स्त्री आत्मनिर्भर क्यों बने…?: संपादकीय (अनीता चौधरी)

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अनीता 636 11/17/2018 12:00:00 AM

स्त्री आत्मनिर्भर क्यों बने…?: संपादकीय (अनीता चौधरी)

स्त्री आत्मनिर्भर क्यों बने…? 

फिर लौट आई कामिनी: कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता चौधरी

मेरे पड़ोस में रहने वाली बीस वर्षीय सुमन को उसके पति की दिमागी हालत ठीक न होने की वजह से ससुराल वालों ने घर से बाहर निकाल दिया है | वह पिछले करीब अठारह महीनों से अपने मायके में रह रही है | आये दिन उसके घर में उसकी भाभियां उसके साथ काम को लेकर झगड़ा करती है | जबकि वह पूरा दिन बंधुआ मजदूर की तरह बिना किसी वेतन के काम में लगी रहती है | उसकी एक साल की बच्ची भूख से रोती-विलखती रहती है और उसकी बेबस माँ सिर्फ आंसू टपकाने के कुछ भी नहीं कर सकती | जबकि उसने बी० ए० तक की पढ़ाई भी पूरी कर ली है जिसका उसके पास प्रमाणपत्र भी है इसे देखकर ही उसकी शादी तय हुई थी | और उसकी शादी में लगभग दस से बारह लाख रुपये खर्च किये गए थे | लेकिन आज वह महसूस करती है कि वह अपने घर वालों पर बोझ बन गयी है | इस देश में सिर्फ एक सुमन ही नहीं है | इसी तरह मथुरा के विधवा आश्रमों में रहने वाली अधिकतर महिलाएं भी इसी का प्रतिरूप ही हैं, चाहे वे इन आश्रमों में किन्हीं कारणों से पहुँची हों ।
लाखों की संख्या में महिलायें ऐसी ही स्थितियों में रह रही हैं | महिलाओं की यह स्थिति उम्र के लिहाज़ से युवा अवस्था से लेकर प्रौढ़ अवस्था तक है । अगर इन महिलाओं का आर्थिक पक्ष मजबूत होता तो शायद वे इस नारकीय जीवन को जीने के लिए विवश न होतीं । महिलाओं की इस स्थिति के लिए हम खुद ही जिम्मेदार है क्यों नहीं हम उनको पढ़ा-लिखाकर, उन्हें आत्मनिर्भर बनाते हैं ? आज भी इस इक्कीसवीं सदी में हम उन्हें साक्षर तो कर रहे है जिससे उनकी शादियाँ अच्छे नौकरीशुदा लड़कों के साथ हो जाए लेकिन उन्हें बौद्धिक, ज्ञान से लैस आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कोई महत्वपूर्ण कदम नहीं उठा रहे हैं | उन्हें शिक्षित भी इस तरह से नहीं करा पाते कि वे अच्छी नौकरियां हासिल कर सकें या अच्छी बिजनेस वूमेन बने |

महिलाओं के पूर्ण सशक्तिकरण के लिए उनका स्वावलंबी होना बहुत ही जरूरी है जीवन के लिए साँसें, तब ही आर्थिक मजबूती उन्हें पूरी तरह से स्वतंत्र होने का संबल प्रदान कर पाती है | इसकी वजह से स्त्री के भीतर एक आत्मविश्वास पैदा होता है | क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका आर्थिक पक्ष मजबूत है और वे किसी पर निर्भर नहीं है | रुपया-पैसा पास है तो वह अपने मन की सभी चीजों को आराम से जुटा सकती है | उसे अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है | खुद कमाने की वजह से स्त्रियाँ कहीं भी आने-जाने व घूमने के लिए स्वतंत्र होती है | जहाँ आत्मनिर्भर न होने की स्थिति में कई बार उन्हें अपनी जरूरतों के लिए पैसे माँगने पर लताड़ भी दिया जाता है वहीँ स्त्रियों की आत्मनिर्भरता से आर्थिक पक्ष मजबूत होने पर घर में उनकी स्थिति भी मजबूत होती है और तब बड़े से बड़े निर्णय लेने में उसकी खासी भूमिका रहती है बल्कि उसमें एक सामाजिक नेतृत्व की भावना भी जागृत होती है | निर्णय लेने की वजह से वह परिवार में जिम्मेदार मानी जाती है और सबको लगता है कि वह जो भी फैसला करेगी वह ठीक ही होगा |

महिला का आत्मनिर्भर होना घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने में भी सहायक होता है और उसे आत्मसम्मान से जीना और अपनी रीड़ की हड्डी सीधी रखना भी सिखाता है। आर्थिक पक्ष महिलाओं को मानसिक मजबूती भी देता है क्योंकि वह आज के इस बदलते ग्लोबल समय में अपने आप को इस इन्टरनेट की दुनिया से जुड़ने के लिए तमाम सारी इलेक्ट्रोनिक व आधुनिक सुविधाओं को इस्तेमाल करने के तरीको को सीखने से लेकर खरीदने तक के लिए आजाद होती है | वह उस अनोखी आभासी दुनिया में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है | आर्थिक आजादी ने ही एक औरत को सक्षम नागरिक बनाया है। समाज के हर क्षेत्र में उसकी सहभागिता बढ़ी है। लेकिन इन सभी जगहों पर महिलाओं का प्रतिशत उतना नहीं है जितना कि होना चाहिए जबकि आधी आबादी महिलाओं की है | घर में महिलाओं के लिए बनाये गये ढेर सारी धार्मिक आडम्बरों, पाखंडों और रूढीवादी जड़ताओं को तोड़ने में भी आत्मनिर्भरता अहम् भूमिका निभाती है |
हमें उनकी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ उन्हें विभिन्न प्रकार की दक्ष कलाओं में भी निपुण करना होगा तथा हाईस्कूल व इंटरपास करते ही उन्हें तार्किक मजबूती प्रदान करने के साथ अपनी आगे की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाने के लिए फ्री छोड़ना होगा और साथ ही ऐसे अनेक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे जिन्हें हम बेटों के लिए बा-ख़ुशी मुहय्या कराते हैं | बेटियों के लिए बचपन से इकट्ठा किये गए धन से, हमें पहले बेटी को उसके पैरों पर खड़ा करना होगा | पैतृक संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी भी स्त्रियों के आर्थिक पक्ष को मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक सार्थक पहल होगी फलस्वरूप स्त्री अपने पूर्ण व्यक्तित्व के साथ इस समाज में आत्मसम्मान से खडी हो सके।
मध्यवर्गीय औरत आर्थिक सक्षमता से सामाजिक गैर बराबरी, घरेलू हिंसा से पैदा होती भीषण स्थितियों से जूझ पाने में भी सक्षम होगी इसके वरअस्क पति की कमाई पर आश्रित गृहिणी के लिए यह सहज संभव नहीं है। आर्थिक आजादी के बल पर ही वह हिंसा या पति के इतर संबंधों से उपजी कठिन परिस्थितियों में भी भयानक स्वरुप की तीव्रता को कम कर पाती है । और वह अपने जीवन को फिर से सुनियोजित करने में सक्षम हो जाती है। इस तरह मानसिक गुलामी से बाहर आना उसके लिए अपेक्षाकृत आसान हो जाता है जो एक पराश्रित महिला के लिए नहीं। और फिर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी कि जब देश की आधी आबादी पढी-लिखी और आत्मनिर्भर होगी तो वह देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाएगी |

अनीता द्वारा लिखित

अनीता बायोग्राफी !

नाम : अनीता
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अनीता चौधरी 
जन्म - 10 दिसंबर 1981, मथुरा (उत्तर प्रदेश) 
प्रकाशन - कविता, कहानी, नाटक आलेख व समीक्षा विभिन्न पत्र-पत्रकाओं में प्रकाशित| 
सक्रियता - मंचीय नाटकों सहित एक शार्ट व एक फीचर फ़िल्म में अभिनय । 
विभिन्न नाटकों में सह निर्देशन व संयोजन व पार्श्व पक्ष में सक्रियता | 
लगभग दस वर्षों से संकेत रंग टोली में निरंतर सक्रिय | 
हमरंग.कॉम में सह सम्पादन। 
संप्रति - शिक्षिका व स्वतंत्र लेखन | 
सम्पर्क - हाइब्रिड पब्लिक  स्कूल, दहरुआ रेलवे क्रासिंग,  राया रोड ,यमुना पार मथुरा 
(उत्तर प्रदेश) 281001 
फोन - 08791761875 

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