मासूम से राही मासूम रज़ा तक…: साक्षात्कार (हनीफ मदार)

बहुरंग साक्षात्कार

हनीफ मदार 37 2018-11-17

राही मासूम रजा का नाम वर्तमान युवा वर्ग के बीच से उसी तरह गुमनाम होता जा रहा है जिस तरह प्रेमचन्द, त्रिलोचन शास्त्री, यशपाल, रांगेय राघव, नागार्जुन, मुक्तिबोध जैसे अनेक नामों से वर्तमान बाजार में भटकी युवा पीढ़ी अनभिज्ञ है जबकि इन लेखकों को कमोबेश कोर्सों में भी पढ़ाया जाता रहा है फिर भी लोग इनसे या इनके रचनाकर्म से अंजान हैं, वहीं राही मासूम रजा के साथ तो यह सकारात्मक पहलू भी नहीं रहा है तब तो वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए यह नाम और भी अजनबी हो जाता है। कहना न होगा कि राही मासूम रजा हिन्दी साहित्य का एक ऐसा नाम है जो केवल साहित्य लेखन तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि उनके लेखकीय रचना कर्म को किसी गद्य या काव्य के विशेष खाँचे में या फिर हिन्दी या उर्दू किसी एक भाषा के साथ जोड़कर समायोजित करना आसान नहीं है। जहाँ उन्होंने आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, असंतोष के दिन, कटरा बी आर्जू, नीम का पेड़ और सीन-७५ उपन्यास हिन्दी में लिखे। वहीं मुहब्बत के सिवा उर्दू में लिखा गया उपन्यास है। मैं एक फेरीवाला’कविता-संग्रह हिन्दी में रचा जबकि ‘नया साल मौजे गुल, मैजे सबा, रक्सेमय, अजनबी शहर अजनबी रास्ते’ जैसे कविता संग्रहों की रचना उर्दू में की इतना ही नहीं उनका बहुचर्चित महाकाव्य १८५७’ समान रूप से हिन्दी-उर्दू दोनों भाषाओं में रचा गया। मुम्बई जाकर फ़िल्मी लेखन की शुरुआत के साथ ‘नीम का पेड़’ एवं लोक प्रचलित महाकाव्य “महाभारत” का संवाद लेखन कर इतिहास बना डालने वाले राही मासूम रजा के व्यक्तित्व के विषय में जानने एवं ‘आधा गाँव’ का वह दब्बू-सा मासूम अपनी कलम की धार पर चलकर कैसे राही मासूम रजा बन गया इन्हीं तमाम उत्सुकताओं पर ‘राही मासूम रजा’ की सबसे लाडली और प्यारी बहन ‘सुरैया बेगम’ से इलाहाबाद में उनके आबास पर हुई मेरी बात-चीत का संक्षिप्त रूप आप सब के सामने, “राही मासूम रज़ा” के 90 वें जन्मदिवस पर ।

मासूम से राही मासूम रज़ा तक… 

(हनीफ मदार)

हनीफ मदार

राही मासूम रजा का नाम वर्तमान युवा वर्ग के बीच से उसी तरह गुमनाम होता जा रहा है जिस तरह प्रेमचन्द, त्रिलोचन शास्त्री, यशपाल, रांगेय राघव जैसे अनेक नामों से वर्तमान बाजार में भटकी युवा पीढ़ी अनभिज्ञ है जबकि इन लेखकों को कमोबेश कोर्सों में भी पढ़ाया जाता रहा है फिर भी लोग इनसे या इनके रचनाकर्म से अंजान हैं, वहीं राही मासूम रजा के साथ तो यह सकारात्मक पहलू भी नहीं रहा है तब तो वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए यह नाम और भी अजनबी हो जाता है। कहना न होगा कि राही मासूम रजा हिन्दी साहित्य का एक ऐसा नाम है जो केवल साहित्य लेखन तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि उनके लेखकीय रचना कर्म को किसी गद्य या काव्य के विशेष खाँचे में या फिर हिन्दी या उर्दू किसी एक भाषा के साथ जोड़कर समायोजित करना आसान नहीं है। जहाँ उन्होंने आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, असंतोष के दिन, कटरा बी आर्जू, नीम का पेड़ और सीन-७५ उपन्यास हिन्दी में लिखे। वहीं मुहब्बत के सिवा उर्दू में लिखा गया उपन्यास है। मैं एक फेरीवाला’कविता-संग्रह हिन्दी में रचा जबकि ‘नया साल मौजे गुल, मैजे सबा, रक्सेमय, अजनबी शहर अजनबी रास्ते’ जैसे कविता संग्रहों की रचना उर्दू में की इतना ही नहीं उनका बहुचर्चित महाकाव्य १८५७’ समान रूप से हिन्दी-उर्दू दोनों भाषाओं में रचा गया।
मुम्बई जाकर फ़िल्मी लेखन की शुरुआत के साथ ‘नीम का पेड़’ एवं लोक प्रचलित महाकाव्य “महाभारत” का संवाद लेखन कर इतिहास बना डालने वाले राही मासूम रजा के व्यक्तित्व के विषय में जानने एवं ‘आधा गाँव’ का वह दब्बू-सा मासूम अपनी कलम की धार पर चलकर कैसे राही मासूम रजा बन गया इन्हीं तमाम उत्सुकताओं पर ‘राही मासूम रजा’ की सबसे लाडली और प्यारी बहन ‘सुरैया बेगम’ से इलाहाबाद में उनके आबास पर हुई मेरी बात-चीत का संक्षिप्त रूप आप सब के सामने, “राही मासूम रज़ा” के 92 वें जन्मदिवस पर ।

ट्रेन से उतरते ही मेरा सामना तेज बारिश से हुआ हालाँकि भीषण गर्मी में बारिश ने इलाहाबाद का मौसम बड़ा रंगीन बना दिया था। मैं प्लास्टिक की बरसाती टाँगे एक रिक्शे से होटल तक पहुँच सका। शहर की बरसात जैसे मुझे भिगोने पर आमादा थी और उसे तभी शान्ति मिली जब मैं रिक्शे में ही पूरी तरह भीग गया। कपड़े बदलते ही हम अपने गन्तव्य नादिराबाद, मकान नं० ३०३, पीपल चौराहे के पास जाने के लिए निकल लिये | रिक्शे वाले ने पीपल चौराहे पर छोड़ दिया मेरी कल्पना में था कि चौराहे पर बड़ा-सा पीपल का पेड़ होगा | मैंने वहाँ रिक्शे वाले से चौंककर पूछा कि भैय्या पीपल तो यहाँ कहीं दिखाई ही नहीं दे रहा तो रिक्शे वाले ने भी अनभिज्ञता में खीसें निपोरीं और चला गया। हम लोग जोगीघाट के रास्ते पर चलते हुए म०नं० ३०३ में पहुँचे। घर के लॉन में खड़े अमरूद के पेड़ों पर इलाहाबादी छोटे-छोटे अमरूद हमारे स्वागत में हवा में झूमने लगे बाहर कमरे में बिना ज्यादा इंतजार के बाद सफेद सलवार कुर्ते पर काला आधा नक़ाब डाले सुरैया बेगम नमूदार हुई। बातचीत का सिलसिला उनके परिवार के विषय में जानकारी से हुआ। बेगम से हुई राही मासूम रजा के संदर्भ में सवाल जवाब के रूप में सीधी बातचीत-

सबसे पहले आप अपने और अपने परिवार के विषय में कुछ बताएँ।
मैं सुरैया बशीर आबदी मेरे वालिद बशीर हसन आबदी और वालिदा का नाम नफीसा बेगम अली आबदी, हम सब भाई बहनों में मासूम भाई मुझे हद से ज्यादा प्यार करते थे और उनकी चाहत का उनके ख्यालात का बहुत असर मेरे ऊपर रहा है। मेरी बहनों में से किसी ने कोई स्कूल की तालीम हासिल नहीं की सिवाय मेरे मगर मेरी पढ़ाई-लिखाई में सबसे बड़ा हाथ मासूम भाई का था | अगर उन्होंने और उनकी पत्नी ने मेरा नाम स्कूल में न लिखाया होता तो मैं भी यूँ ही और बहनों की तरह ही रह जाती। हालाँकि इंटर पास करने के बाद मेरी शादी हो गयी, लेकिन मासूम भाई की चाहत थी मुझे और पढ़ाने की सो शादी के बाद मैंने एम०ए० किया। डबल एम०ए० किया एल०टी० किया लेकिन इस एजूकेशन के दौरान बहुत बार आर्थिक मदद मासूम भाई ने मुझे की जबकि मैंने या मेरे शौहर ने कभी नहीं कहा कि हमें खर्चा चाहिए |उनका कहना था यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम तुम्हारी एजूकेशन पूरी करने के बाद ही तुम्हारी शादी करते। तो इस तरह हमारी पढ़ाई का पूरा श्रेय मासूम भाई को जाता है।

उनके कई उपन्यासों पर काम भी किया, पढ़ा भी लेकिन राही के मानवीय व्यक्तित्व के विषय में उनके ही परिवार के किसी सदस्य से जानकारी पाना एक सुखद अनुभव था | राही के लेखन की शुरुआत बहुत बचपने से हो गयी थी बचपन में छोटा-छोटा लिखा करते थे। हमें याद है कि बचपन में उनके पैर की हड्डी टूट गयी थी तो बच्चे उन्हें चिढ़ाते थे तो कभी-कभी हमें यह लगता था कि जब वे ज्यादा फ्रस्टेट होकर आते थे तो उन बातों को अपनी लेखनी के माध्यम से व्यक्त करके शान्त होते थे | इस तरह उनके लेखन की शुरुआत हो गयी थी। इन्टर करने के बाद वे इलाहाबाद आ गये और इ०वि०वि० से उन्होंने बी०ए० किया उसके बाद आप अलीगढ़ चले गये | गाजीपुर में तो कम ही समय गुज़रा लेकिन फिर भी उनके काफी दोस्त वहाँ थे और जिन्दगी के आखिरी वक्त तक उन्होंने उन लोगों को अपना दोस्त ही समझा और इन लोगों के सम्पर्क में भी रहे और वे लोग भी, इस बात पर फ़र्क करते थे कि भाई मासूम यहाँ से चले गये हैं इतने बड़े लेखक हो गये हैं लेकिन फिर भी हमें याद करते हैं वे उनसे खत से फ़ोन से ताल्लुक बनाये रखते थे तो एक अच्छे इंसान के रूप में उन्हें आज भी लोग वहाँ याद करते हैं।

उर्दू पर उनकी पकड़ सबसे ज्यादा थी इसके अलावा इंग्लिश, मगर अंग्रेजी में उन्होंने कभी लिखा नहीं था लिखा केवल उर्दू और हिन्दी में ही। वे यह समझते थे कि उर्दू को यदि देवनागरी में रूपान्तरित कर दिया जाय तो ज्यादा फ़ायदा होगा और यही चीज कुछ लोगों को पसन्द नहीं आयी खासकर उर्दू वालों को। उर्दू वालों का आरोप रहा कि इससे उर्दू की जो स्क्रिप्ट है वह ख्त्म हो जायेगी। जबकि उनका यह सोचना था कि अगर देवनागरी में लिखा जाय तो पूरा हिन्दुस्तान आसानी से समझ पायेगा। इसके चलते कई लोग उनके खिलाफ़ भी हो गये थे। वे मानने लगे कि राही उर्दू को ख़त्म करना चाहते हैं असल में वे चाहते थे कि जैसे गालिब है उन्हें केवल उर्दू वाले ही पढ़ व समझ पाते हैं जब देवनागरी में होगा तो सब समझेंगे। हालाँकि राही जी को उर्दू से बहुत मुहब्बत थी किन्तु उनके इसी कदम से उन्हें बहुत-सी वे चीजें नहीं मिल पाईं जिनके वे हकदार थे।

लोगों का मानना है कि राही की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए वे अपनी शुरुआती रचनाओं को बेच दिया करते थे जब कि हम लोग एक खाते पीते परिवार से थे। हमारे पिता गाजीपुर के वैल प्रतिष्ठित वकीलों में थे हम लोगों का अपना मकान था | लेकिन हमारे परिवार में धन के पीछे भागने की लालसा कभी नहीं रही। हमारे ददिहाल की बहुत बड़ी प्रापर्टी थी, और हमारे दादा वहाँ से पलायन करके चले आये थे | एक समय ऐसा आ गया कि हमारे भाई लोगों को उस सम्पत्ति पर अधिकार मिलने की बात आ गयी तो हमारे भाईयों ने कह दिया कि जब हमारे बाप को उस सम्पत्ति से कोई मतलब नहीं रहा तो हमें भी नहीं चाहिए। इस तरह से हमारे परिवार में कभी भी धन के पीछे दौड़ने की इच्छा नहीं रही है। हम बहुत धनी नहीं थे मगर मध्यम वर्गीय ठीक-ठाक खाते-पीते रहे हैं। तो साफ़ है कि राही समाज के लिए लिखते थे न कि बकने के लिए कोई प्रोडक्ट तय्यार करते थे

महाकाव्य के रूप में लिखी गई उनकी किताब ‘१८५७’ बेहद प्रभावित करती है क्योंकि उसमें हिन्दुस्तान का जो इतिहास आया वह नये अंदाज में था | इस तरह का अन्य कहीं नहीं था और दूसरी बात जो थी कि इस तरह की कोई कविता उर्दू में या हिन्दी में कम्पलीट १८५७ पर नहीं मिलती जिस तरह की उन्होंने लिखी थी। उसके बाद उनके उपन्यासों में सबसे ज्यादा पसन्द आने वाली किताब “कटरा बी आर्जू” थी हालाँकि ज्यादातर लोग “आधा गाँव” को उनकी बहुत चर्चित किताब के रूप में देखते हैं |

हमारा मानना है कि एक साहित्यकार में जो खूबियाँ होनी चाहिए कि चीजों को उसी तरह से पेश करे कि वह चीज हमारे सामने बिल्कुल मूल रूप में जीवित हो उसे हम पढ़ रहे हों मगर उसका नक्शा हमारे सामने आ जाय तो यह खास बात उनके लेखन में थी। उन्होंने चाहे कविता लिखी कहानी या उपन्यास तीनों में जिस चीज पर उन्होंने कलम उठाई जिस विषय पर लिखा वह विषय हमारे सामने जीवित तस्वीर में आ जाता था। और यही एक खूबी जो एक अच्छे कलमकार में होनी चाहिए उनमें थी। जैसे कटरा बी आर्जू में इमरजैंसी की भयावह तस्वीर और राजनैतिक स्वरुप स्पष्ट होता जाता है | जैसा कि आधा गाँव में राही जी अपने परिवार के साथ खुद एक पात्र के रूप में नजर आते हैं वहीं “ओस की बूँद” में बँटवारे की पीड़ा और मानवीय द्वन्द्व खूब शिद्दत से उभरा है | अब क्योंकि किसी भी कवि या कथाकार की कोई भी रचना पूरी तरह काल्पनिक नहीं होती कोई न कोई जीवित स्मृति होती है जिसके सहारे वह लिखता और आगे बढ़ता है। हमारे परिवार से हमारे सगे चचेरे भाई लोग पाकिस्तान चले गये थे। जबकि हमारे पिता पूरी तरह खिलाफ़ थे पाकिस्तान के। इसलिए हमारे सगे भाइयों में तो कोई भी नहीं गया। मगर जो चचेरे भाई गये उनके लिए हम आज तक परेशान हैं कि यदि वे भी न गये होते तो वे भी हमारी तरह यहाँ ठीक-ठाक स्टैवलिस हो जाते जो वहाँ नहीं हो सके हैं। शायद उसकी ही अभिव्यक्ति थी ओस की बूँद |

मुस्लिम समुदाय की उस समय में जो स्थिति थी, जैसे गरीबी, अशिक्षा या आपसी रस्सा कसी या कहें जो मुसलमानों में ही कम्युनल फ्रेक्शन थे वे इन तमाम चीजों को देखते और अभिव्यक्त करते थे। एवं बेहतरी के लिए सोचते भी थे। धर्म में आस्था थी लेकिन कट्टरपन नहीं था। हमारी पूरी फैमिली धार्मिक हैं लेकिन कट्टरपन की सख्त विरोधी अगर मस्जिद के लिए सम्मान है तो मंदिर के लिए भी कम नहीं है।
स्त्रियों के लिए भी वे सकारात्मक सोच रखते थे। वे सामाजिक परिदृश्य में महिलाओं की शोषक स्थितियों पर गम्भीर चिन्तन करते थे और उसकी बेहतरी के लिए सोचते और लिखते भी थे मगर वे केवल सोच ही सकते थे या लिख ही सकते थे किन्तु लड़ना तो स्त्रियों को खुद ही था इस व्यवस्था से। जैसे आधा गाँव की औरतों का जो मुकाम है वे उससे खुश नहीं थे बल्कि ‘कटरा बी आर्जू’ की जो बिल्लो है वह स्त्री राही मासूम भाई की सोच की स्त्री थी।

फ़िल्मी जीवन की शुरुआत कैसे हुयी यह बता पाना कठिन है क्योंकि वे दूसरी शादी के बाद ही बम्बई (मुम्बई) चले गये थे और चूँकि लेखन क्षमता तो थी ही तो स्थापित हुए होंगे। हाँ, उनकी सबसे पहली फ़िल्म मैं तुलसी तेरे आंगन की” जो उस समय काफ़ी चर्चित भी हुई थी | जब वे बहुचर्चित धारावाहिक महाभारत के संवाद लिख रहे थे तब हम सबको बड़ी खुशी थी और बहुत अच्छा लगा था हालाँकि वे उन दिनों बम्बई (मुम्बई) में थे तो हम लोग यहाँ गैर मुस्लिमों से ज्यादा रुचि से इस धारावाहिक को देख रहे थे। एक और खास बात थी कि महाभारत के जितने भी एडीशन भारत भर में हैं जिस-जिस लाइब्रेरी में हैं सब उनके पास मौजूद थे। उस दौरान जब मैं उनसे मिलने मुम्बई (मुम्बई) गयी थी तो उनका पूरा कमरा था, वह महाभारतमय लग रहा था। इसीलिए उनका चैलेंज था कि अगर कोई कहीं भी मेरे काम पर एक उंगली रख दे तो ये कलम छोड़ दूँगा। मुझे याद है कि कुछ आर०एस०एस० के लोगों ने जब बी०आर० चोपड़ा से यह कहा था कि इस काम के लिए आपको कोई हिन्दू नहीं मिला यही मिले थे तो उन्होंने यही कहा था कि “आप देखिए, और कहीं भी ग़लती पकड़िये, तो मैं इन्हें हटा दूँगा क्योंकि राही जी ने इतना अध्ययन किया था। कि उसमें उँगली रखने की कहीं गुन्जाइश ही नहीं थी।
असल में हम मुस्लिम जरूर हैं मगर हमारा पूरा परिवार प्रगतिशील रहा और शायद यही कारण था उनकी पहली शादी टूटने का भाभी के परिवार वाले संकीर्ण सोच रखते थे इसलिए बड़ी वजह थी हमारे परिवार और उनकी वैचारिक असमानता।

दूसरी शादी उनकी लव मैरिज थी भाभी पढ़ी-लिखी थीं उनके पहले हसबैन्ड आर्मी से थे और हमें भी बहुत प्यार करती हैं। तीन पुत्र उनके साथ थे। एक बच्ची मासूम भाई से हुई मरियम जो अमेरिका में हैं। तीनों बेटे नदीम खान-मुम्बई, इरफान खान, मुम्बई, आफताब खान, हाँग-काँग में हैं।

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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हनीफ मदार 173 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 340 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

नोट-

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