कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास: ‘चौथी क़िस्त’ (अशोक कुमार पाण्डेय)

शोध आलेख कानून

अशोक 45 2018-11-17

कश्मीर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों से शोध-दृष्टि के साथ गुज़रते हुए “अशोक कुमार पाण्डेय” द्वारा लिखा गया ‘कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास’ आलेख की चौथी क़िस्त आज पढ़ते हैं | – संपादक

अली  शाह  के  छोटे भाई शाही खान उसे सत्ता से अपदस्थ कर ज़ैनुल आब्दीन के नाम से गद्दी पर बैठा और उसने अपने पिता तथा भाई की साम्प्रदायिक नीतियों को पूरी तरह से बदल दिया. उसका आधी सदी का शासन काल कश्मीर के इतिहास का सबसे गौरवशाली काल माना जाता है. जनता के हित में किये उसके कार्यों के कारण ही कश्मीरी इतिहास में उसे बड शाह यानी महान शासक कहा जाता है. ज़ैनु-उल-आब्दीन का सबसे बड़ा क़दम धार्मिक भेदभाव की नीति का ख़ात्मा करना था. अपने पिता और भाई के विपरीत उसने हिन्दुओं के प्रति दोस्ताना रुख अपनाया और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता दी.    

सिकन्दर ‘बुतशिकन’ 

अशोक कुमार पांडेय

लेकिन सुल्तान सिकंदर का समय आते-आते परिस्थितियाँ बदल गईं. 1393 में सैयद अली हमदानी के साहबज़ादे मीर सैयद मुहम्मद हमदानी (1372-1450) की सरपरस्ती में सूफी संतों और उलेमाओं की दूसरी खेप कश्मीर आई. अपने पिता के विपरीत मीर हमदानी इस्लाम की स्थापना के लिए हर तरह की ज़ोर ज़बरदस्ती का हामी था या  यों  कहें  कि  तब  तक  इसके  लिए  अनुकूल  माहौल बन  चुका था. कश्मीर में उसी समय सक्रिय सैयद हिसारी जैसे सहिष्णु सूफ़ियों के विपरीत उसने इस्लामीकरण के लिए मिशनरी ज़ज्बे से काम किये और सिकन्दर पर अपने प्रभाव का पूरा इस्तेमाल करते हुए 12 सालों के कश्मीर प्रवास में सत्ता और धर्म के चरित्र को इस कदर बदल कर रख दिया उसे में सिकन्दर बुतशिक़न के नाम से जाना गया. हमदानी के प्रभाव में सबसे पहले जो लोग आये उनमें सुल्तान का ताक़तवर मंत्री सुहा भट्ट था. हमदानी ने उसका धर्म परिवर्तन कर मलिक सैफुद्दीन का नाम दिया और उसकी बेटी से विवाह किया. सुहा भट्ट ने कालान्तर में अपनी क्रूरता से सबको पीछे छोड़ दिया और सिकन्दर के नेतृत्व में कश्मीर में मंदिरों के ध्वंस और धर्मपरिवर्तन का संचालक बना. इस दौर को कश्मीर में ताक़त के ज़ोर से इस्लामीकरण का दौर कहा जा सकता है जिसके बारे में जोनाराजा ने कहा है कि “जनता का सौभाग्य उनका साथ छोड़ गया, सुल्तान राजधर्म भूल गया और दिन रात मूर्तियाँ तोड़ने में आनंद लेने लगा.”  फ़रिश्ता ने लिखा है कि सुहा भट्ट के प्रभाव में सुल्तान ने शराब, संगीत, नृत्य और जुए पर पाबंदी लगा दी, हिन्दुओं पर जज़िया लगा दिया गया और माथे पर कश्का (तिलक) लगाना प्रतिबंधित कर दिया गया, सोने और चाँदी की सभी मूर्तियों को पिघला कर सिक्कों में तब्दील कर दिया गया और सभी हिन्दुओं को मुसलमान बन जाने के आदेश दिए गए. हालाँकि इसी धार्मिक पागलपन के चलते सती प्रथा पर जो बंदिश लगी उसने कश्मीर से इस कुप्रथा का लगभग अंत ही कर दिया.कश्मीर में अफ़रातफ़री मच गई, मार्तंड, अवन्तीश्वर, चक्रधर, त्रिपुरेश्वर, सुरेश्वर और पारसपुर के प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया. हिन्दुओं के सामने इस्लाम अपनाने, देश छोड़ देने या आत्महत्या करने के ही विकल्प बचे थे. बड़ी संख्या में लोगों ने धर्म परिवर्तन स्वीकार कर लिया. केवल कुछ ब्राह्मणों ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. उनमें से अधिकाँश ने देश छोड़ दिया और बाक़ी ने आत्महत्या कर ली. कुछ विद्वानों ने तो माना है कि उस दौर में बस 11 कश्मीरी पंडित परिवार बचे थे.[i] जोनाराजा की मानें तो कोई मंदिर साबुत नहीं बचा था.

साभार google से

लेकिन उसी दौर में सैयद हिसारी जैसे सहिष्णु सूफ़ी भी थे जिनके दबाव में आखिरकार सुलतान को इस्लामीकरण की सीमा तय करनी पड़ी और जज़िया कम करने के साथ कुछ और क़दम उठाने पड़े. इन क़दमों से मीर हमदानी इतना आहत हुआ कि 12 साल के प्रवास के बाद अपने पिता की ही तरह अपने कई महत्त्वपूर्ण शिष्यों को इस्लाम का प्रचार जारी रखने के लिए छोड़कर वह भी कश्मीर से चला गया. वर्तमान मीरवायज़ हमदानी के उन शिष्यों में से एक सिद्दीकुल्लाह त्राली के खानदान से हैं जो उस समय त्राल में बसे लेकिन बाद में श्रीनगर आ गए थे. बाद के दौर में ऋषि आन्दोलन से ज़ोर पकड़ा और कश्मीर में अंततः जो इस्लाम स्थापित हुआ वह बाहर से आये सूफिओं का भी नहीं बल्कि स्थानीय ऋषियों का इस्लाम था जिसके नायक नन्द ऋषि ऊर्फ शेख नुरूद्द्दीन थे. मान्यता है कि नन्द ऋषि को लल द्यद ने अपना दूध पिलाया था. सादा जीवन, त्याग, समानता और साम्प्रदायिक सद्भाव वाला यह इस्लाम उन्नीस सौ साठ के दशक में अहले हदीस और जमात जैसे कट्टरपंथी आन्दोलनों के पहले तक वहां बना रहा.

1413 में सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसका बेटा अली शाह जब गद्दी पर बैठा तो सत्ता पूरी तरह सुहा भट्ट के हाथ में थी और उसने अपना साम्प्रदायिक अभियान और क्रूरता से चलाया. जोनराजा बताते हैं कि सिकन्दर का नियंत्रण समाप्त होने बाद उसकी क्रूरताएँ और बढ़ गईं. अपने पूर्व समुदाय को उसने तलवार की नोक पर मुस्लिम बनाया. मौलानाओं ने सुलतान से मनमुताबिक नीतियाँ बनवाईं. लेकिन यह आज़ादी केवल चार साल चल पाई. 1417 में जब सुहा भट्ट की मौत तपेदिक से हुई तो क्रूरताओं से कराहते कश्मीर की एक स्वर्णयुग प्रतीक्षा कर रहा था.

ज़ैनुलआब्दीन : ‘बड शाह’ 

साभार google से

अली  शाह  के  छोटे भाई शाही खान उसे सत्ता से अपदस्थ कर ज़ैनुल आब्दीन के नाम से गद्दी पर बैठा और उसने अपने पिता तथा भाई की साम्प्रदायिक नीतियों को पूरी तरह से बदल दिया. उसका आधी सदी का शासन काल कश्मीर के इतिहास का सबसे गौरवशाली काल माना जाता है. जनता के हित में किये उसके कार्यों के कारण ही कश्मीरी इतिहास में उसे बड शाह यानी महान शासक कहा जाता है. ज़ैनु-उल-आब्दीन का सबसे बड़ा क़दम धार्मिक भेदभाव की नीति का ख़ात्मा करना था. अपने पिता और भाई के विपरीत उसने हिन्दुओं के प्रति दोस्ताना रुख अपनाया और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता दी. एम डी सूफ़ी तबाक़त ए अक़बरी के हवाले से बताते हैं कि सुल्तान ने हिन्दुओं से अपने धर्म ग्रन्थों में लिखी बातों का उल्लंघन न करने का राजीनामा लेकर सिकंदर के समय में बने उन तमाम क़ानूनों को रद्द कर दिया जो धार्मिक असमानता पर आधारित थे. जज़िया की दर चाँदी के दो पल (सिक्कों) से घटाकर एक माशा चाँदी कर दिया और इसे भी कभी वसूला नहीं गया. इसी तरह हिन्दुओं की अंत्येष्टि पर लगाया कर भी समाप्त कर दिया गया. तिलक लगाने आदि पर लगी रोक को हटाकर धार्मिक मामलों में पूरी आज़ादी दी गई. सौहार्द्र बढ़ाने का एक बड़ा क़दम उठाते हुए गो हत्या पर पाबंदी लगा दी गई. जो हिन्दू कश्मीर छोड़कर जम्मू सहित दूसरी जगहों पर जा बसे थे उन्हें वापस बुलाया गया और जिन्होंने भय से धर्म परिवर्तन कर लिया था उन्हें फिर से अपने धर्म में लौटने की सहूलियत दी गई. टूटे हुए मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया गया और कई नए मंदिर बनवाये भी गए. पंडित श्रीवर बताते हैं कि महल के भीतर के कई मंदिरों का सुल्तान ने जीर्णोद्धार कराया और नए मंदिर भी बनवाये. श्रीनगर में रैनावारी में हिन्दू राजाओं द्वारा तीर्थयात्रियों के भोजन आदि के व्यवस्था के लिए बनाए गए स्थान को उसने और विस्तृत कराकर उनके रुकने की व्यवस्था भी की. हिन्दू बच्चों के लिए पाठशालाएं खोलीं गईं तथा संस्कृत सीखने के लिए छात्रों को छात्रवृत्ति देकर दकन और बनारस भेजा गया. मंदिरों और पाठशालाओं की देखरेख के लिए उन्हें जागीरें दी गईं. कई हिन्दुओं और बौद्धों को शासन के उच्च पदों पर नियुक्ति दी गई. साथ में राज्य सेवाओं में निचले स्तरों पर भी उन्हें अवसर दिए गए. इसी काल में कश्मीरी हिन्दुओं के बीच “कारकून” और “पुजारी (बछ भट्ट)” जैसी दो श्रेणियों का विकास हुआ, जिनमें आपस में शादी ब्याह नहीं होता. कारकून श्रेणी के पंडितों ने फ़ारसी सीखी और शासन व्यवस्था में शामिल हुए. एक तीसरी श्रेणी ज्योतिषियों की विकसित हुई जिनका कारकूनों के साथ रोटी बेटी का सम्बन्ध होता है. ज़ाहिर है पुजारी वर्ग स्वयं को सबसे उच्च मानता है. संस्कृत के अलावा इस दौर में हिन्दुओं ने फ़ारसी का भी अध्ययन किया. मुंशी मुहम्मद-उद-दीन की किताब तारीख़-ए-अक्वान-ए-कश्मीर के हवाले से सूफ़ी बताते हैं कि जिन हिन्दुओं ने सबसे पहले फ़ारसी और इस्लामी साहित्य की तालीम हासिल की वे सप्रू थे. सर मोहम्मद इक़बाल इसी वंश के थे जिनके परिवार ने औरंगज़ेब के समय इस्लाम स्वीकार कर लिया था. इस वंश के दूसरे प्रतिष्ठित नाम सर तेज़ बहादुर सप्रू थे. मैंने उस दौर पर लिखी बीसियों किताबें पढ़ते तमाम मुद्दों पर असहमत लेखकों और इतिहासकारों को ज़ैन उल आब्दीन के शासनकाल की मुक्त कंठ प्रशंसा में लगभग एक स्वर में करते पाया है, और उसकी सबसे बड़ी वज़ह है ज़ैन उल आब्दीन का जनता के प्रति अथाह स्नेह और समर्पण. उसके पचास साल के शासन काल में कश्मीर के सामाजिक-आर्थिक –सांस्कृतिक जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं था जो अनछुआ छूटा हो. धार्मिक सहिष्णुता, आर्थिक स्वावलंबन, राजनैतिक स्थिरता, सांस्कृतिक उत्थान और ज्ञान-विज्ञान का आम जन तक प्रसार ऐसे क़दम थे जिन्होंने कश्मीर को पूरी तरह बदल दिया. उसके बनवाये तमाम भवन भले समय की मार से नष्ट हो गए हैं, लेकिन उसके दौर में विकसित हुए जीवन मूल्य कश्मीर के सामाजिक जीवन में आज भी मौज़ूद हैं और इन अँधेरे वक्तों में भी उम्मीद की लौ की तरह टिमटिमाते हैं.

लेकिन उसकी मृत्यु के बाद शाह मीर वंश का पतन शुरू हो गया और 1540 में हुमायूं के एक सिपहसलार मिर्ज़ा हैदर दुगलत ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. उसका शासनकाल 1561 में समाप्त हुआ जब स्थानीय लोगों के एक विद्रोह में उसकी हत्या कर दी गई. उसके बाद चले सत्ता संघर्ष में चक विजयी हुए और अगले 27 सालों तक कश्मीर में लूट, षड्यंत्र और अत्याचार का बोलबाला इस क़दर हुआ कि कश्मीर के कुलीनों के एक धड़े ने बादशाह अकबर से हस्तक्षेप की अपील की. अकबर की सेना ने 1589 में कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया और इस तरह कश्मीर मुग़ल शासन के अधीन आ गया. इस खूनखराबे के बीच आख़िरी चक सुल्तान युसुफ शाह और उसकी प्रेमिका हब्बा ख़ातून का एक मासूम सा क़िस्सा भी है. अकबर द्वारा गिरफ़्तार युसुफ के बिछोह में लिखे हब्बा ख़ातून के गीत आज भी कश्मीर में बेहद लोकप्रिय हैं.

कश्मीरी प्रजा : गैर कश्मीरी शासक 

 16 अक्टूबर 1586 को जब मुग़ल सिपहसालार कासिम खान मीर ने याक़ूब खान को हराकर कश्मीर पर मुग़लिया सल्तनत का परचम फ़हराया तो फिर अगले 361 सालों तक घाटी पर ग़ैर कश्मीरियों का शासन रहा- मुग़ल, अफ़गान, सिख, डोगरे.

1589 में जून के महीने में अकबर पहली बार श्रीनगर पहुँचा और उसने जो पहले दो काम किये वे थे एकसमान और न्यायपूर्ण लगान तय करना तथा हिन्दुओं पर लगा जज़िया हटाना. उस समय तक हर पुजारी को साल के 40 पण सुल्तान को भेंट के रूप देने पड़ते थे, अकबर ने इस प्रथा तथा ऐसे तमाम नियमों को रद्द करवा दिया जो साम्प्रदायिक भेदभाव प्रकट करते थे.[ii] उसके समय में कश्मीरी पंडित एक बार फिर दरबार में प्रविष्ट हुए और पंडित तोताराम पेशकार के पद तक पहुँचे. डल झील पर हाउसबोटों का विचार सबसे पहले अकबर को ही आया था और आज भी डल पर तैरती हाउसबोट कश्मीर के ख़ुशनुमा दिनों का प्रतीक सी लगती है. उसकी दूसरी यात्रा के समय दीवाली का त्यौहार था और बादशाह ने झेलम नदी में जहाज़ों और आसपास के पूरे क्षेत्र में दिए जलवाए. 1597 में जब वह तीसरी बार कश्मीर गया तो अकाल पड़ा हुआ था, अकबर ने लोगों को आर्थिक सहायता देने की जगह निर्माण कार्य शुरू करवाए और उचित मज़दूरी दी जिससे अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर आ गई. कुल मिलाकर अकबर से लेकर शाहजहाँ तक का समय बाहरी राज्य के बावज़ूद कश्मीर की जनता के लिए सुख और समृद्धि का समय था. जहाँगीर का कश्मीर प्रेम तो जग प्रसिद्ध है, उसका बनवाया मुग़ल गार्डेन आज भी अपनी ख़ूबसूरती में दुनिया के किसी बाग़ को शर्मिन्दा कर सकता है. कहते हैं मृत्युशैया पर जब उसकी आख़िरी इच्छा पूछी गई तो उसने कहा – कश्मीर. कश्मीर की आर्थिक प्रगति तो हुई इस काल में लेकिन मोहम्मद इशाक खान अपनी किताब “पर्सपेक्टिव्स ऑफ़ कश्मीर” में एक जायज़ सवाल उठाते हैं कि – इस काल में कश्मीर में सांस्कृतिक, साहित्यिक प्रगति क्यों रुक गई थी?

औरंगज़ेब का समय आते आते स्थितियाँ बदलीं, उसने अपनी कट्टरपंथी नीतियाँ वहां लागू करने की कोशिश की. सिर्फ हिन्दू ही इसका शिकार नहीं हुए बल्कि कश्मीर की अल्पसंख्यक शिया आबादी के साथ भी दुश्मनाना व्यवहार हुआ. उसके बाद मुग़ल शासन के पतन के साथ साथ कश्मीर में भी स्थितियाँ बदतर हुईं. अगले 46 सालों में कश्मीर में 57 गवर्नर बदले. बहादुर शाह के वक़्त कश्मीर का गवर्नर बना महताबी खान उर्फ़ मुल्ला अब्दुन नबी. हिन्दुओं और शियाओं पर उसने वो वो कहर किये कि इंसानियत काँप जाए. 1720 में शियाओं और पंडितों ने उसके ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया और मुल्ला मारा गया. लेकिन उसके बेटे मुल्ला सैफरुद्दीन ने बदला लिया और शिया मुहल्ला ज़ादीबल ख़ाक में तब्दील हो गया. साल भर बाद दिल्ली से आये अब्दुर समद खान ने उसे गिरफ़्तार कर पचास सिपहसालारों के साथ मौत की सज़ा तो दी लेकिन हालात बिगड़ते चले गए. 1724, 1735 और 1746 में आई बाढ़ में कश्मीर तबाही की कगार पर पहुँच गया. दिल्ली में कमज़ोर हो चुकी सल्तनत के हाथ से कश्मीर का जाना अब वक़्त की बात थी और 1753 में अहमद शाह अब्दाली के नेतृत्व में अफगानों ने कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया.[iii]

-: क्रमशः…..

[i] आनंद कौल बम्ज़ाई, द कश्मीरी पंडित, कलकत्ता 1924 ; आर सी काक, एंसियेंट मान्यूमेंट ऑफ़ कश्मीर, 1933, लन्दन ; लॉरेन्स, (पूर्वोद्धृत पुस्तक) 1895

[ii] देखें, पेज़ 41-43, कश्मीर बिहाइंड द वेल, एम् जे अकबर, रोली बुक्स, दिल्ली 2002

[iii] देखें, वही, पेज़ 50

अशोक द्वारा लिखित

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हनीफ मदार 228 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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