खुश रहेंगे। दलजीत अपने माता-पिता और गीत को जल्दी बुलाने का आश्वासन देकर कनाडा चला गया।
दिन-महिने बीतने लगे। लेकिन गीत का वीजा नहीं बन पा रहा था। दलजीत का पहले रोज़ फोन आता था फिर धीरे-धीरे वह भी कम हो गया। एक दिन गुरदास सिंह, नूर सिंह के पास गया…
‘‘की वीर जी किदो तक बुलाया है गीत को दलजीत ने अपने पास?’’
इतने में नूर हकलाते हुए बोला- ‘‘क्या है कि गुरदास वीर जी दरअसल हमने उसकी शादी जबर्दस्ती की थी। वह करना नहीं चाहता था।… हमारा स्वार्थ था। सालों विदेश रहते-रहते वह विदेशी हो गया था। और हम अपने देश, परिवेश की लड़की लाना चाहते थे। गलती हमारी है। हमें माफ कर दो। हम मजबूर है, जो सामान, आप लोगों ने दिया है, वह आप वापिस ले जा सकते हो।’’ गुरदास सिंह और मनप्रीत एक दूसरे का मुँह देखे रह गए।

अमिता द्वारा लिखित

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