बदनाम गलियों में सिसकती कहानियां: आलेख (अमृता ठाकुर)

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अमृता 105 2018-11-17

रात के स्याह अँधेरे में कुचली हुई नागिन सी बिछी सड़कें जितनी काली दिखतीं हैं, दिन के उजाले में भी ये उस कालिख को नहीं छोड़ पातीं, मानो ये शर्मशार हों मानवीय दुनिया के उन कृत्यों और व्यवस्थाओं से जिनकी ये सड़कें न केवल साक्षी हैं बल्कि अनेक रूढ़ीवादी मान्यताओं में जकड़ी सामाजिकता से अभिशप्त ज़िंदा कहानियाँ, इनके भीतर आज भी सिसक रही हैं | दिल्ली में ‘श्रद्धानन्द या महात्मा गांधी रोड़’ नाम से जानी जाने वाली सड़क जिसे आमतौर पर लोग जी० बी० रोड़ के नाम से जानते हैं, भी इन्हीं सड़कों में से एक है | जहाँ एक तरफ सड़क के किनारे आकाश छूती इमारतों में गौरवशाली सभ्यता की खिलखिलाहटें हैं तो नीचे ठेले, रिक्शों पर भी आधुनिकता की रफ़्तार के शोर की परत है, विकास के नारे हैं, वादे हैं वहीँ दूसरी तरफ की पहली मंजिल तक इन नारों या वादों की आवाज़ भी जाने से कतराती है | वहाँ जिश्म की नुमाइश है, खिडकियों के झरोखों से झांकते कुछ मायूस और वेवस चेहरे हैं जिनसे खेलना तो मानसिक समझ है किन्तु स्वीकारोक्ति में बदनुमा दाग | वहाँ हर जिश्म की कीमत उम्र से है, पाने को भले ही शारीरिक सुकून है किन्तु देने को वही हिक़ारत, नफ़रत और घृणा | इन अँधेरी गलियों में कुछ ज़िंदा कहानियों से मुलाक़ात की “अमृता ठाकुर” ने …..| – संपादक

बदनाम गलियों में सिसकती कहानियां 

अमृता ठाकुर

अमृता ठाकुर

दिन का समय है, कुछ स्कूली बच्चों का समूह एक- दूसरे को धकियाता, चुहलबाजी करता आगे बढ़ रहा है, आपस में कुछ फुसफुसाहट फिर एक खिलखिलाहट के साथ ऊपर की खिड़की की  तरफ सबने नजर डाली | अनारकली डिस्को चली, चली रे…… एक चौदह पंद्रह साल के लड़के ने दबे होठों से गाने की कुछ पंक्तियाँ ऊपर खुली खिड़की की तरफ उछाल दीं और खिलखिलाते हुए आगे बढ़ गया | खिड़की पर थोड़ी हलचल सी लगी | मैं बच्चे की ओर थोड़े गुस्से से देखती हूँ, बच्चा थोड़ा शर्मिन्दा होता हुआ अपने रास्ते निकल लेता है | मैं सड़क को पार करके सामने की इमारत की ओर जाती हूँ | थोड़ी हिचकिचाती, डरती हुई, दुकानों के बीच बने एक गलीनुमा दरवाजे में प्रवेश करती हूँ | सीढ़ियों पर घुप्प अन्धेरा है और बिलकुल सीधी सीढियां है, बहुत कुछ कुतुबमीनार के अन्दर बनी सीढ़ियों जैसी | पजामा कुर्ता पहने हुए एक आदमी बगल से सर्र से निकलता है | मैं थोड़ा घबराई, शराफत वाला भाव लाने की कोशिश करती हूँ, तथाकथित अच्छे घर की लड़कियों वाली शराफत | डर था कहीं उनकी तरह ही मुझे न समझ लिया जाए | फिर अपनी सोच पर खुद शर्मिंदा हुई | शराफत के नाटक को झाड़ती हुई ऊपर पहुँचती हूँ | वैसा तो कुछ भी नहीं था जैसा फिल्मों में दिखाते है | दो अधेड़ उम्र की और एक तेईस- चौबीस साल की महिला घर के बरामदेनुमा हिस्से में बैठी हुई थीं | अजीब सा बरामदा | ये महिलायें बैंचों पर बैठी ग्राहकों का इन्तजार कर रही थीं और बरामदा जैसे बर्षों से धूप का इन्तजार कर रहा हो | मुझे देखते ही तेईस- चौबीस साल की वह लड़की शरमा कर अन्दर की तरफ भाग गयी | एक सज्जन अन्दर से निकल कर आये और मुझे अन्दर के कमरे में ले गए | बाहर बैठी महिलाओं में से एक अन्दर आती है और मुस्करा कर मेरी तरफ देखती है, आँखों में वही भाव ‘पूछिए ! क्या पूंछना चाहती हैं ?’

विमला – 

google से साभार

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बयालीस साल की विमला कहती है ‘अब तो वही ग्राहक आते है जिनके पास कम पैसा होता है कि किसी जवान लडकी के पास नहीं जा सकते या वो जो पुराने ग्राहक है, जिन्हें हमारे साथ की आदत हो गई | लेकिन उम्र के साथ ये भी खत्म हो जाएगा |’ ये ग्राहक कितने पैसे दे देते हैं ? मेरे इस सवाल पर कहती है – ‘कितना देंगे, कोई साठ दे देता है, कोई चालीस, कोई उससे भी कम, और दिन भर में एकाध आ जाते हैं |’ रेड लाइट एरिया में भी बाजार का सीधा-सपाट सिद्धांत काम करता है | जिस वस्तु की जितनी उपयोगिता उस वस्तु की उतनी कीमत | इस बाजार में बत्तीस साल गुजार चुकी विमला अब जिन्दगी के ढलान पर है | कल तक जिस जिस्म की ऊँची से ऊँची बोली लगाई जाती थी, आज एक-एक ग्राहक के लिए तरस रही है | ऊपर से बुढ़ापे का खौफ | विमला कहती है, ‘यहाँ उम्र ढली नहीं कि कोई आपको पूछने वाला नहीं रह जाता | मैंने इन सालों में देखा है, कैसे वही दल्ले और कोठा मालकिन जो कभी आपके जिस्म से लाखों करोड़ों कमाते रहे हैं, आपकी उम्र ढलान पर आई नहीं कि आपको कोने में पटक देंगे | कोठे की झड़ाई-पुछाई करो तो एक जून की रोटी मिल जाएगी | किसी-किसी को तो वह भी नसीब नहीं होती | बातचीत के दौरान किसी ने कहा, ‘अरे ! दूसरा बल्ब जला ! कमरे में  कितना अन्धेरा हो रहा है |’ दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘कल विमला का पति ठीक करके गया था तबसे दूसरा बल्ब जल ही नहीं रहा |’ यह सुनकर विमला किसी दुल्हन की तरह शरमा गई | शादी के बारे में पूछे जाने पर विमला सूनी आँखों से खिड़की की तरफ देखने लग जाती है | बहुत कुरेदने पर कहती है – ‘हमसे कौन शादी करेगा | एक ग्राहक है काफी सालों से आ रहा है, उसे लेकर ही छेडती हैं ये |’

विमला ने अपने जीवन के सूनेपन को स्वीकार लिया है | ‘अकेली तो तब से हूँ जब अठारह साल की थी | रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली आई थी | छोटे बहिन-भाई, अंधी माँ की जिम्मेदारी थी | आज भाई-बहिन बड़े हो गए हैं, अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं |’ बातों-बातों में उसके जीवन का एक और पहलू खुलता है | विमला के तीन बच्चे हैं जो उसके रिश्तेदार के पास पल रहे हैं | वो बच्चों का पूरा खर्चा उस रिश्तेदार को भेज रही है | बच्चों का बाप कौन है ?, इस सवाल पर कहती है, ‘क्या फर्क पड़ता है | बच्चों को बोल दिया है, उनका बाप मर गया है | कौन कोठे वाली के बच्चे को नाम देगा | घरवालों को बस इतना पता है कि मैं किसी कोठी में घर का काम करती हूँ | लेकिन अब सोचती हूँ कैसे बच्चों का खर्चा भेज सकूंगी | दिन-दिन रोटी जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा है |’ दिल्ली में सैकड़ों ऐसी वृद्ध सैक्स वर्कर है जो रोजी-रोटी की तलाश में अपने प्रान्तों से भटक कर यहाँ पहुँच तो गई है, लेकिन उम्र के इस पड़ाव में अपना पेट भरने के लिए भीख माँगने को मजबूर है | दिल्ली की सड़कों, मजारों, मंदिरों के बाहर इन महिलाओं को भीख मांगते देखा जा सकता है | दिल्ली के रेड लाइट एरिया में रोजाना एक दर्जन नई लड़कियां इस क्षेत्र में प्रवेश करती हैं और एक दर्जन सेवानिवृत होकर बाहर निकल जाती हैं | इन महिलाओं का सवाल है ये इस उम्र में कहाँ जाएँ, अपना पेट कैसे भरें |

रागिनी-

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बहुत सकुचाते हुए अन्दर आई | चुपचाप मुस्कराते हुए सामने बैठ गई | ‘रागिनी, आपकी उम्र कितनी है ?’ मेरे इस सवाल से उसका चेहरा लाल हो गया | ‘दीदी, शायद तेईस-चौबीस होगी |’ ‘कुछ अपने बारे में बताओ |’ ‘क्या बताऊ कुछ ऐसा नहीं है |’ दुबली-पतली रागिनी खूबसूरत है, इसमें कोई दो राय नहीं | किसी भी दूसरी लडकी की तरह चेहरे पर वही झिझक | फिल्मों की तरह इसने चेहरे पर कोई मेकअप नहीं थोप रखा था | रागिनी उसका असली नाम नहीं था | आंध्रा की लडकी थी, पर भाषा बिलकुल साफ़ | पता चला चौदह साल की उम्र से यहीं पर है, भाषा तो अच्छी होगी ही | आंध्रा के एक गाँव में उसका लंबा-चौड़ा परिवार था | परिवार की बिचौली लडकी | पड़ोस के एक लड़के से प्रेम हो गया | दूसरी जाती का लड़का था, परिवार वाले किसी  भी हालत में इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हुए | लड़के के साथ भाग कर दिल्ली आ गयी | कुछ समय तक दोनों ने होटल में एक साथ गुजारे | फिर एक दिन किराए का मकान लिया है, यह कहकर लड़का उसे जी बी रोड ले आया | दूसरी सुबह वह अकेली कोठा मालकिन से रहम की भीख मांग रही थी | तब से आज तक वो यहीं है | कोठा बदल गया है लेकिन जिन्दगी नहीं | एक बार रेड में वह पकड़ी भी गई, पुलिस उसे उसके घर ले गई, लेकिन परिवार वालों ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया | मेरे यह कहने पर कि कोई और काम क्यों नहीं करती ? कहने लगी, ‘कुछ और आता ही नहीं | कई बार सोचा किसी घर में झाडू पोंछा का काम कर लूं, पर यहाँ की लड़कियां कहती हैं कि कुछ नहीं हो पाता | हमारी पहिचान सब जगह पहुँच जाती है, फिर वो लात मारकर बाहर कर देंगे |’ अचानक विमला आकर उसके कान में कुछ कहती है, वो ‘हूँ’ कहकर मेरी तरफ मुखातिब होती है | ‘दीदी मैं अभी आती हूँ | ’मैं समझ गयी कोई ग्राहक आ गया था | इन महिलाओं के पास इस धंधे से बाहर निकलने का कोई विकल्प नहीं है | कुछ एन जी ओ सिलाई-कढाई जैसी तकनीकी शिक्षाओं की सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं पर वो नाकाफी हैं | इन्हें इस नरक से मुक्ति दिलाने की सभी कागजी योजनायें, कागज़ पर ही धरी की धरी पडी हुई हैं, क्योंकि सरकार अभी तक इसी दुविधा में फंसी हुई है कि इन्हें वर्कर मानकर वर्करों वाली सुविधाएं दी जाए या इन्हें इस धंधे से बाहर निकालने की व्यवस्था की जाए |

रेखा –    

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ये यहाँ का दूसरा कोठा है | यहाँ का दृश्य थोड़ा अलग है | बड़े मॉल में जैसे टायलेट बने होते हैं, लाइन से कूपे जैसा, वैसा कूपा लाइन से बना हुआ है | कुछ लड़कियां सीढ़ी के पास सज-धज कर खड़ी हैं | एक लड़की जमीन पर बैठी अपने बच्चों को दूध पिला रही है | एक आदमी आता है | वह लड़की अपना बच्चा दूसरी लड़की को पकड़ाती है और उस आदमी के साथ उस कूपे में चली जाती है | मुश्किल से दस मिनट बाद वह उस कूपे से बाहर आती है और कोई चीज डस्टबिन में फेंकती है | फिर अपने बच्चे को पकड़ दूध पिलाने लगती है जैसे पहले पिला रही थी | सभी बहुत व्यस्त, किसी के पास बात करने का वक्त नहीं | एक चालीस-पैंतालीस साल की महिला मेरी तरफ ध्यान से देख रही थी | मैं उसके पास खिसक आई | ये रेखा है | अस्सी के दशक में रेखा की खूबसूरती के चर्चे वैसे ही थे जैसे फिल्म अदाकारा रेखा के थे | कमर तक लम्बे बाल, बड़ी-बड़ी आँखे, गेरुआ रंग | उम्र के चालीस दशक गुजर जाने के बाद भी चेहरे का वो आकर्षण बरकरार था | और वो पानी भी जो बेटी को देखने लिए आँखों की कोरों में ठहरा हुआ था | मेरे इस सवाल ‘अगर पुनर्वास की योजना के तहत आपका या इन लड़कियों का घर बसाने की कोशिश की जाए तो ?’ रेखा तुरंत बोल उठी ‘न बाबा ! हमें नहीं चाहिए कोई पुनर्वास | पुनर्वास के नाम पर घर भेज देते या शादी करा देते है | शादी के बाद उसे कोई देखने नहीं आता कि हमारा क्या हुआ | अभी हाल में ही पुलिस ने हमारे कोठे की एक लड़की की शादी करवाई थी | उस आदमी ने कुछ समय तक लड़की को साथ रखा, दो बच्चे हो गए | जब मन भर गया तो किसी बात पर उसे खूब मारा और रात को कोठे की सीढ़ी पर पटक कर चला गया | आप उसे खुद जा कर देखो, हाथ, जबड़ा सब टूटा हुआ है |’

यहाँ पुनर्वास के नाम पर लड़कियां डरती हैं | उनके सामने ऐसे हजारों उदाहरण हैं, जहाँ पुनर्वास के नाम पर लड़कियों की शादी करवाई गई या एक अच्छी जिन्दगी की चाह में लड़कियों ने खुद शादी की, पर परिणाम कोठे से भी ज्यादा बदतर, अंततः कोठे की चार दीवारी में वापसी ही रहा | अगर उन्हें वापस उनके घर भेज दिया जाए, इस सवाल पर रेखा तिलमिला गई ‘घरवाले अपनाते कहाँ हैं, धक्के मार कर घर से बाहर निकाल देते हैं | मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था, ऐसा क्या हुआ था, इस सवाल पर रेखा की आँखों के कोर कुछ भीग से गए, ‘मेरी शादी जब मैं उन्नीस की थी तब हो गयी थी | रिश्तेदारी में किसी मसले पर विवाद चल रहा था, हमारे जेठ ने धोखे से लाकर यहाँ बेच दिया | उस समय मेरी बेटी छह महीने की थी | मैं यहीं तीन साल पड़ी रही | छापा पड़ा, मुझे पुनर्वास कहते हुए घर भेज दिया गया | पति ने जब तक दूसरी शादी कर ली थी, मुझे घर में पैर भी रखने नहीं दिया | यहाँ तक कि बेटी को भी एक नजर नहीं देखने दिया | सुना है अब उसकी शादी हो भी गई है | बड़ा मन होता है उसे एक बार देखने का | बड़ी होकर कैसी दिखती है |’ बाहर शायद शाम हो गई है, अन्दर से तो कुछ पता ही नहीं चलता | बस घड़ी की टिक-टिक वक्त के भागने का एहसास कराती है | अन्दर चहल-पहल और बढ़ गई है | उदास चेहरों पर जबरदस्ती हंसी खींची जा रही है | कूपे के दरवाजे खुल-बंद हो रहे हैं |         

अमृता द्वारा लिखित

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