बेटी नहीं है बोझ :आलेख (कुश कुमार)

कुश कुमार 6 2018-11-17

लम्बे समय से सभ्य समाज, लैंगिक अनुपात में लगातार बढ़ रही असमानता को लेकर चिंता तो जताता रहा है बावजूद इसके कन्या भ्रूण हत्या वर्तमान समय का बहुत बड़ा संकट बन गया है। इस पर सामाजिक व् मानसिक जागरूक चर्चाएँ भी कम नहीं हुईं या हो रहीं हैं | तब इस जागरूकता में कानूनी समझ भी महत्वपूर्ण है | कई वजहों से कन्या की भ्रूण में ही हत्या कर दी जाती है लेकिन एक बड़ी वजह लोगों की यह सोच भी है कि बेटा बुढ़ापे का सहारा है और लड़की बोझ। बेटा बुढ़ापे में मां बाप को निबाहता है और लड़की पराई बन कर पराये घर चली जाती है। यह सोच भी कन्या भ्रूण हत्या के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार बनती है। लेकिन क्या यह सच है। शायद नहीं, क्योंकि हमारे सामने ऐसे कितने ही नालायक बेटों के उदाहरण मौजूद हैं, जो मां-बाप को छोड़ देते हैं या उन्हें किसी वृद्धाश्रम में ले जाकर छोड़ आते हैं और पलट कर भी उनकी खैरोहाल जानने नहीं जाते; जबकि कई ऐसी बेटियों के उदाहरण आपको मिल जाएंगे, जो पूरी संवेदना और शिद्दत के साथ मां-बाप के बुढ़ापे का सहारा बनती हैं। अगर कानून की बात करें, तब भी पाएंगे कि मां-बाप को यह हक मिला हुआ है कि वह बेटी से भरण-पोषण के लिए कहे और बेटी को यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। बुढ़ापे का सहारा सिर्फ बेटे नहीं, बल्कि समान रूप से बेटियां भी हैं, इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि अपनी पुत्रियों को सक्षम बनायें। यदि वे सक्षम होंगी, तभी वह आपका सहारा बन पाएंगी, जब आप आर्थिक रूप से असमर्थ हो जाएंगे। ……. इस दिशा में कानूनी समझ भरा ‘कुश कुमार’ का हमरंग पर अगला आलेख ……

बेटी नहीं है बोझ  

कुश कुमार

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आम भारतीय परिवारों की मानसिकता है कि बेटी बोझ होती है। उसकी पढ़ाई से लेकर शादी-विवाह तक खर्च ही करना पड़ता है और अगर खुदा न खास्ते वह किसी लड़के के साथ घर छोड़कर चली गई तो घर की इज्जत भी गई। इस इज्जत ने लड़कियों पर बहुत कहर ढाया है। इसके अलावा एक बात और है कि लोग यह मान कर चलते हैं कि लड़की तो शादी-विवाह कर दूसरे के घर चली जाएगी और हम ठन-ठन गोपाल ही रह जाएंगे। यानी उसमें खर्च ही खर्च है, उससे कोई फायदा नहीं। इन्हीं मानसिकताओं की वजह से तमाम तरह के कानून बनने के बावजूद लोग लड़कियों को कोख में ही मार डालते हैं। दूसरी तरफ सभ्य समाज, लैंगिक अनुपात में लगातार बढ़ रही असमानता को लेकर चिंता भी जताता रहता है बावजूद इसके कन्या भ्रूण हत्या वर्तमान समय का बहुत बड़ा संकट बन गया है। इस पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है और यह लगाम थोड़ी-सी कानूनी जागरूकता से भी लग सकती है, जैसे लड़कियां बोझ नहीं हैं और माता-पिता के पालन-पोषण की उनकी भी उतनी ही जिम्मेदारी है, जितनी लड़कों की।
आइए इस कानूनी पहलू पर बात करने से पहले हम उन सवालों पर गौर करें जिसकी वजह से कन्या की भ्रूण में ही हत्या कर दी जाती है-
इसकी कई वजह हैं। लेकिन एक बड़ी वजह लोगों की यह सोच भी है कि बेटा बुढ़ापे का सहारा है और लड़की बोझ। बेटा बुढ़ापे में मां बाप को निबाहता है और लड़की पराई बन कर पराये घर चली जाती है। यह सोच भी कन्या भ्रूण हत्या के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार बनती है।
लेकिन क्या यह सच है। शायद नहीं, क्योंकि हमारे सामने ऐसे कितने ही नालायक बेटों के उदाहरण मौजूद हैं, जो मां-बाप को छोड़ देते हैं या उन्हें किसी वृद्धाश्रम में ले जाकर छोड़ आते हैं और पलट कर भी उनकी खैरोहाल जानने नहीं जाते; जबकि कई ऐसी बेटियों के उदाहरण आपको मिल जाएंगे, जो पूरी संवेदना और शिद्दत के साथ मां-बाप के बुढ़ापे का सहारा बनती हैं। अगर कानून की बात करें, तब भी पाएंगे कि मां-बाप को यह हक मिला हुआ है कि वह बेटी से भरण-पोषण के लिए कहे और बेटी को यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (1) (घ) के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व बनता है कि वह अपने माता-पिता का भरण-पोषण करे। यहां प्रत्येक व्यक्ति में बेटी भी शामिल है। ऐसे माता-पिता जो अपना भरण-पोषण खुद करने में सक्षम नहीं हैं, वह अपनी सक्षम बेटी से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं। यहां पुत्री विवाहिता हो या अविवाहिता, इससे माता-पिता के इस अधिकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। जरूरी सिर्फ इतना है कि बेटी सक्षम हो, यानी उसकी अपनी पर्याप्त आय हो या वह इतनी साधन संपन्न हो। यहां इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि पर्याप्त आय का मतलब उसकी अपनी निजी आमदनी से है, न कि उसके पति या जिस पर वह निर्भर है उसकी आमदनी से।
इस संदर्भ में थाणे मुंबई के डॉ विजया मनोहर अर्बट बनाम काशीराव राजाराम का केस बहुत अहम है। इसमें यह सुनिश्चित किया गया कि अपनी परवरिश में असमर्थ माता-पिता के भरण-पोषण का दायित्व विवाहिता पुत्री का भी होता है। बशर्ते कि पुत्री के पास आय का अपना निजी पर्याप्त साधन है।

बेटी नहीं है बोझ :आलेख (कुश कुमार)

google से साभार

काशीराव राजाराम सवाई की पहली पत्नी की मृत्यु 1984 में हो गई थी। पहली पत्नी से उनकी एक बेटी थी, डॉ विजया मनोहर अर्बट। काशीराव अपनी दूसरी पत्नी के साथ रह रहे थे और वे दोनों इतने गरीब थे कि उनके लिए अपना भरण-पोषण करना संभव नहीं था। वे निराश्रित जीवन जी रहे थे। उनकी बेटी डॉ विजया मनोहर अर्बट चिकित्सक थी और उनकी निजी आमदनी अच्छी-खासी थी। पिता ने बेटी से भरण-पोषण पाने के लिए जुडिशियली मजिस्ट्रेट प्रथम कोर्ट, कल्यान, महाराष्ट्र  में दावा प्रस्तुत किया। बेटी, जो अपीलार्थी थी, ने इस मामले में यह आपत्ति उठाते हुए कहा कि यह वाद चलने योग्य नहीं है, क्योंकि दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 (1) (घ) में अपनी पुत्री से भरण-पोषण की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है। मजिस्ट्रेट ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए आवेदन स्वीकार कर लिया। बेटी ने इस निर्णय के विरुद्ध मुंबई हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने भी इस निर्णय की पुष्टि की और सुनिश्चित किया कि भरण-पोषण के लिए पिता का आवेदन, जो स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, अपनी विवाहिता पुत्री जिसके पास आय के पर्याप्त साधन हैं के विरुद्ध मान्य है। उच्च न्यायालय ने कहा कि विवाह के बाद पुत्री के अपने माता-पिता से रिश्ते खत्म नहीं हो जाते। हाईकोर्ट द्वारा पुनरीक्षण आवेदन निरस्त किए जाने के बाद डॉ विजया मनोहर अर्बट ने इस निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति द्वारा उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की।
इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बेटियां बच नहीं सकतीं, चाहे वे विवाहित ही क्यों न हों, क्योंकि शादी के बाद पुत्री के रिश्ते माता-पिता से समाप्त नहीं हो जाते। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 (1) (घ) के अधीन यह स्पष्ट प्रावधान है कि जो माता-पिता अपने भरण-पोषण में असमर्थ हैं, उनके भरण-पोषण का दायित्व उनके पुत्र व पुत्रियों पर समान रूप से है। यह दलील स्वीकार नहीं की जा सकती कि भरण-पोषण का उत्तरदायित्व पुत्री का नहीं होता है। यदि ऐसा होता है तो जिनकी सिर्फ पुत्रियां हैं वे तो निराश्रित हो जाएंगे। तो उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी बेटा और बेटी दोनों पर समान रूप लागू होती है, बशर्ते कि बेटी के पास अपनी पर्याप्त निजी आय हो।
इस तरह स्पष्ट है कि बुढ़ापे का सहारा सिर्फ बेटे नहीं, बल्कि समान रूप से बेटियां भी हैं, इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि अपनी पुत्रियों को सक्षम बनायें। यदि वे सक्षम होंगी, तभी वह आपका सहारा बन पाएंगी, जब आप आर्थिक रूप से असमर्थ हो जाएंगे

कुश कुमार द्वारा लिखित

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परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता 52 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

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