‘पहचान’ पर एक ख़त: (अनवर सुहैल)

बहुरंग टिप्पणियां

अनवर 47 2018-11-17

‘अनवर सुहैल‘ के उपन्यास “पहचान” पर ‘पाखी‘ ने किन्ही धर्मव्रत चौधरी की समीक्षा छापी थी..जिसमे उपन्यास की विषयवस्तु और लेखक के औचित्य पर सवाल उठाया गया था…उस समीक्षालेख के संदर्भ में “अनवर सुहैल” की प्रतिक्रिया जो अत्याधुनिक तकनीकी युक्त ग्लोवल समय में भी पुनः पुनः ठहर कर न केवल सोचने को विवश करती है बल्कि साहित्य की सरोकारी दृष्टि पर कई सामाजिक सवाल भी खड़े करती है …..| – संपादक

‘पहचान’ पर एक ख़त: (अनवर सुहैल)

anwar-suhail

अनवर सुहैल

अपने उपन्यास ‘पहचान’ का जि़क्र पाखी पत्रिका में देख मुझे लगा कि पहचान के जिस संकट से मेरा कथा-नायक यूनुस जूझ रहा था, उसे अभी जाने कब तक इस संकट से जूझना होगा। मेरे देश के लोगों की मानसिक स्थिति अभी भी वैसी की वैसी है। मेरी इस धारणा की पुष्टि हुई आलोचक धर्मव्रत चैधरी की समीक्षा दृष्टि देखकर।
पाखी में प्रकाशित समीक्षा में यही बात छन कर आई है कि धर्मव्रत चैधरी के भारत देश में मियां लोग चार शादियां करने का अपराध करते हैं, अकारण अपनी बीवियों को तलाक देते हैं, ढेर सारे बच्चे पैदा करते हैं, जिससे भारत के हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे, मियां अशिक्षित रहते हैं, म्लेच्छ की तरह रहते हैं, मांस का सेवन करते हैं सो स्वभाव से तामसिक और दुराचारी होते हैं, गौवध करते हैं, गौमांस का भक्षण करते हैं, बहुत झगड़ालू होते हैं, हिन्दुओं को काफि़र कहते हैं, अपनी दुनिया में खोए रहते हैं, जिहादी और आतंकवादी होते हैं, विकास विरोधी होते हैं मियां और रहते हिन्दुस्तान में और गाते पाकिस्तान की हैं। पाकिस्तान ले लेने के बाद भी भारत माता का खून चूस रहे हैं ये मुसल्ले।
लगता है कि समीक्षक धर्मव्रत चैधरी ने उपन्यास पहचान पढ़ना इसी नियत से शुरू किया है कि अनवर सुहैल एक साम्प्रदायिक सोच का लेखक है और उसका नज़रिया संकीर्ण है। अनवर सुहैल कांग्रेस की मुस्लिम / अल्पसंख्यक तुष्टिकरण नीति का समर्थक है।

पहचान : उपन्यास (२००९, राजकमल प्रकाशन)

पहचान : उपन्यास (२००९, राजकमल प्रकाशन)

अपने आलेख में अंत तक आते-आते धर्मव्रत चैधरी ने लेखक को यह समझााईश तक दे डाली है कि -‘‘ये समझना कठिन है कि वंदेमातरम् गीत गाने से अल्लाताला का सिंहासन डोल जाएगा। दूसरी तरफ संघ ये सिद्ध कर सकता है कि देश के सभी हिन्दु वंदेमातरम् गाते हैं।” जबकि इस देश में करोड़ों हिन्दू ऐसे भी मिल जाएंगे जिन्होने वन्देमातरम् सुना तक न होगा। इस तरह के अतिवादी मानसिकता के लोगों को ये समझना चाहिए कि बिना वन्देमातरम् गाए भी देश-भक्त हुआ जा सकता है। और मुसलमानों को वन्देमातरम् के शब्दार्थ के बजाए संदर्भ पर ध्यान देना चाहिए। और इसे एक बार गाकर देखना चाहिए कि इसे गाने से इस्लाम पर कौन सा पहाड़ टूट पड़ता है।’’
मैं एक कवि-कथाकार हूं, उपन्यास लिखने का जोखिम क्योंकर उटाता भला! वह तो भला हो यूनुस का, सलीम का और भाई नरेन्द्र मोदी का, जिन्होंने मुझसे एक नावेल लिखवा लिया। मैं कथा में ऐसे डूबा कि बात बनती गई और नावेल तैयार हो गया।
मेरा ‘पहचान’ लिखने का सबसे बड़ा कारण ये है कि इस विधा का सहारा लेकर मैं मुसलिम समाज के युवकों को संदेश देना चाहता हूं कि वे हिन्दुस्तान की नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। दुनिया के हालात अब ऐसे नहीं रहे कि आदमी बिना ग्लोबल हुए रह जाए। विश्व-बिरादरी के अपने नियम-कानून हैं, संस्कार हैं, ज़रूरतें हैं और धर्म-आस्था-कर्मकाण्ड तथा रस्मोरिवाज़ के साथ भी मुसलिम युवक नए ज़माने के साथ क़दम से क़दम मिला कर चल सकते हैं।
वह ज़माना और था जब देश को बंटवारे का दंश झेलना पड़ा था और इंसानों के बीच ऐसी खाई खोद दी गई थी कि उसे पाटने में कई दशक गुज़र गए। अब दुनिया ऐसी नहीं रह गई कि किसी शुतुर्मुर्ग की तरह रेत में सिर गाड़ कर जिया जाए।
अब समय आ गया है कि प्रत्येक मुसलमान को शिक्षित होकर धर्म-कर्म की व्याख्या खुद करनी चाहिए, मुल्ला-मौलवियों द्वारा की गई व्याख्याएं मुसलमान को नए-नए खेमों में बांटती हैं और उन्हें प्रगतिशील, विकासमान होने से रोकती हैं। इस ज़बर्दस्त उपभोक्तावादी समय की ज़रूरतों का ध्यान में रखते हुए प्रत्येक मुसलमान और इंसान को अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों आदि से बचना चाहिए।
यह दौर टेक्नालाॅजी का है, मुसलिम युवकों को हुनरमंद होना चाहिए। स्वावलम्बी होकर देश की मुख्यधारा में आ जाना चाहिए। मुख्यधारा का मतलब संघ या विहिप का हिन्दुत्व नहीं बल्कि सेकुलर सोच के साथ स्वतंत्र भारत का जागरूक नागरिक बने।
यही कारण है कि उपन्यास का मुख्यपात्र यूनुस इधर-उधर भटकते हुए अंत में अपने अंदर इतनी सलाहियत पैदा कर लेता है कि स्वतंत्र भारत में इज्जत की दो रोटी स्वयं कमाने का हुनर सीख जाता है। यही तो चाहती हैं सरकारें, प्रजातंत्र का उद्देश्य भी तो यही है और यही हम भी चाहते हैं। क्यों 11 सितम्बर जैसे हादसे हों, क्यों बामियान के बुद्ध को ध्वंस किया जाए, क्यों इराक अफ़गान में कारपेट बम गिराए जाएं, क्यों कश्मीर के पंडित शरणार्थी बनें, क्यों कोई तसलीमा नसरीन की तरह शरण मांगती फिरे, क्यों गोधरा-गुजरात की घटनाएं हों…?
भाई धर्मव्रत जी, हम कहां चाहते हैं कि हमारे मुसलिम पात्र अलक़ायदा, सिमी या लश्कर के गुर्गे बनें।
भाई सलीम का दोष क्या था, यही न कि अपनी वेशभूषा और चाल-ढाल से वह एक परम्परागत मुसलमान दिखता था। यदि वह आम हिन्दू लड़कों की तरह रहता तो हो सकता है कि गुजरात के नरसंहार में बच जाता। सलीम का छोटा भाई यूनुस वह ग़लती दुहराना नहीं चाहता और बड़ी सफाई से अपनी पहचान छिपा ले जाता है। यह डर जो यूनुस के मन में आया, वह क्यों आया भाई धर्मव्रत जी। यदि दाढ़ी-टोपी और कुर्ता पाजामा पहने मुसलमान युवक, वन्देमातरम् गाता तो क्या नरेन्द्र मोदी के गुजरात में उस नरसंहार में उसकी जान बख्श दी जाती? आपने उपन्यास को हिन्दू बहुसंख्यक के नज़रिए से देखा है, अल्पसंख्यकों के मन में बैठे डर से आपको क्या हमदर्दी हो सकती है। पुत्रवती नारी, बांझ स्त्री के सामने किस तरह बात करती है और उसका दंश/डंक बांझ स्त्री को कब और कितना चुभता है ये वही बांझ स्त्री समझ सकती है। जबकि स्त्रियां दोनों हैं, बांझ भी और पुत्रवती भी।
धर्मव्रत जी, आप क्यों ऐसा सोचते हैं कि ये देश सिर्फ और सिर्फ आपका है। इस देश में सिर्फ और सिर्फ आपकी मान्यताओं का आदर होना चाहिए। आप ये बताएं कि कोई आदमी यदि गंगा किनारे पैदा न हुआ हो और गंगाजी के आशीर्वाद से वंचित रह गया हो तो उसमें उसका क्या दोष? क्या गंगा किनारे पैदा हुए आदमी ने अपनी इच्छा से गंगा किनारे जन्म पाया है?
धर्मव्रत चैधरी जी, मैंने मुसलिम परिवेश में जन्म लिया है। इसमें भला मेरा क्या दोष हो सकता है? मैंने अकबर-बाबर के ज़माने में जन्म पाया होता तब मुझे ‘पहचान’ लिखने का आईडिया नहीं आता। मैंने तो स्वतंत्र भारत में जन्म लिया है। अपने परिवेश का मुझे अच्छा संज्ञान है। अपने परिवेश का भला मुझसे अच्छा प्रवक्ता कोई और हो सकता है? मैंने इसी ‘प्रिविलेज’ को ध्यान में रखकर उपन्यास की रचना की। ऐसा नहीं कि मुझसे पहले के मुसलिम लेखकों ने या कि अन्य लेखकों ने इस विषय पर न लिखा हो, यह तो मैंने अपने नज़रिए को  सुदृढ़ करने के लिए उपन्यास विधा का सहारा लिया और भारतीय मुसलिम समाज के अंतर्विरोधों और उनके प्रति बहुसंख्यकों के रवैयों का चित्रण किया है।
क्षमा करेंगे भाई धर्मव्रत चैधरी जी, आपने नावेल पहचान की चर्चा करते हुए अपने वजूद को इस तरह रेखांकित किया है आप इस मुल्क में मकान मालिक की हैसियत रखते हैं और मैं कोई अदना सा किराएदार हूं… और यह मानसिकता और दृष्टि साहित्यिक तो नहीं हो सकती …..|

अनवर द्वारा लिखित

अनवर बायोग्राफी !

नाम : अनवर
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 296 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 207 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 315 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 274 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.