परिवर्तनगामी चेतना की संवाहक प्रस्तुति… नाट्य समीक्षा (हनीफ मदार)

हनीफ मदार 4 2018-11-17

‘आशिया मदार’ के निर्देशन में भारतेंदु नाट्य अकादमी द्वारा पच्चीस दिवसीय नाट्य कार्यशाला में ‘राजेश कुमार’ द्वारा लिखत नाटक ‘सपने हर किसी को नहीं आते’ का मंचन 16 दिसम्बर को एच पी एस सभागार में किया गया | इस प्रस्तुति पर ‘हनीफ मदार का समीक्षात्मक आलेख …. | – अनीता चौधरी

परिवर्तनगामी चेतना की संवाहक प्रस्तुति…

सपने हर किसी को नहीं आते-

उदारीकरण के प्रभाव में वर्तमान दौर से उपजी सामाजिक उथल पुथल जिसके कारण विभिन्न सामाजिक तबकों की विविधता भरी जिंदगियों में तरह – तरह के बदलाव आये हैं जो सामान्यतः सकारात्मक से कहीं ज्यादा नकारात्मक हैं | इस वक़्त में कैसे हमारी जिंदगियों में बाजारी अंधी चकाचौंध प्रवेश कर जाती है और कैसे हमारे सामाजिक व्यक्तित्व को, व्यक्तिवादी अंधी सोच में तब्दील कर देती है और कब हम अपने ही भाई, अपने पड़ोसी के सामने उठ खड़े होते हैं, हमें अंदाजा भी नहीं होता | चारों तरफ से बाजारी हमलों से घिरी हुई हमारी वर्तमान पीढ़ी का, सामाजिक रूप से इन्हीं बेरहम सवालों से जूझते हुए उनके जबाव खोजने का रचनात्मक प्रयास है नाटक ‘सपने हर किसी को नहीं आते’ |

natak Sapne

नाटक का एक दृश्य

     एक अदद ऑडिटोरियम के अभाव के बावजूद भी मथुरा में आधुनिक थिएटर एवं रंगमंचीय गतिविधियों का अलख जगाये रखने वाली ‘संकेत रंग टोली’ की साथी एवं ‘कोवैलेंट ग्रुप’ की संस्थापक सदस्य ‘आशिया मदार’ के निर्देशन में ‘राजेश कुमार’ का यह नाटक भारतेंदु नाट्य अकादमी की पच्चीस दिवसीय कार्यशाला के समापन पर हाइब्रिड पब्लिक स्कूल के एच पी एस सभागार में 16 दिसम्बर 2015 को मंचित हुआ | ‘आशिया मदार’ खुद भारतेंदु नाट्य अकादमी से 2015 के बैच की पास-आउट हैं और व्यक्तिगत तौर पर यह उनकी पहली प्रस्तुति थी | इसलिए व्यावहारिक तौर पर कार्य शैली में किसी प्रोफेशनल निर्देशकीय दक्षता कम ही दिखाई दी किन्तु नाटक की डिजायन और प्रस्तुति को देखते हुए एक प्रशिक्षित व्यक्ति की कुशलता भी स्पष्ट दिखी | ज्यादातर नये लोगों के साथ काम करते और कराते हुए राजेश कुमार के बेहद संवेदनशील इस नाटक और नाटककार के मूल भाव को दर्शकों तक संप्रेषित करने में आशिया मदार बखूबी सफल रहीं |

      यह कहने में गुरेज़ नहीं है कि फिलवक्त में राजेश कुमार ऐसे इकलौते हिंदी नाटककार हैं जो निरंतरता में ऐसे नाट्यालेखों को लिख रहे हैं जो यथा स्थिति ही बयान नहीं करते बल्कि वे एक चेतना भी पैदा करते हैं और प्रतिरोध भी | वर्तमान की ताज़ा सामाजिक राजनैतिक और मानसिक विसंगतियों पर मुकम्मल चर्चा के लिए न चाहते हुए भी नाटक में पात्रों की अधिकता कोई नई बात नहीं है | लेकिन मथुरा जैसे छोटे शहर में बड़ी कास्ट के नाटकों का चुनाव और चयन निश्चित ही एक चुनौती तो है ही और यह चुनौती आशिया मदार के सामने भी रही | चूँकि राजेश खुद सक्रिय रंगकर्म से जुड़े हैं तो उन दुश्वारियों को भी भले से समझते हैं जो हिन्दी नाटक कर रहे नाट्य दलों को हर दिन परेशान करती हैं | इसलिए उनके नाटक एक पात्र को कई – कई भूमिकाये निभाने की सहूलियत भी देते हैं | जो इस नाटक में भी हुआ |

Sapne

नाटक का एक दृश्य

नाटक की शुरूआत पूंजीवादी विकास की दिशा में निरंतर बढती राजधानी दिल्ली में  एक अपार्टमेन्ट के एक कमरे में किराए पर रह रहे सात दोस्तों के उन जीवन अनुभवों से होती है जो प्रतीक रूप में विविधताओं से भरी भारतीय सामाजिक सांस्कृतिकता के वे पहरुए नजर आते हैं जो खोई हुई महानगरीय दिशाओं से बचते हुए मैत्री में जीवन का रस तलाश रहे हैं | पहले दृश्य में ही सातों की आपसी चुहल, बहस और खिलंदड़पन इनके चारित्रिक विकास के साथ दर्शकों से कम्युनिकेट होने लगता है किन्तु यहीं किसी सपने की तरह पूंजीवादी चकाचौंध के साथ, बाज़ार कब इनके बीच आकर अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर देता है इसकी भनक तक उनको नहीं हो पाती |

इसके बाद जो होता है, बाहरी तौर पर बेहद सहज दिखतीं घटनाएं, परिस्थितियाँ और वातावरण दृश्य दर दृश्य नाटक को गति प्रदान करते हुए अंत तक ले जाते हैं जहाँ रंगकर्मी ‘समीर’ (कलीम ज़फर) प्यार, मोहब्बत और रोमांस की अंधी अभिजनवादी दौड़ का शिकार होकर खुद को पुनः खुद में ही खोजने को विवश होता है | वहीँ नव धनाड्य पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करता गैर-संवेदनशील ‘रजत’ (अन्तरिक्ष शर्मा) स्वार्थ केन्द्रित आधुनिकता के साथ दोस्तों को छोड़ कर अमेरिका शिफ्ट हो जाता है | जबकि सिस्टम में रहकर ही उसे बदलने का स्वपन देखने वाला ‘सफल’ (रवि) खुद ही सिस्टम की अव्यवस्थित और भ्रष्ट कार्यप्रणाली का शिकार होकर आत्महत्या कर लेता है | वामपंथी रुझान और स्पष्ट समझ के साथ ‘अभय’ (सनीफ मदार) जब इस दमन तंत्र का विरोध करता है तो उसे भी उसके पिता की तरह ही मार दिया जाता है |

Sapne

नाटक का एक दृश्य

      सीधा-सपाट जीवन जीता और किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता ‘इरफ़ान अंसारी’ (पुलकित फिलिप) शक भरी एक ख़ास मानसिकता के चलते बेवज़ह गिरफ्तारी के चलते अपने दोस्तों के बीच ही खुद को अजनबी और असुरक्षित महसूस करने लगता है | डिजिटल इंडिया में अल्पसंख्यक होने का दंश उसे उस कमरे रुपी घर को छोड़कर ‘घेटों’ में जा बसने को मजबूर कर देता है | वहीँ 84 के सिख विरोधी मानसिकता का शिकार, अब घर-घर जाकर वाटर प्यूरीफायर बेचते हुए वर्तमान बेरोजगारी से जूझता युवा ‘सरदार जोगेन्दर सिंह उर्फ़ जोगी’ (कपिल कुमार ) और साहित्यिक रुझान वाले ‘कबीर’ (जितेन्द्र सिंह कर्दम) को कोई भी घटना भावुकता में बहा नहीं ले जा पाती बल्कि अंत में अकेले या कम संख्या में होने के बावजूद भी कबीर का एक संवाद- “वे खतरनाक या ताकतवर तभी तक हैं जब तक हम समझते हैं |” इंसानी हकों के लिए निरंतर संघर्ष करने की ओर इशारा करता है | यहाँ आकर नाटक में प्रयुक्त की गई “पाश” की कविता ‘हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के खिलाफ ….|’ बेहद अर्थपूर्ण और जरूरी लगती है |

मिस इंडिया, मिस वर्ल्ड, मिस यूनिवर्स या रैम्प पर कैटवाक करती मॉडल के रूप में बाजारी गुलामी को ही स्त्री, मुक्ति और आज़ादी समझ रही है | बाजारी सेल्स गर्ल के प्रतीक रूप में मंच पर उतरती ‘मॉडलस’ (शालिनी श्रीवास्तव, शबाना मदार, पूनम कुमारी, टीना फिलिप) के साथ स्त्री की शारीरिक संरचना को नाप-तौल के पैमाने में आकर्षण की व्याख्या देता बाज़ार का प्रतिनिधि ‘डी के’ (सूरज चौहान) नाटक के पहले दृश्य से स्पष्ट  भाषा के साथ एक नया स्त्री विमर्श रचता है | ‘श्रेया’ (बोबीना) के रूप में खुद को आधुनिक समझती एक ऐसी लड़की का किरदार जो प्रेम के नाम पर इंसानी ज़ज्बातों से खेलने को टाइम पास कह कर यह स्पष्ट करती है कि इंसानी प्रेम और संवेदना को आकार देने का जिम्मा भी अब बाज़ार ने ही उठा रखा है |

प्रथम दृश्या यथास्थितिवादी लगने वाला यह नाटक दरअसल बाहरी तौर पर किसी भी प्रतिरोध को थोपने के बजाय आंतरिक रूप से मज़बूत, चेतनशील और परिवर्तनगामी होने की बात कहता है क्योंकि इस ठन्डे, संवेदनहीन और अंधी सामाजिकता में ‘सपने हर किसी को नहीं आते’ |

Sapne

नाटक का एक दृश्य

हालांकि नाटक को सम्पूर्णता और दृश्यों को साफ़ करने में ज़फर अंसारी, टीकम सिंह, प्रदीप कुमार, अनिरुद्ध गुप्ता, नीरज चौधरी, सनीफ मदार और सूरज चौहान ने कई- कई चरित्रों को बखूबी अंजाम दिया | निर्देशकीय लाख कोशिशों के बावजूद भी कुछ कलाकारों के साथ भाषाई व्याकरणीय शुद्धता और उच्चारण की गलतियां एवं नाटक का अनुपयुक्त जगहों पर अधिक लाउड हो जाने जैसी खामियां, जहाँ रंगमंच में बृज भाषाई लोगों के साथ भाषाई स्तर पर लम्बी रिहर्सल की मांग करतीं हैं वहीँ निर्देशक के लिए अगली प्रस्तुतियों में एक चुनौती के रूप में खड़ी होतीं हैं |

संसाधनों की कमी और अकादमी के बेहद सीमित बजट के बाद भी ‘अयान मदार’ के सहयोग से तैयार किया गया सैट भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बना रहा | संगीत संकलन और संचालन भी श्रमसाध्य काम दिखा जिसे ‘पुलकित फिलिप’ के सहयोग से खुद ‘आशिया मादार’ ने अंजाम दिया | ‘एम्० गनी’ खासी मेहनत और मशक्कत के बाद भी प्रकाश परिकल्पना में खल रहे साधनों के अभाव को छुपा पाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए |

अंत में अभीप्सा शर्मा, अरबाज़ खान, किशन सिंह, विपिन शर्मा, अनीता चौधरी, पुश्किन सफी, की महत्वपूर्ण भूमिका के साथ सम्पूर्णता में यह नाट्य प्रस्तुति, दर्शनीय और दर्शकों को पूरी तरह से कम्युनिकेट करने में सफल रही | अंत में नाटक की इस सफलता पर भारतेंदु नाट्य अकादमी के सह निदेशक रमेश चन्द्र गुप्ता के साथ उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष मोहन स्वरुप भाटिया एवं संकेत रंग टोली के अध्यक्ष राहुल गुप्ता तथा उपाध्यक्ष निर्मल पूनिया के द्वारा  निर्देशक आशिया मदार को सम्मानित किया गया |

ashiya-madaar

नाट्य निर्देशक ‘आशिया मदार’

रंगमंच आपकी रगों में रचा बसा है | होश संभालते ही अपने घर में हो रही रंग गतिविधियों में संलग्नता | रंगकर्म की शुरूआत बचपन से ‘संकेत बाल रंग टोली’ के साथ बाल रंगकर्म से, एम्० गनी व सनीफ मदार के सानिध्य में | “कोवैलेंट ग्रुप” की संस्थापक सदस्य | अनेक नाटकों में अभिनय के साथ बैक स्टेज की कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को सम्भाला |

2015 में ‘भारतेंदु नाट्य अकादमी, लखनऊ’ से नाट्य कला में परास्नातक डिप्लोमा |

अकादमी द्वारा आयोजित इस प्रस्तुति परक नाट्य कार्यशाला में नाटक “सपने हर किसी को नहीं आते” पहला निर्देशित नाटक |

ईमेल – 30madaar30@gmail.com

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
ईमेल आईडी : hanifmadar@gmail.com
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी" 

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

Blogger Post

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता 51 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.