शो मस्ट गो ऑन, ‘सुखिया मर गया भूख से’: रिपोर्ट (अनीता चौधरी)

रंगमंच साहित्यक गतिविधिया

अनीता 57 2018-11-17

शो मस्ट गो ऑन, ‘सुखिया मर गया भूख से’: रिपोर्ट (अनीता चौधरी)

शो मस्ट गो ऑन, ‘सुखिया मर गया भूख से’

मैं पीछे क्यों रहूँ

अनीता चौधरी

शौकिया रंगमंच का विस्तार हो रहा है! पर वो अपने आप को संकटग्रस्त पाता है। वजह।?…उसे कम खर्च और सशक्त कथ्य के ताज़े नाटक चाहिए होते हैं नाटककार, रंगकर्मी जन पक्षता के  साथ , ‘’आम’’जनता से जुडना, उनकी समस्याओं जैसे अभाव, मंहगाई, बढती हुई जनसंख्या, प्रशासनिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार, प्रदूषण आदि… जन जीवन से जुडी समस्याओं से  रु-ब-रु कराना होता है | अव्यवसायिक रंगमंच की इन सारी परेशानियों को मैंने बहुत करीब से देखा और जाना है | क्योंकि मैं ऐसे कई संगठनों के बहुत से नाटक देख चुकी हूँ और खुद भी  जुडी रही हूँ | यह सब तब भी है जब नाटक के मंचन में प्रेक्षाग्रह से लेकर लाइट, साउंड, साज-सज्जा, वेश-भूषा तथा अन्य खर्चों के लिए कलाकारों व निर्देशकों को टिकटों पर जन सहयोग पर  ही निर्भर रहना पड़ता है | कई दफा जन सहयोग से खर्चे पूरे नहीं हो पाते हैं तो संगठनों से जुड़े लोगों को अपनी जेबों से इसकी भरपाई करनी पड़ती है | ऐसी स्थिति की वजह से नाटक के  निर्देशक साल में मुश्किल से एक या दो ही प्रस्तुति दे पाते हैं
हाल ही में 13 व् 14 जून को संकेत रंग टोली, कोवैलेंट ग्रुप, हमरंग डॉट कॉम और जन सिनेमा के साझा प्रयासों से आयोजित दो दिवसीय नाट्य मंचन से प्रत्यक्ष रूप से सीधे जुड़े रहने का  अवसर मिला | जहाँ सनीफ मदार द्वारा निर्देशित व राजेश कुमार द्वारा लिखित नाटक ‘सुखिया मर गया भूख से’ के सफल मंचन के मथुरा के किसान मजदूरों के अलावा सैकड़ों लोग साक्षी  बने |
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहाँ चारों तरफ लह्लाह्ती फसलों और पूरे देश में अन्न और दूध के भंडार भरे होने की बात कही जाती हो | सरकार द्वारा किसानों और गरीबों के लिए ढेर सारी  योजनायें हों जिनमें किसानों के लिए उचित समर्थन मूल्य…., पुराने बकाये का सीधा भुगतान….., खाद बीज की सब्सिडी….., कर्जों की मांफी…., बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा….., और गरीबों के  लिए मुफ्त इंदिरा आवास की सुविधा हो, नरेगा में रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा हो तो ऐसे में कोई भूख से कैसे मर सकता है | ऐसी ही सरकारी योजनाओं की पोल खोलता है यह नाटक |  क्योंकि सरकार तो यह मानकर बैठी हुई हैं की इतनी सारी योजनाओं के होने पर भी कोई भूख से कैसे मर सकता है
यह वर्तमान सरकारी व्यवस्था पर एक करारा व्यंग्य है कि किस तरह प्रशासन भूख से मरने के सच को अपनी जद्दो-जहद से झूठा साबित करने का रातों रात षड्यंत्र रच डालता है जिसमें मृतक  किसान सुखिया का बी पी एल कार्ड भी बन जाता है , बैंक में न केवल उसका खाता खुल जाता है बल्कि उसमे बीस हजार रुपये भी जमा करवाकर और चुपके से उसके घर में गेहूं आटा चावल  चना दाल तेल आदि रखवाकर तथा पत्रकारों को बुलाकर अखवारों में समाचार लगवा देते हैं कि सुखिया भूख से नहीं किसी बीमारी से मरा है |

आजादी से पहले और बाद की स्थितियों पर नजर डालें तो किसानों की स्थितियों में कोई ख़ास बदलाव नजर नहीं आता है | समय के साथ चीजों में परिवर्तन अवश्य आया है लेकिन महंगाई के  प्रतिशत में देखे तो स्थिति और भी भयानक नजर आती है | यह नाटक किसान के अन्दर बाहर के द्वन्द और उसकी दशा को भलीभांति चित्रित करता है | यह एक गरीब किसान के तिल-तिल  कर मरने की व्यथा को वर्णित करता है |एक व्यक्ति के कर्ज के बोझ तले, समाज में अपमान के भय से आत्महत्या करने की उसकी जो मजबूरी है वह स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है | क्योंकि भूख  से मरना भी आत्महत्या ही है | नाटक के द्वारा समाज के उस तंत्र को खोखला करना है जो किसानों के भूख से मरने और आत्म हत्या करने की स्थितियों को पैदा करने के लिए सीधे तौर पर  जिम्मेदार हैं | जो तंत्र बाहर से लोकलुभावन होने का ढोंग करता है वह अन्दर से कितना असम्वेदनशील, क्रूर और साजिशखोर है इन स्थितियों को समझने कि ललक ही थी जो दर्शकों में  बारिश के बावजूद भी धैर्य बनाए रख कर नाटक देखने को विवश कर रही थी | साथ ही यह नाटक कार राजेश कुमार व् निर्देशक सनिफ मदार की भी सफलता की वायस थी |
– मार्क्स का अत्यंत प्रसिद्ध कथन है कि अभी तक दार्शनिकों ने दुनिया की व्याख्या की थी, लेकिन सवाल दुनिया को बदलने का है। बदलने का अर्थ तकनीकी विकास (विचारगत/विकास गत  और आधुनिकीकरण के सन्दर्भ) से लिया जाये या सामाजिक क्रांति से? जहाँ तक सामाजिक (बदलाव) क्रांति का प्रश्न है इस दौर में या कहें परिवर्तन की प्रक्रिया के तहत अन्यान्य  वैचारिक/प्रायोगिक पहलों के साथ साहित्य व कलाओं की सार्थक भागीदारी भी गौरतलब है, इसे नकारा नहीं जा सकता, क्यूँकि कमोबेश सभी कलाओं में तत्कालीन समय से संवाद करने की  अद्भुत क्षमता देखी जा सकती है!
हालांकि किसी भी कला माध्यम फिर चाहे वह चित्रकारी हो साहित्य लेखन रंगमच या फिर सिनेमा ही क्यों न हो के सामाजिक रूप से मूलतः दो प्रयोजन सामने आते हैं जिसमे पहला महज़ मनोरंजन और दूसरा जनपक्षीय वैचारिक जागरूकता जहाँ रंगमंच और सिनेमा आम जन के वर्ग संघर्ष कि आवाज़ बनता है वहीँ लोक क्रांति कि संवेदना के लिए कलम और कूची हथियार बनते हैं |

अनीता द्वारा लिखित

अनीता बायोग्राफी !

नाम : अनीता
निक नाम : अनीता
ईमेल आईडी : anitachy04@gmail.com
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अनीता चौधरी 
जन्म - 10 दिसंबर 1981, मथुरा (उत्तर प्रदेश) 
प्रकाशन - कविता, कहानी, नाटक आलेख व समीक्षा विभिन्न पत्र-पत्रकाओं में प्रकाशित| 
सक्रियता - मंचीय नाटकों सहित एक शार्ट व एक फीचर फ़िल्म में अभिनय । 
विभिन्न नाटकों में सह निर्देशन व संयोजन व पार्श्व पक्ष में सक्रियता | 
लगभग दस वर्षों से संकेत रंग टोली में निरंतर सक्रिय | 
हमरंग.कॉम में सह सम्पादन। 
संप्रति - शिक्षिका व स्वतंत्र लेखन | 
सम्पर्क - हाइब्रिड पब्लिक  स्कूल, दहरुआ रेलवे क्रासिंग,  राया रोड ,यमुना पार मथुरा 
(उत्तर प्रदेश) 281001 
फोन - 08791761875 

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 255 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 166 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 260 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 247 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.