कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास: ‘पाँचवीं क़िस्त’ (अशोक कुमार पाण्डेय)

शोध आलेख कानून

अशोक 34 2018-11-17

कश्मीर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों से शोध-दृष्टि के साथ गुज़रते हुए “अशोक कुमार पाण्डेय” द्वारा लिखा गया ‘कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास’ आलेख की पांचवीं क़िस्त आज पढ़ते हैं | – संपादक

“एक तरफ किसानों को लगान के रूप में आधी से अधिक फसल के अलावा तमाम टैक्स देने पड़ते थे तो दूसरी तरफ़ बाज़ार में उसकी क़ीमत दुगनी हो गई. राजस्व विभाग पर वर्षों से कब्ज़ा जमाए बैठे कश्मीरी पंडितों ने इस तबाही का फ़ायदा अपनी तरह से उठाया और क़र्ज़ ने डूबे किसानों की ज़मीनें कब्जाईं. यहाँ यह जान लेना बेहतर होगा कि आबादी का लगभग 93 फ़ीसद हिस्सा होने के बावज़ूद मुसलमानों के पास संपत्ति का दस फ़ीसद हिस्सा भी नहीं था, हाँ परम्परागत रूप से रईस तथा कुछ धार्मिक नेताओं की संपत्तियां सुरक्षित रहीं, फलती फूलती रहीं. अंग्रेज़ों ने भी राजा का पूरा साथ दिया और उसकी नीतियों से त्रस्त जनता की सारी शिक़ायतें एक कान से सुने बिना ही अक्सर लौटा दीं.”

अफगान और  सिख : क्रूरता  के  साल  

अशोक कुमार पांडेय

अफगानों के अत्याचार की कथाएं आज तक कश्मीर में सुनी जा सकती हैं, अगले 67 सालों तक पांच अलग अलग गवर्नरों के राज में कश्मीर लूटा-खसोटा जाता रहा. अफगान शासन की एक बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें प्रशासनिक पदों पर स्थानीय मुसलमानों की जगह कश्मीर पंडितों को तरज़ीह दी गई. “ट्रेवेल्स इन कश्मीर एंड पंजाब” में बैरन ह्यूगल लिखते हैं कि पठान गवर्नरों के राज में लगभग सभी व्यापारों और रोज़गारों के सर्वोच्च पदों पर कश्मीरी ब्राह्मण पदासीन थे. संयोग ही है कि अफगान शासन के अंत के लिए भी एक कश्मीरी पंडित बीरबल धर ही जिम्मेदार हैं. आख़िरी गवर्नर आज़िम खान के समय दीवान थे पंडित सहज राम सप्रू, मुख्य सचिव थे पंडित हर दास और राजस्व विभाग बीरबल धर, मिर्जा धर और पंडित सुखराम सफाया के पास था. यहाँ यह बता देना समीचीन होगा कि मुगलों के समय राजस्व विभाग पर पंडितों का जो कब्ज़ा हुआ वह डोगरा काल तक बना रहा. छः सालों तक लगातार उपज कम होने के चलते अकाल पड़ा तो गाज बीरबल धर पर पड़ी. बीरबल धर ने लाहौर दरबार के सिख महाराज रणजीत सिंह से मदद मांगने की ठानी और एक ग्वाले कुद्दुस गोजरी के यहाँ अपने परिवार को सुरक्षित छोड़ जम्मू के राजा गुलाब सिंह की मदद से वह लाहौर दरबार पहुँचे जहाँ गुलाब सिंह के भाई राजा ध्यान सिंह प्रधानमंत्री थे. मौसम अनुकूल था, रणजीत सिंह ने तनिक देर न लगाई, किसी संभावित धोखे के ख़तरे को टालने के लिए सुखराम के बेटे को लाहौर में बंधक रखा और अपने उत्तराधिकारी खड़क सिंह के नेतृत्व में  हरि सिंह नलवा सहित अपने सबसे क़ाबिल सरदारों के साथ तीस हज़ार की फौज रवाना की. आज़िम खान अपने भाई जब्बार खान के भरोसे कश्मीर को छोड़कर काबुल भाग गया लेकिन बीरबल धर के सगे दामाद त्रिलोक चंद की गद्दारी के चलते कुद्दुस गोजरी परिवार सहित मारा गया, बीरबल धर की पत्नी ने आत्महत्या कर ली और उनकी बहू को काबुल भेज दिया गया. यह थी उन दिनों की नैतिकता जिसे सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम के पैमाने पर देखना थ्री डी फ़िल्म को चश्मा उतार कर देखने जैसा होगा. खैर, इस तरह 15 जून 1819 को कश्मीर में सिख शासन की स्थापना हुई, बीरबल धर फिर से राजस्व विभाग के प्रमुख बनाये गए और मिस्र दीवान चंद कश्मीर के गवर्नर. दीवान चंद के बाद कश्मीर की कमान आई मोती चंद के हाथों और शुरू हुआ मुसलमानों के उत्पीड़न का दौर. श्रीनगर की जामा मस्ज़िद बंद कर दी गई, अजान पर पाबंदी लगा दी गई, गोकशी की सज़ा अब मौत थी और सैकड़ों कसाइयों को सरेआम फाँसी दे दी गई. उसके एक सिपहसालार फूला सिंह ने तो शाह हमादान की खानकाह को बारूद से उड़ा ही दिया था मगर कश्मीर के रहवासी बीरबल धर को उसका महत्त्व पता था और खानकाह बच गई.  धार्मिक कट्टरपन का आतंक अभी ख़त्म नहीं हुआ था कि नए गवर्नर हरि सिंह नलवा ने वहां लूट-खसोट की सीमाएं पार कर दीं, इस हद तक कि यह बीरबल धर के लिए भी नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त था. किसानों में त्राहि-त्राहि मच गई और ऐसा अकाल पड़ा कि आठ लाख रहवासियों वाली घाटी में बस दो लाख लोग ज़िंदा बचे.[i]

साभार google से

डोगरा राजवंश : अंग्रेज़ों  के  ज़रखरीद ग़ुलाम 

1839 में रणजीत सिंह की मौत के साथ लाहौर का सिख साम्राज्य बिखरने लगा. अंग्रेज़ों के लिए यह अफगानिस्तान की ख़तरनाक सीमा पर नियंत्रण का मौक़ा था तो जम्मू के राजा गुलाब सिंह के लिए खुद को स्वतंत्र घोषित करने का. लाहौर में फैली अफरातफरी का फ़ायदा उठा कर अंग्रेज़ों ने 1845 में लाहौर पर आक्रमण कर दिया और अंततः दस फरवरी 1846 को सोबरांव के युद्ध में निर्णायक जीत हासिल की और रणजीत सिंह के साथ 1909 में हुई मित्रता संधि के उल्लंघन का आरोप उल्टा उनके पुत्र दलीप सिंह पर लगाकर उसे अपने संरक्षण में पंजाब का राजा बनाने के बदले डेढ़ करोड़ रुपयों की मांग करते हुए 9 मार्च 1946 को लाहौर की संधि की. दलीप सिंह की धन देने में असमर्थता की आड़ में उनके सभी किलों, ज़मीन-ज़ायदाद और ब्यास से सिंधु तक के बीच का सारा क्षेत्र अब ब्रिटिश सरकार की संपत्ति बन गया जिसमें कश्मीर और हज़ारा भी शामिल थे. इसके बाद 16 मार्च, 1846 को अंग्रेज़ों ने गुलाब सिंह के साथ अमृतसर संधि की जिसमें 75 लाख रुपयों के बदले उन्हें सिंधु के पूरब और रावी नदी के पश्चिम का जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के इलाक़े की सार्वभौम सत्ता दी गई, गुलाब सिंह अंग्रेज़ों से यह समझौता पहले ही कर चुका था बस कोशिश क़ीमत कम कराने की थी जो संभव नहीं हुआ.[ii] इस तरह अपने पूर्व शासक रणजीत सिंह के बेटे को धोखा देकर 75 लाख रुपयों के बदले गुलाब सिंह ने जम्मू और कश्मीर का राज्य अंग्रेज़ों से ख़रीदा और यह इतिहास में पहली बार हुआ कि ये तीन क्षेत्र एक साथ मिलकर स्वतन्त्र राज्य बने.[iii]ख़ुद को अंग्रेज़ों का ज़रख़रीद ग़ुलाम कहने वाला[iv] यह राजा और उसका खानदान ताउम्र अंग्रेज़ों का वफ़ादार रहा, 1857 का राष्ट्रीय विद्रोह हो कि तीस के दशक में पनपे अनेक राष्ट्रीय आन्दोलन, कश्मीर के राजाओं ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लगने वाले किसी भी विद्रोह को अपनी ज़मीन पर पनपने नहीं दिया, उन्होंने क़ीमत दी थी कश्मीर की और उसे हर क़ीमत पर वसूलना था. किसानों और बुनकरों से इस दर्ज़ा टैक्स वसूला गया कि उनका जीना मुहाल हो गया. कश्मीरी शाल तब तक नेपोलियन की पत्नी के पहने जाने के बाद यूरोप में फ़ैशन बन गई थी. मांग बढ़ी और उत्पादन भी लेकिन इसका लाभ टैक्स के रूप में राजा के खज़ाने में गया. अनाज अब राजा खुद बेचता था. कालाबाज़ारी हद से अधिक बढ़ गई. एक तरफ किसानों को लगान के रूप में आधी से अधिक फसल के अलावा तमाम टैक्स देने पड़ते थे तो दूसरी तरफ़ बाज़ार में उसकी क़ीमत दुगनी हो गई. राजस्व विभाग पर वर्षों से कब्ज़ा जमाए बैठे कश्मीरी पंडितों ने इस तबाही का फ़ायदा अपनी तरह से उठाया और क़र्ज़ ने डूबे किसानों की ज़मीनें कब्जाईं. यहाँ यह जान लेना बेहतर होगा कि आबादी का लगभग 93 फ़ीसद हिस्सा होने के बावज़ूद मुसलमानों के पास संपत्ति का दस फ़ीसद हिस्सा भी नहीं था, हाँ परम्परागत रूप से रईस तथा कुछ धार्मिक नेताओं की संपत्तियां सुरक्षित रहीं, फलती फूलती रहीं. अंग्रेज़ों ने भी राजा का पूरा साथ दिया और उसकी नीतियों से त्रस्त जनता की सारी शिक़ायतें एक कान से सुने बिना ही अक्सर लौटा दीं. आख़िर उनके लिए कश्मीर एक सुरक्षित स्वर्ग था तफ़रीह और अय्याशी के लिए और गुलाब सिंह जैसे मेज़बान को छोड़कर ग़रीब किसानों और बुनकरों की आवाज़ भला वह क्यों सुनते?[v] गुलाब सिंह के रहते तो कश्मीर में उन्होंने अपना रीजेंट भी नहीं नियुक्त किया.

साभार google से

डोगरा और पंजाबियों के साथ-साथ कश्मीरी पंडितों को प्रशासन और खासतौर पर राजस्व विभाग में सबसे ऊंचे पद दिए गए तथा बहुसंख्यक कश्मीरी मुसलमानों का बड़ा हिस्सा खेती-किसानी और बुनकर के पेशे से जुड़ा हुआ था. सिखों के समय से चले आ रहे धार्मिक भेदभाव खासतौर से गुलाब सिंह के पुत्र रणबीर सिंह के दौर में और बढ़ गए. यहाँ एक और बात कहनी ज़रूरी है, आमतौर से माना जाता है कि उस दौर में हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव जैसी कोई चीज़ नहीं थी और अंग्रेज़ गवर्नर लॉरेंस जैसे तमाम लोगों ने लिखा है कि हिन्दू-मुसलमानों में फ़र्क करना ही मुश्किल था. लेकिन इस रूमानी तस्वीर के पीछे सच इतना सीधा नहीं है. पहली बात तो यह कि हिन्दू धर्म के जिस गैरबराबरी के चलते इस्लाम आया था अब वह उसका हिस्सा बन चुकी थी. सुन्नियों में शेख, सैयद, मुग़ल, पठान जैसी ऊंची जातियों के अलावा बकरवाल, डोम और वाटल जैसे नीची जाति के सदस्य भी थे और आपसी शादी ब्याह जातिगत श्रेष्ठताओं से संचालित होता था तो घाटी में 5 प्रतिशत शियाओं के साथ उनका विवाद भी लगातार रहा. 1872 में शिया-सुन्नी विवाद हुआ जिसकी जड़ में भयानक करारोपण से बर्बाद होते शाल उद्योग में बुनकरों का सुन्नी और मालिकान का शिया होना था. 1880 आते आते वहां वहाबी किस्म का कट्टर इस्लाम प्रवेश कर चुका था और पारम्परिक सूफ़ी-ऋषि परम्परा को ग़ैर इस्लामी बता रहा था. इसी के आसपास आर्य समाज सहित हिन्दुओं के कट्टर संगठन बनने लगे थे जो इस्लाम पर सीधा हमला करते थे. आपसी तकरार के तमाम उदाहरण मृदु राय की बेहद महत्त्वपूर्ण किताब ‘हिन्दू रूलर्स एंड मुस्लिम सब्जेक्ट” में मिलते हैं.

एक बड़ा फैसला डोगरा राजाओं ने फ़ारसी की जगह उर्दू को राजभाषा बनाकर किया (जी. कश्मीर में उर्दू मुसलमान नहीं सिख लेकर आये थे) इसका परिणाम यह हुआ कि सदियों से फ़ारसी में प्रशिक्षित कश्मीरी पंडितों के लिए राज्य प्रशासन की परीक्षा पास करना मुश्किल हो गया और पंजाबी प्रशासन में भरने लगे. उसी दौर में पंडितों और डोगराओं ने इसका विरोध किया और राज्य की नौकरी राज्य के निवासियों की जो मांग उठी वह डोगरा शासन की विदाई के बाद तक सुनाई देती रही.

-: क्रमशः…..

[i] देखें, वही, पेज़ 53-55

[ii] देखें, अ हिस्ट्री ऑफ़ सिख्स, खुशवंत सिंह, प्रिंसटन-1963

[iii] देखें, पेज़ 26-27, हिन्दू रूलर्स-मुस्लिम सब्जेक्ट, मृदु राय, परमानेंट ब्लैक, रानीखेत, 2004

[iv] देखें, पेज़ 59, कश्मीर बिहाइंड द वेल, एम् जे अकबर, रोली बुक्स, दिल्ली 2002

[v] देखें, पेज़ 65, वही

अशोक द्वारा लिखित

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

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