वर्तमान राजनीति का माइक्रोस्कोप नाटक “साइकिल” (हनीफ़ मदार)

अपनी बात अपनी बात

हनीफ मदार 30 2018-11-17

साइकिल एक साहित्यिक कृति से आगे एक जीवन की कहानी है | कहानी भी महज़ एक मुन्ना की नहीं अपितु देश दुनिया के हर गरीब मजदूर की कहानी है शायद इसीलिए दृश्य दर दृश्य देखते हुए दर्शक के रूप में यह लगने लगता है कि यह मेरी ही कहानी है | और लगे भी क्यों न भारतीय गणतंत्र को सात दशक पूरे होने को हैं सत्ता परिवर्तन होते रहे लेकिन इस गणतंत्र में गण के जीवन में कोई बदलाव दृष्टिगोचर नहीं होता | ऐसे में निश्चित ही यह सवाल तो खड़ा होता ही है कि हमारी सरकारों को क्यों यह समझ नहीं आता कि आज भी अपने ही गणतंत्र में कोई भी आम जन या मजदूर क्यों यह सोचता है कि उसकी कोई सुनने वाला नहीं है | लगभग डेढ़ घंटे तक विभिन्न पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक घटनाक्रमों से गुजरते हुए चलने वाला यह नाटक इन्हीं सवालों से जूझता है ……

वर्तमान राजनीति का माइक्रोस्कोप नाटक “साइकिल” 

हनीफ मदार

हनीफ मदार

अपनी विशिष्ठ रंगमंचीय सांस्कृतिक पहचान को सहेजे मथुरा में ‘संकेत रंग टोली’ और ‘कोवेलैंट ग्रुप’ के साझा प्रयास से आयोजित दो दिवसीय नाट्य आयोजन एक बार पुनः मथुरा के नाट्य प्रेमी दर्शकों के लिए महज़ मनोरंजन का वायस न बनकर एक सामाजिक मानवीय एवं राजनैतिक चेतना का संवाहक बना | जहाँ न केवल नाटक के दृश्य दर्शकों को हलके से गुदगुदाते रहे वहीँ खुद (आम जन) के प्रति सत्ता प्रतिष्ठानों की कार्यशैली और राजनैतिक स्वरूप को लेकर विचलित कर देने वाले सवाल भी खड़े करते रहे |

     एक अदद प्रेक्षागृह न होने के बावजूद भी साहित्य, कला एवं रंगमंच के लिए प्रतिवद्ध संगठनों द्वारा निरंतर वर्ष में दो से तीन बार खुले आसमान तले, किये जाने वाले नाट्य आयोजनों  में, अक्सर ही तेज आंधी-तूफानों तो कभी बारिश से हर बार टूटकर उखड़ते बिखरते नाटक के सैट को पुनः-पुनः लगाने जोड़ने की मशक्कत के बाद भी नाटक करने की उर्जा, वर्तमान राजनैतिक सत्ता व्यवस्थाओं द्वारा इस दिशा में लगातार की जाने वाली उपेक्षा के खिलाफ एक रचनात्मक प्रतिरोध की तरह दिखाई देती है | 12 एवं 13 जून को हाइब्रिड पब्लिक स्कूल के ओपन ग्राउंड में तेज हवाओं और विपरीत मौसम के खिलाफ सीधे संघर्ष में इन नाट्यकर्मियों का पागलपन की हद तक का जूनून ही भारी पड़ा | इस हौसले में निश्चित ही, सोशल मीडिया के गहरे प्रभाव और असंख्य कॉरपोरेट चैनलों के बावजूद भी हमेशा की तरह बड़ी संख्या में दर्शकों का जुटना खुद में एक महत्वपूर्ण कारक और सुखद एहसास रहा, जब दर्शकों के लिए बिछाई गई कुर्सियों के अलावा, बैठने के लिए जगह न मिलने पर  बड़ी तादाद में लोग खड़े होकर भी नाटक देख रहे थे मानो कोई भी उस प्रस्तुति से महरूम रहने को तैयार न हो | खैर आइये अब कुछ नाटक की बात की जाय ……

    saikil पुलकित फिलिप द्वारा लिखा यह नाटक ‘साइकिल’ बहुत छोटे-छोटे दृश्यों के साथ नाटक कम बल्कि एक चल-चित्र के रूप में नज़र आया | दृश्यों का बदलाव जैसे किसी फिल्म में संपादन की कमी को दर्शा रहा हो | ऐसा लगना इसलिए भी लाजिमी था कि इस नाटक को नाटक नहीं अपितु एक फ़िल्मी स्क्रिप्ट के रूप में ही लिखा गया जिसे मंच की अपनी सीमाओं के चलते कुछ दृश्यों को काट-छंट कर नाटक के रूप में मंचित किया गया | इसीलिए छितराए से दृश्यों के साथ सामंजस्य बिठाकर  बड़ी कास्ट के साथ इस नाटक को निर्देशित करना निर्देशक कलीम ज़फर के लिए भी एक चुनौती के रूप में रहा |

     साइकिल एक साहित्यिक कृति से आगे एक जीवन की कहानी है | कहानी भी महज़ एक मुन्ना की नहीं अपितु देश दुनिया के हर गरीब मजदूर की कहानी है शायद इसीलिए दृश्य दर दृश्य देखते हुए दर्शक के रूप में यह लगने लगता है कि यह मेरी ही कहानी है | और लगे भी क्यों न भारतीय गणतंत्र को सात दशक पूरे होने को हैं सत्ता परिवर्तन होते रहे लेकिन इस गणतंत्र में गण के जीवन में कोई बदलाव दृष्टिगोचर नहीं होता | ऐसे में निश्चित ही यह सवाल तो खड़ा होता ही है कि हमारी सरकारों को क्यों यह समझ नहीं आता कि आज भी अपने ही गणतंत्र में कोई भी आम जन या मजदूर क्यों यह सोचता है कि उसकी कोई सुनने वाला नहीं है | लगभग डेढ़ घंटे तक विभिन्न पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक घटनाक्रमों से गुजरते हुए चलने वाला यह नाटक इन्हीं सवालों से जूझता है |

     मुन्ना जो एक दिहाड़ी मजदूर है | दो बेटी एक पत्नी बस इतना ही परिवार | संपत्ति के नाम पर एक अदद पुरानी साइकिल जो उसके लिए महज़ साइकिल नहीं उसकी रोज़ी-रोटी, खेत-खलिहान, उसकी ताकत और हिम्मत है | इसी से वह रोज़ शहर मजदूरी करने जाता है | मसलन साइकिल है तो मुन्ना है मुन्ना है तो परिवार है | किन्तु साइकिल का रोजाना खराब होना और उस पर अक्सर ही पैसा खर्चना मुन्ना की जिम्मेदारियों में ठीक उसी तरह शामिल हो जाता है जैसे उस पर परिवार की अन्य जिम्मेदारियां हैं | जिनमें बेटी की शादी पत्नी की बीमारी और साक-भाजी | गाँव में प्रधानी के चुनाव का माहौल है | प्रधानी के उम्मेदवार नए-नए चेहरे गावं भर में एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के साथ विकास के वादे कर रहे हैं | गाँव भर को सिकन्दर फौजी के रूप में एक नए चेहरे से फिर आशाएं बंधीं हैं | एक तरफ जहाँ विकास के नाम पर किसानों से ली गईं ज़मीनों को चुनाव का मुद्दा बनाया जा रहा है वहीँ दूसरी तरफ मुकेश के रूप में किसान, मुआवज़े के रूप में मिले धन को बाजारी आकर्षण की ताकत के प्रभाव में, कुलीन हो जाने के भ्रम में खुले हाथ से बाज़ार में लुटा रहा है |

नाटक के दृश्य में सनीफ मदार

नाटक के दृश्य में सनीफ मदार

इस तरह घटित होती अनेक घटनाओं के बीच बाल्मीक राजेश जो लौ की डिग्री तो पा लेता है लेकिन जातीय दंश यहाँ तक आने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ पाता | कचहरी पर बैठने के बाद भी उसे कोई काम न मिलना यही दर्शाता है | इस  पर सामाजिक बुनाबट पर खीझता हताशा से भरा वह युवा नज़र आता है जिसे देखकर भी अनदेखा कर हम सभ्य बने रहते हैं | इधर मुन्ना की साइकिल एक एक्सीडैंट में टूटती है | गाँव में सिकन्दर फौजी चुनाव जीतकर जहाँ मोटरसाइकिल से कार तक पहुँच जाता है वहीँ मुन्ना एक साइकिल खरीदने को कहाँ-कहाँ किस- किस दरवाज़े पर भटकने को मजबूर नहीं होता |

     जैसे-तैसे मुन्ना, कल्लू साइकिल मिस्त्री की मदद से मंहंगी क़िस्त पर नई साइकिल खरीदता है | पूरा घर इतना खुश है मानो साइकिल नहीं कोई बड़ा साम्राज्य खरीदा हो | लेकिन जल्दी ही वह साइकिल चोरी हो जाती है | पुलिस मुन्ना की रिपोर्ट भी नहीं लिखती | हताश मुन्ना यह सोचकर नए प्रधान से मदद मांगने जाता है कि उनके कहने से पुलिस रिपोर्ट लिख लेगी और उसकी साइकिल उसे मिल जायेगी | किन्तु चुनाव से पहले वोट मांगते समय बेहद संवेदनशील, गाँव और गरीब को बिल्कुल अपनों की तरह गले लगा लेने वाला सिकन्दर फौजी घर पर दूसरी नई  कार खरीदने के जश्न में डूबा हुआ मुन्ना को फटकार कर भगा देता है |

     सामाजिक ताने बाने में बहुत गहरे तक पैठ बना चुकीं तमाम रूढ़ियों और त्रासद बुराइयों से छटपटाते समाज की मानवीय घटनाओं के साथ वर्तमान राजनैतिक स्थितियों को किसी माइक्रोस्कोप की तरह देखने का प्रयास करता नाटक यह स्पष्ट करता समाप्त होता है कि ६८ वर्ष लम्बे लोकतंत्रीय सफ़र के बाद भी व्यवस्थाओं के चेहरे ही बदल रहे हैं, मानव जीवन की स्थितियां नहीं |

नाटक साइकिल के दृश्य में अन्तरिक्ष एवं अन्य

नाटक साइकिल के दृश्य में अन्तरिक्ष एवं अन्य

नाटक में दृश्यों की अधिकता न केवल समाज और राजनीति की, बहुतायत में कुरूप विषमताओं को, एक ही कहानी में ज़बरन पिरो देने की लेखकीय कोशिश नज़र आती रही बल्कि एक तारतम्य में चलती कहानी में क्षणिक अवरोधक की तरह भी दिखाई दिए | फिर चाहे यह फिल्म स्क्रिप्ट का सीधे मंच पर करना ही कारण रहा हो | विशुद्ध बृज भाषा में लिखे और किये गए नाटक में जहाँ अन्य पात्र अपनी भाषा के साथ खेलते नज़र आये वहीँ खुद निर्देशक पूरी तरह बृज भाषा को बोल पाने में असहज और असफल दिखाई दिए जो थियेटर में ट्रेंड व्यक्ति के लिए किसी प्रश्न चिन्ह से कम नहीं था लेकिन कल्लू साइकिल मिस्त्री के खिलंदड़ चरित्र को एक कुशल कारीगर की भाँति प्रस्तुत किया  |

     मुन्ना के रूप में सनीफ मदार अपनी मूल पहचान को दबाकर पूरी तरह मुन्ना के रूप में उभर कर सामने आये | २०१३ में सनीफ मदार के निर्देशन में “बी-3” नाटक के बाद मंचीय अभिनय से दूर रहीं अनीता चौधरी, को देवकी देवी के रूप में और प्रौढ़ अभिनय के साथ देखा गया | आशिया मदार को अपनी पूर्ण अभिनय क्षमता दिखाने का अवसर नज़र नहीं आया बावजूद इसके वे दर्शकों को नीरज के रूप में याद करा पाने में सफल रहीं | अन्तरिक्ष, विपिन शर्मा, ज़फर अंसारी, बोबिना, कपिल कुमार, किशन सिंह, रवि, टीकम सिंह, सूरज दीप हमेशा की तरह ही अपने कलेवर में नज़र आये वहीँ शबाना मदार, अरवाज़, नीरज कुमार, मोहम्मद सफी, अनिरुद्ध गुप्ता, राजेश चौधरी, संजीव कुमार, अभीप्षा शर्मा, प्रदीप कुमार, देव सारस्वत, अदीब, सोनवीर भी अपने चरित्रों को बेहतर जीने का प्रयास करते दिखे |

नाटक के दृश्य में सूरज सिंह, विपिन, रवि आदि

नाटक के दृश्य में सूरज सिंह, विपिन, रवि आदि

जबकि 10 वर्षीय आइज्रा मदार ने लिम्का के रूप में बेहद सहज और स्वाभाविक अभिनय किया | वेश-भूषा और मेकअप चरित्रानुकूल रहा |

हमेशा की तरह ही एम् गनी व् अयान मदार द्वारा डिजायन और तैयार मंच कथानुसार बेहद सशक्त और दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहा | संगीत संयोजन, संचालन और प्रकाश परिकल्पना उत्तम होने के बावजूद भी संसाधनों की कमी के प्रभाव से अछूते नहीं रह सके |

     आर्यन मदार, जुम्मन, रशीद, अजीत, पूनम आदि के अन्य पारिश्रमिक सहयोग के साथ सम्पूर्ण प्रस्तुति स्मरणीय एवं अपनी बात दर्शकों तक पहुंचाने में सफल रही |

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

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हनीफ मदार 118 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 216 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

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आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

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