मुक्तिबोध, संघर्ष और रचनाशीलता : अनीश अंकुर

रंगमंच साहित्यक गतिविधिया

अनीश 25 2018-11-17

प्रख्यात कवि आलोकधन्वा ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा ” एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा ‘मुक्तिबोध’। मुक्तिबोध एक लाइट हाउस जी तरह से थे। ” आलोकधन्वा ने आगे कहा ” मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे। यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता। जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता। मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया वो उन्हें विजातीय बनाता है।जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता। मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे।”……

मुक्तिबोध: संघर्ष और रचनाशीलता

‘देश में फ़ासीवाद के खतरे को सबसे पहले पहचान लिया था मुक्तिबोध ने
फासीवाद के गढ़ व मठ को तोड़ने का समय आ गया है
मुक्तिबोध जन्मशताब्दी समारोह
प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार का आयोजन
” मुक्तिबोध ने मध्यमवर्गीय लोगों से ये आग्रह किया कि अपनी सीमाओं से आगे जाकर व्यापक जनता के संघर्ष में शामिल हों। मुक्तिबोध, वैसे लेखक नहीं थे जो सृजनात्मक कार्यों के साथ-साथ संगठनात्मक कामों में भाग लिया करते थे। प्रगतिशील लेखक संघ की उज्जैन यूनिट की इन्होंने स्थापना की। 1944 में इंदौर में फासीवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया जिसका राहुल सांकृत्यायन ने उद्घाटन किया था ।” ये बातें प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार द्वारा आयोजत ‘मुक्तिबोध जन्मशताब्दी समारोह’ के प्रथम सत्र’ समकालीन परिदृश्य और मुक्तिबोध’ को संबोधित करते हुए कहा।
पूरा आयोजन दो सत्रों में विभाजित था। समारोह में बड़ी संख्या के लेखक, कथाकार, कवि, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी सहित बिहार के कई जिलों से भी साहित्यकार आये थे ।
बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष ब्रज कुमार पांडे ने समकालीन परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विषय प्रवेश किया ” समकालीन वक्त में पूरे देश में फासीवादी खतरा जिसका नृशंस स्वरूप हिटलर की आतताई सत्ता में दिखती है। उस सत्ता का मुकाबला समाजवादी सोवियत संघ ने स्तालिन के नेतृत्व में किया और उसे पराजित किया। आज भारत को उस महान लड़ाई से सबक सीखना चाहिए । मुक्तिबोध हमें उसमें हमारी सहायता करते हैं। ”
मुक्तिबोध की कहानी क्लाइड इथरली, पक्षी और दीमक, का जिक्र करते हुए चर्चित कथाकार अवधेश प्रीत ने कहा ” मुक्तिबोध कहते हैं कि इस देश के हर नगर में एक अमेरिका है। ये कहानियां बाजारवाद पर चोट करती है। मुक्तिबोध साम्राज्यवाद, पूंजीवाद के खतरों को बखूबी समझते थे। हिरोशिमा पर बम गिराने वाले क्लाइड इथरली, को जो आत्मग्लानि थी, पक्षी व दीमक कहानी आज भी हमें वैसे उद्वेलित करता है।”
संस्कृकर्मी अनीश अंकुर ने धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध नाटक ‘अंधायुग’, भक्ति आंदोलन में निर्गुण-सगुण प्रवृत्तियों के संबंध में की मुक्तिबोध द्वारा की गई समीक्षा का संदर्भ देते हुए कहा ” मुक्तिबोध ने घर-परिवार की बदहाली के राजनीतिक श्रोत तलाशने की बात की। उन्होंने हमेशा राज्य को अपने निशाने पर रखा। भारत के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के ‘रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध ‘ होने की परिघटना के गहरी समझ ने उन्हें साठ के दशक में उस खतरनाक संभावना को पहचान लिया था जो समकालीन परिदृश्य में भयावह ढंग से साकार हो गई प्रतीत होती है। इससे लड़ा जैसे जाए? इसके लिए एक लेखक को अपने व्यक्तिवादी सीमाओं का अतिक्रमण कर सर्वहारा के संघर्ष में शामिल होने , उस स्तर की वैचारिक तैयारी के युगीन कार्यभार को उठाना चाहिए।”
प्रलेस के पूर्व महासचिव खगेन्द्र ठाकुर ने प्रथम सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कहा ” जब-जब वामपंथ कमजोर होता है जनतंत्र कमजोर होता है। मुक्तिबोध को समझना कठिन है। रामविलास शर्मा जो उन्हें वाम और दक्षिण अवसरवाद का जंक्शन मानते थे और नामवर सिंह जो उन्हें ‘अस्मिता की खोज’ वाला कवि कहते हैं। इन दोनों का मूल्यांकन उनके बारे में गलत है। मुक्तिबोध की कविता का ‘अंधेरा’ पूंजीवाद का अंधेरा है जो दिखाई नहीं देता इस कारण वो खतरनाक है।”
प्रथम सत्र को डॉ श्री राम तिवारी, डॉ सुनीता कुमारी गुप्ता, संजीव, सीताराम प्रभंजन आदि ने संबोधित किया। संचालन प्रलेस के प्रदेश महासचिव रवींद्र नाथ राय ने किया।
दूसरे सत्र ‘ मुक्तिबोध: संघर्ष और रचनाशीलता’ को संबोधित करते प्रख्यात कवि आलोकधन्वा ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा ” एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा ‘मुक्तिबोध’। मुक्तिबोध एक लाइट हाउस जी तरह से थे। ” आलोकधन्वा ने आगे कहा ” मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे। यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता। जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता। मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया वो उन्हें विजातीय बनाता है।जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता। मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे।”
पटना विश्विद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर व आलोचक तरुण कुमार ने कहा ” मुक्तिबोध की पंक्ति ‘तोड़ने ही होंगे मैथ और गढ़ सब’। सरकर पोषित प्रतिक्रियावादियीं के अड्डे बगैर इनके ढाहे काम नहीं चलेगा। कुछ गढ़, मठ वो भी है जिनके बीच हम काम कर रहे हैं। हमारे बीच अवसरवादी और संस्कारी रुझानों के भी गढ़ को तोड़ना है।नई कविता के भीतर व्यक्तिवादी तत्व पर आक्रमण किया और ये तत्व क्यों पैदा हुआ उसका जीवन में जड़ कहाँ है? विश्लेषण किया। कम्युनिज्म, प्रगतिशीलता, मार्क्सवाद से अपने साँसों की तरह जुड़े हुए थे। मुक्तिबोध को सिर्फ मार्क्सवादी आलोचना के औजारों से नही समझा जा सकता। ” तरुण कुमार ने प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे को मुक्तिबोध जी चिट्ठी लिखी जा उदाहरण देते हुए बताया ” प्रगतिशील लेखन के बीच नए संदर्भो में बदलाव आना चाहिए। लेखकों पर प्रहार ज्यादा हुआ जबकि उनकी विचारधारा पर आक्रमण होना चाहिए था। ” 
जन संस्कृति मंच के सुधीर सुमन ने कहा ” अभावों बे बीच बहुसंख्यक जनता का जो संघर्ष है उसमें अपने सवालों को शामिल करने की बात मुक्तिबोध किया करते थे। धारा के प्रतिकुल किस तरह जिया सकता है, एक सार्थकता, एक जिद के उदाहरण हैं मुक्तिबोध। संवादों के जरिये निष्कर्ष पर पहुंचने की प्रवृत्ति हमें मुक्तिबोध सिखाते हैं। आयात ही ये भी साहित्य के प्रश्न दरअसल जीवन के प्रश्न हैं ।”
चर्चित कवि व मनोचिकित्सक विनय कुमार ने परिवार, भाषा, समाज से उनके अलगाव का जिक्र करते हुए कहा ” मुक्तिबोध का बाह्य और अंतर जगत से संघर्ष बेहद बीहड़ था । मुक्तिबोध जैसी अदम्य जिज्ञासा दूसरी जगह नही मिलती । उनका युगबोध इतना व्यापक था, ऐसी स्थितियां बनाई जिससे हमशा उनके जीवन मे तनाव रहता है। सरकारी नौकरी से इनकार, कविता लिखना व प्रेम इन सब उनके फैसलों को भी देखना होगा मुक्तिबोध को समझने के लिए। अपने ही अचेतन में इंडिस्कोप डालकर उसे निहारते का काम करने का काम मुक्तिबोध करते थे।”
कवि रमेश ऋतंभर ने अपना कहा “मुक्तिबोध जागने और रोने वाकई कवि हैं। समय के, यथार्थ से जलने वाले कवि थे। आत्म भर्त्सना के कवि थे। रूढ़िवादी वादी, स्मृतियों से वे लगातार लड़ता है। बेटे को नौकरी भी लग जाये, पुरस्कार भी मिल जाये और बड़ी कविता भी लिख लें ऐसा नही हो सकता। चुनौती देने वाला कवि है मुक्तिबोध। कविता लिखने के लिए जलना पड़ता है, गलाना पड़ता है।”
प्रलेस के राज्य महासचिव रवींद्र नाथ राय के अनुसार “एक तरफ सुविधाएं हैं दूसरी तरफ संघर्ष है । मध्यमवर्गीय बुद्धजीवी का संघर्ष, कैसे मार्शल ला लग जाता है। मुक्तिबोध के अंतःकरण का आयतन बेहद विस्तृत है। प्रगतिवादी कविता को समाप्त करने की साजिश को वे बखूबी पहचान लिया था। वे यांत्रिक नहीं थे। कब सुखी होंगे नगरों व गावों के मानव”
अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर ने कहा “रामचन्द्र शुक्ल के बाद सबसे महत्वपूर्ण आलोचक मुक्तिबोध को मैं मानता हूं। सबसे अधिक उन्होंने लेखक के आत्मसंघर्ष की बात उठाई।”
उस सत्र को परमाणु कुमार, शशांक शेखर, रवींद्र नाथ राय ने भी संबोधित किया।
संचालन कवयित्री पूनम सिंह ने किया।

समारोह में कवि शशांक शेखर, अरविंद श्रीवास्तव, तैय्यब हुसैन पीड़ित, सुमन्त शरण, प्रियरंजन, सुशील श्रीवास्तव, रवींद्र राय, दीपक राय, जयप्रकाश,रमेश सिंह, गौतम गुलाल, मनोज, विनीत, रघु,सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।

अनीश द्वारा लिखित

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 173 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

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- पंकज तिवारी का आलेख 

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