बेटी नहीं है बोझ :आलेख (कुश कुमार)

विमर्श-और-आलेख कोर्ट- कचहरी

कुश कुमार 34 2018-11-17

लम्बे समय से सभ्य समाज, लैंगिक अनुपात में लगातार बढ़ रही असमानता को लेकर चिंता तो जताता रहा है बावजूद इसके कन्या भ्रूण हत्या वर्तमान समय का बहुत बड़ा संकट बन गया है। इस पर सामाजिक व् मानसिक जागरूक चर्चाएँ भी कम नहीं हुईं या हो रहीं हैं | तब इस जागरूकता में कानूनी समझ भी महत्वपूर्ण है | कई वजहों से कन्या की भ्रूण में ही हत्या कर दी जाती है लेकिन एक बड़ी वजह लोगों की यह सोच भी है कि बेटा बुढ़ापे का सहारा है और लड़की बोझ। बेटा बुढ़ापे में मां बाप को निबाहता है और लड़की पराई बन कर पराये घर चली जाती है। यह सोच भी कन्या भ्रूण हत्या के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार बनती है। लेकिन क्या यह सच है। शायद नहीं, क्योंकि हमारे सामने ऐसे कितने ही नालायक बेटों के उदाहरण मौजूद हैं, जो मां-बाप को छोड़ देते हैं या उन्हें किसी वृद्धाश्रम में ले जाकर छोड़ आते हैं और पलट कर भी उनकी खैरोहाल जानने नहीं जाते; जबकि कई ऐसी बेटियों के उदाहरण आपको मिल जाएंगे, जो पूरी संवेदना और शिद्दत के साथ मां-बाप के बुढ़ापे का सहारा बनती हैं। अगर कानून की बात करें, तब भी पाएंगे कि मां-बाप को यह हक मिला हुआ है कि वह बेटी से भरण-पोषण के लिए कहे और बेटी को यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। बुढ़ापे का सहारा सिर्फ बेटे नहीं, बल्कि समान रूप से बेटियां भी हैं, इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि अपनी पुत्रियों को सक्षम बनायें। यदि वे सक्षम होंगी, तभी वह आपका सहारा बन पाएंगी, जब आप आर्थिक रूप से असमर्थ हो जाएंगे। ……. इस दिशा में कानूनी समझ भरा ‘कुश कुमार’ का हमरंग पर अगला आलेख ……

बेटी नहीं है बोझ  

कुश कुमार

कुश कुमार

आम भारतीय परिवारों की मानसिकता है कि बेटी बोझ होती है। उसकी पढ़ाई से लेकर शादी-विवाह तक खर्च ही करना पड़ता है और अगर खुदा न खास्ते वह किसी लड़के के साथ घर छोड़कर चली गई तो घर की इज्जत भी गई। इस इज्जत ने लड़कियों पर बहुत कहर ढाया है। इसके अलावा एक बात और है कि लोग यह मान कर चलते हैं कि लड़की तो शादी-विवाह कर दूसरे के घर चली जाएगी और हम ठन-ठन गोपाल ही रह जाएंगे। यानी उसमें खर्च ही खर्च है, उससे कोई फायदा नहीं। इन्हीं मानसिकताओं की वजह से तमाम तरह के कानून बनने के बावजूद लोग लड़कियों को कोख में ही मार डालते हैं। दूसरी तरफ सभ्य समाज, लैंगिक अनुपात में लगातार बढ़ रही असमानता को लेकर चिंता भी जताता रहता है बावजूद इसके कन्या भ्रूण हत्या वर्तमान समय का बहुत बड़ा संकट बन गया है। इस पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है और यह लगाम थोड़ी-सी कानूनी जागरूकता से भी लग सकती है, जैसे लड़कियां बोझ नहीं हैं और माता-पिता के पालन-पोषण की उनकी भी उतनी ही जिम्मेदारी है, जितनी लड़कों की।
आइए इस कानूनी पहलू पर बात करने से पहले हम उन सवालों पर गौर करें जिसकी वजह से कन्या की भ्रूण में ही हत्या कर दी जाती है-
इसकी कई वजह हैं। लेकिन एक बड़ी वजह लोगों की यह सोच भी है कि बेटा बुढ़ापे का सहारा है और लड़की बोझ। बेटा बुढ़ापे में मां बाप को निबाहता है और लड़की पराई बन कर पराये घर चली जाती है। यह सोच भी कन्या भ्रूण हत्या के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार बनती है।
लेकिन क्या यह सच है। शायद नहीं, क्योंकि हमारे सामने ऐसे कितने ही नालायक बेटों के उदाहरण मौजूद हैं, जो मां-बाप को छोड़ देते हैं या उन्हें किसी वृद्धाश्रम में ले जाकर छोड़ आते हैं और पलट कर भी उनकी खैरोहाल जानने नहीं जाते; जबकि कई ऐसी बेटियों के उदाहरण आपको मिल जाएंगे, जो पूरी संवेदना और शिद्दत के साथ मां-बाप के बुढ़ापे का सहारा बनती हैं। अगर कानून की बात करें, तब भी पाएंगे कि मां-बाप को यह हक मिला हुआ है कि वह बेटी से भरण-पोषण के लिए कहे और बेटी को यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (1) (घ) के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व बनता है कि वह अपने माता-पिता का भरण-पोषण करे। यहां प्रत्येक व्यक्ति में बेटी भी शामिल है। ऐसे माता-पिता जो अपना भरण-पोषण खुद करने में सक्षम नहीं हैं, वह अपनी सक्षम बेटी से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं। यहां पुत्री विवाहिता हो या अविवाहिता, इससे माता-पिता के इस अधिकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। जरूरी सिर्फ इतना है कि बेटी सक्षम हो, यानी उसकी अपनी पर्याप्त आय हो या वह इतनी साधन संपन्न हो। यहां इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि पर्याप्त आय का मतलब उसकी अपनी निजी आमदनी से है, न कि उसके पति या जिस पर वह निर्भर है उसकी आमदनी से।
इस संदर्भ में थाणे मुंबई के डॉ विजया मनोहर अर्बट बनाम काशीराव राजाराम का केस बहुत अहम है। इसमें यह सुनिश्चित किया गया कि अपनी परवरिश में असमर्थ माता-पिता के भरण-पोषण का दायित्व विवाहिता पुत्री का भी होता है। बशर्ते कि पुत्री के पास आय का अपना निजी पर्याप्त साधन है।

बेटी नहीं है बोझ :आलेख (कुश कुमार)

google से साभार

काशीराव राजाराम सवाई की पहली पत्नी की मृत्यु 1984 में हो गई थी। पहली पत्नी से उनकी एक बेटी थी, डॉ विजया मनोहर अर्बट। काशीराव अपनी दूसरी पत्नी के साथ रह रहे थे और वे दोनों इतने गरीब थे कि उनके लिए अपना भरण-पोषण करना संभव नहीं था। वे निराश्रित जीवन जी रहे थे। उनकी बेटी डॉ विजया मनोहर अर्बट चिकित्सक थी और उनकी निजी आमदनी अच्छी-खासी थी। पिता ने बेटी से भरण-पोषण पाने के लिए जुडिशियली मजिस्ट्रेट प्रथम कोर्ट, कल्यान, महाराष्ट्र  में दावा प्रस्तुत किया। बेटी, जो अपीलार्थी थी, ने इस मामले में यह आपत्ति उठाते हुए कहा कि यह वाद चलने योग्य नहीं है, क्योंकि दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 (1) (घ) में अपनी पुत्री से भरण-पोषण की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है। मजिस्ट्रेट ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए आवेदन स्वीकार कर लिया। बेटी ने इस निर्णय के विरुद्ध मुंबई हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने भी इस निर्णय की पुष्टि की और सुनिश्चित किया कि भरण-पोषण के लिए पिता का आवेदन, जो स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, अपनी विवाहिता पुत्री जिसके पास आय के पर्याप्त साधन हैं के विरुद्ध मान्य है। उच्च न्यायालय ने कहा कि विवाह के बाद पुत्री के अपने माता-पिता से रिश्ते खत्म नहीं हो जाते। हाईकोर्ट द्वारा पुनरीक्षण आवेदन निरस्त किए जाने के बाद डॉ विजया मनोहर अर्बट ने इस निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति द्वारा उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की।
इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बेटियां बच नहीं सकतीं, चाहे वे विवाहित ही क्यों न हों, क्योंकि शादी के बाद पुत्री के रिश्ते माता-पिता से समाप्त नहीं हो जाते। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 (1) (घ) के अधीन यह स्पष्ट प्रावधान है कि जो माता-पिता अपने भरण-पोषण में असमर्थ हैं, उनके भरण-पोषण का दायित्व उनके पुत्र व पुत्रियों पर समान रूप से है। यह दलील स्वीकार नहीं की जा सकती कि भरण-पोषण का उत्तरदायित्व पुत्री का नहीं होता है। यदि ऐसा होता है तो जिनकी सिर्फ पुत्रियां हैं वे तो निराश्रित हो जाएंगे। तो उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी बेटा और बेटी दोनों पर समान रूप लागू होती है, बशर्ते कि बेटी के पास अपनी पर्याप्त निजी आय हो।
इस तरह स्पष्ट है कि बुढ़ापे का सहारा सिर्फ बेटे नहीं, बल्कि समान रूप से बेटियां भी हैं, इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि अपनी पुत्रियों को सक्षम बनायें। यदि वे सक्षम होंगी, तभी वह आपका सहारा बन पाएंगी, जब आप आर्थिक रूप से असमर्थ हो जाएंगे

कुश कुमार द्वारा लिखित

कुश कुमार बायोग्राफी !

नाम : कुश कुमार
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 119 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 216 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 113 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.