रंगमंच में अनुदान का ऑडिट कराया जाए : आलेख (अनीश अंकुर)

रंगमंच मंचीय गतिविधिया

अनीश अंकुर 64 2018-11-17

‘‘थियेटर में ग्रांट देने का काम एन.एस.डी को सौंप दिया गया है। बहुत सारे लोग परेशान हैं कि अब तो सारा अनुदान एन.एस.डी के लोगों को ही मिलने वाला है,…. उनकी चिंता जायज है। पीछे के आंकड़ों और रंगमहोत्सव इसका जीता-जागता प्रमाण है।”(आलेख से) रंग संस्थाओं को मिलने वाले अनुदान कि खुली व्याख्या करती ‘समकालीन रंगमंच‘ कि विशेषांक पत्रिका ‘रंगमंच और अनुदान‘ पर ‘अनीश अंकुर‘ का समीक्षार्थ आलेख …| – संपादक

रंगमंच में अनुदान का ऑडिट  कराया जाएAnish Ankur

पिछले दिनों दिल्ली से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘समकालीन रंगमंच’ ने ‘अनुदान व रंगमंच’ पर विशेषांक निकाला। रंगकर्मी रमेशचंद्र के संपादन में निकलने वाली इस पत्रिका ने कम दिनों में ही अपनी पहचान स्थापित कर ली है। संपादक ने काफी परिश्रम कर देश भर के रंगकर्मियों से लेखों को संकलित किया है एवं ‘अनुदान व रंगमंच’ के जटिल रिश्ते की पड़ताल की है।
अपने संपादकीय में रमेशचंद्र ने लिखा है ‘‘ अनुदान की लपलपाती लालसा ने निर्देशक को मैनेजर और नाटक को ब्रोशर ‘क्वालिटी’ में सीमित कर दिया है।’’
पत्रिका का पहला आलेख बिहार के चर्चित नाटकाकार श्रीकांत किशोर का है जिसका शीर्षक ही सबकुछ कह जाता है ‘‘ कला क्षेत्र को दलालों से मुक्त किया जाए’’। आजादी के पश्चात से ही कला-संस्कृति को लेकर विभिन्न समितियों जिसमें होमी जहांगीर भाभा समिति ;1964, ए. पी.एन.हक्सर ;1984 समिति आदि रिपोर्टों की श्रीकांत किशोर ने चर्चा की है। पी.एन.हक्सर की रिपोर्ट में संस्कृति मंत्रालय पर कड़ी टिप्पणी है ‘‘ संसदीय समिति के मांगने पर संस्कृति मंत्रालय वे फाइलें उपलब्ध नहीं करा पायी। बताया गया है कि फाइलें गुम हो गयी हैं। मुमकिन है ऐसी फाइलों का अस्तित्व ही न हो ’’
हिंदी क्षेत्र में संस्कृति संबंधी प्रशासन से जुड़े रहने वाले सुप्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी बताते हैं कि ‘‘ अनुदान की परंपरा सिर्फ भारत में ही नहीं है। सारी दुनिया में जो बड़ी-बडी रंगमंडलियां हैं उनको काफी बड़ी मात्रा में अपने खर्च के लिए अनुदान मिलता है। ब्रिटेन में , फ्रांस में, जर्मनी में हर जगह यह परंपरा है। हर जगह रंगमंच को आर्थिक मदद की जरूरत होती है।’’
बांग्ला रंगमंच के शीर्षस्थ अभिनेता रूद्र प्रताप सेन गुप्ता अनुदान में सरकार द्वारा ‘टके सेर भाजी टके सरे खाजा’ की नीति का का उदाहरण देते हुए बताया ‘‘ टके सेर भाजी टके सरे खाजा वाली व्यवस्था चल रही है। हमें जितनी सैलरी ग्रांट मिलती है उतनी ही उन्हें भी मिलती है जिन्होंने तीन साल पहले ग्रुप का रजिस्ट्रेशन करा लिया, दस-पंद्रह आदमी जुटा लिए, एक-दो नाटक के पांच सात प्रदर्शन कर लिए किसी तरह से। यह देखने की किसी को फुर्सत ही नहीं है कि उसके काम की क्वालिटी क्या है? तो सब टके सेर भाजी टके सरे खाजा वाला मामला लगता है ’’
राष्ट््रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक रामगोपाल बजाज ‘अनुदान’ शब्द के इस्तेमाल पर ही आपत्ति है वहीं राष्ट््रीय नाट्य विद्यालय के वर्तमान निदेशक वामन केंद्रे की चिंता कम बजट की है ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए मात्र 0.0021 प्रतिशत को नाकाफी बताते हुए कहा ‘‘ इतने बड़े मुल्क में संस्कृति विभाग का बजट 1500 या 2000 करोड़ रूपये का हो तो उस बजट को कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।’’
अनुदान को जनता की गाढ़ी कमाई का लूट बताते हुए सुप्रसिद्ध रंगकर्मी अरविंद गौड़ अभिनेताओं की हकमारी की बात उठाते हैं ‘‘ सब्सिडी का पैसा समाज के उस हिस्से के लिए होता है जो सबसे ज्यादा जरूरतमंद होता है। थियेटर में वह व्यक्ति अभिनेता है। वह परिवार से, समाज से डांट खाता है, फटेहाली में जीता है। क्या संस्थाओं या निर्देशकों को मिलने वाला पैसा उन तक पहुॅंचता है? फर्जी कागजात बनवा कर, सादे वाउचर पर फर्जी हस्ताक्षर करवाकर अभिनेताओं को भुगतान दिखाकर, किसी सी.ए को पैसा खिलाकर फर्जी उपयोगिता प्रमाणपत्र बनवाकर आप अनुदान की राशि हड़प लेते हैं’’%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%95
बहुचर्चित नाटककार, निर्देशक मानव कौल का मानना है ‘‘ अनुदान का निर्धारण इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कोई राष्ट््रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित है अथवा नहीं बल्कि इसका आधार उसके काम को बनाया जाना चाहिए’’
सारे अनुदान का जिम्मेवारी एन.एस.डी को सौंपे जाने के केंद्र सरकार के फैसले से देश भर के रंगकर्मियों में काफी रोष है अभिनेत्री भारती शर्मा इस बाबत कहती हैं ‘‘ मुझे हैरत होती है एन.एस.डी का क्या करेंगे ये लोग। क्या उसे बंद करने वाले हैं? हमारे पास संगीत नाटक अकादमी जैसी एक बड़ी संस्था है, जिसकी पहुॅंच का दायरा बहुत व्यापक है। उसे दरकिनार कर राष्ट््रीय नाट्य विद्यालय को सौंपना मुझे समझ नहीं आ रहा। मुझे अब भी विश्वास नहीं होता कि ऐसा हुआ है।’’
वहीं भारतीय जनता पार्टी की राष्ट््रीय सचिव एवं एन.एस.डी स्नातक वाणी त्रिपाठी केंद्र सरकार का बचाव करते हुए कहा ‘‘ संस्कृति विभाग ने यदि राष्ट््रीय नाट्य विद्यालय को अनुदान देने का सारा जिम्मा सौंप दिया है तो हमें बहुत जल्दी उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिए और न हमें उसके बारे में ज्यादा चर्चा करनी चाहिए।’’
रमेशचंद्र संपादित इस पूरी पत्रिका में अनुदान के पूरे अर्थशास्त्र, उसके दुष्परिणाम, उसकी राजनीति आदि को प्रभावी तरीके से उद्घाटित किया है। जो लोग भी राष्ट््रीय नाट्य विद्यालय, संगीत नाटक अकादमी से जुड़े हैं या अन्य संस्थानों से संबद्ध हैं वे अनुदान के दुरुपयोग आदि के संबंध में थोड़ी-बहुत आलोचना मद्धिम स्वर में करते हैं लेकिन जो लोग इस नेटवर्क से बाहर छोटे शहरों, कस्बों आदि में रंगकर्म कर रहे हैं वे अधिक बेबाक हैं।
जन नाट्य मंच, नई दिल्ली से जुड़े प्रख्यात संस्कृतिकर्मी एवं अभिनेता सुधन्वा देशपांडे अनुदान देने में राजनैतिक नियंत्रण से मुक्ति की बात अनुदान के ऑडिट की बात उठाते हेैं ‘‘ संस्कृति मंत्रालय की तरफ से जो ग्रांट मिलती है उसकी भी ऑडिट करने की जरूरत है।’’
बिहार के प्रमुख नाटककार राजेश कुमार ने ‘अनुदान का दुष्चक्र एवं रंगमंच’ शीर्षक आलेख में अनुदान के दुष्चक्र को उजागर किया ‘‘यह एक ऐसा दुष्चक्र है कि इसमें एक बार जो फॅंसता है वो कभी बाहर नहीं निकल पाता। यहॉं परिवर्तनकारी भावनाओं को ऐसे सोख लिया जाता है कि फिर रंगकर्मी वही करने लगता है जो वे चाहते हैं। मंच पर वे होते हैं पर उनकी डोर परदे के पीछे से कोई और संचालित कर रहा होता है।’’
दिल्ली के युवा रंगकर्मी ईश्वर शून्य ने एन.एस.डी का उदाहरण देते हुए कहा ‘‘थियेटर में ग्रांट देने का काम एन.एस.डी को सौंप दिया गया है। बहुत सारे लोग परेशान हैं कि अब तो सारा अनुदान एन.एस.डी के लोगों को ही मिलने वाला है,…. उनकी चिंता जायज है। पीछे के आंकड़ों और रंगमहोत्सव इसका जीता-जागता प्रमाण है। नाट्य विद्यालय ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिससे हिंदुस्तान के थियेटर का उस पर भरोसा जमा रहे। नहीं तो लोगों को आपत्ति नहीं खुशी होती।’’
‘समकालीन रंगमंच’ के संपादक ने इसे दो हिस्से में बांट दिया है। एक में नामचीन लोगों की राय, आलेख तैयार किए गए है। ऐसे अधिकांश आलेख रमेशचंद्र ने खुद इनलोगों से बातचीत कर तैयार किए है। दूसरे खंड का नाम ‘संवाद’ है जिसमें ढ़ेरों युवा रंगकर्मियों, छोटे शहरों में काम करने लोगों की टिप्पणियां हैं।
इन लोगों में है, वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल पतंग ,उषा आठले, पुंजप्रकाश , अमितेश कुमार, हिमांशु प्रसाद दास, स्वाति मित्तल, अतुल सत्य कौशिक, रोहित त्रिपाठी, दीपक सिन्हा, संदीप भट्टाचार्य, नंद कुमार पंत, अजीत चौधरी, डा अखिलेश कुमार जायसवाल आदि ।
बेगूसराय के युवा रंगकर्मी विजय कुमार अनुदान प्राप्त करने वाले अधिकांश लोगों के लिए रंगमाफिया, रंगसेठ , रंगदलाल की उपाधि देते अनुदान प्राप्त करने के तौर-तरीकों को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं ‘‘ अनुदान किसी भी शर्त पर छिटके नहीं इसकी भी पूरी तैयारी रहती है। अफसर से लेकर बाबुओं को शबाब, कबाब और शराब का इंतजाम किया जाता हैं। इन बाबुओं की नजर महिला रंगकर्मियों पर रहती है। कई कागजी रंगसंस्थाएं भी हैं जो सिर्फ अनुदान के लिए ही बनी है।’’ एन.एस.डी के बारे में विजय कहते हैं ‘‘ एन.एस.डी की भूमिका रंगदलालों को मजबूती प्रदान करने वाली है’’
रंगमंच पर निकलने वाली बहुत कम पत्रिका इस तरह अपनी पक्षधरता जाहिर करने वाली होती है। वैसे तो ‘समकालीन रंगमंच’ का हर अंक दस्तावेजी महत्व का होता है । ताजा अंक जिस किस्म, ढ़ंग से वैचारिक हस्तक्षेप करती है वो दुर्लभ है।

अनीश अंकुर द्वारा लिखित

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 पष्चिम लोहानीपुर

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